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अमेरिकी घुड़कियों का इलाज खोजना जयशंकर की बड़ी प्राथमिकता

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विदेश मंत्री एस जयशंकर (फाइल फोटो) - फोटो : पीटीआई
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विदेशमंत्री के रूप में एस जयशंकर की नियुक्ति ऐसे समय हुई है, जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदुस्तान अनेक विषम परिस्थितियों का सामना कर रहा है। अमेरिका आंखें दिखा रहा है। चीन अपनी चुप्पी से कोई सकारात्मक संदेश नहीं दे रहा है। अनेक पड़ोसी देश दम साधे एनडीए-2 के रवैये को देख रहे हैं। यूरोप के कई मुल्कों ने बहुत खुलकर नई सरकार का स्वागत नहीं किया है। भारत के आर्थिक और कूटनीतिक फैसलों को विकसित और विकासशील राष्ट्र अपने अपने हितों के मद्देनजर ताक रहे हैं। 

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अफ्रीकी देश अनमने हैं और पश्चिमी देश भी अपनी-अपनी मुश्किलों से जूझ रहे हैं। कुल मिलाकर जयशंकर के राजपथ पर कालीन नहीं, कांटे अधिक दिखाई देते हैं। इसके अलावा उन्हें विदेशमंत्री के तौर पर जो काम करने हैं, वे खालिस उनके मंत्रालय के ही नहीं हैं। उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वित्त, उद्योग और रक्षा मंत्रालयों के कुछ काम भी अपने कौशल से करने होंगे।

हाल के दिनों में अमेरिका के व्यवहार में कुछ तब्दीली दिखाई दे रही है। अमेरिका के कहने पर भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को दरकिनार करके ईरान से तेल आयात करीब-करीब बंद कर दिया है। इसके बाद भी अमेरिका तीन दिनों में तीन बार एक तरह से भारत को धमकाने वाले अंदाज में चेतावनी दे चुका है। पहले उसने रूस से एस-400 मिसाइल प्रणाली खरीदने पर भारत को चेतावनी देते हुए कहा था कि इससे भारत और अमेरिका के रक्षा संबंधों में उलटा असर पड़ेगा। 
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अमेरिकी कानून के तहत भारत को इससे प्रतिबंधों का सामना भी करना पड़ सकता है। इसके बाद उसने भारत को तरजीही दर्जा समाप्त करने का एलान किया। पांच जून से भारत को लाभार्थी विकासशील देश की श्रेणी का फायदा नहीं मिलेगा। पिछले साल भी उसने भारत के 50 से अधिक उत्पादों को आयात शुल्क से मुक्त करने वाली रियायत वापस ले ली थी। इसके अलावा उसने फिर धमकाने वाले अंदाज में ईरान से तेल खरीदने पर गंभीर बंदिशों के लिए तैयार रहने का संदेश दिया है।

वैसे अमेरिका का यह रवैया अप्रत्याशित नहीं है। दशकों से वह सिर्फ अपने हितों की चिंता करता आया है। उसकी चौधराहट की हिफाजत करना जैसे अनेक विकासशील  राष्ट्रों का कर्तव्य सा हो गया है। अमेरिका ने कभी भी भारत की संवेदनशील कूटनीतिक और सुरक्षा संबंधी चिंताओं को एक बयान से अधिक महत्त्व नहीं दिया है। अफगानिस्तान से अब वह अपनी फौज को हर हाल में वापस बुलाना चाहता है। इसके लिए वह किसी सम्मानजनक रास्ते की तलाश में है। इसी कारण कुछ समय से पाकिस्तान की पहल पर तालिबान से उसकी गुपचुप वार्ताएं हो रही हैं। 

अगले साल वहां राष्ट्रपति चुनाव होने हैं। डोनाल्ड ट्रंप अगली पारी खेलने के लिए उतावले नजर आते हैं। 18 जून को वे दोबारा चुनाव लड़ने की घोषणा करने जा रहे हैं। इसलिए वे किसी भी सूरत में अगले चुनाव से पहले अफगानिस्तान से नाटो फौज की वापसी सुनिश्चित करना चाहते हैं। ध्यान देने की बात यह है कि पिछली बार से डोनॉल्ड ट्रंप की लोकप्रियता में गिरावट आई है। उनके अस्थिर चित्त के चलते अमेरिका में ही उनके अनेक निर्णयों पर सवाल उठे हैं। दमदार उम्मीदवार सामने आने पर ट्रंप की राह आसान नहीं होगी। 

ट्रंप को यह भी जानकारी है कि अगली पारी के रास्ते में भारतीय मूल की तुलसी गेलॉर्ड और कमला हैरिस रोड़ा बन सकती हैं। उन्हें अमेरिका में भारतीयों के वोटों का लाभ भी मिल सकता है। ऐसे में वह अल्पसंख्यक भारतीयों की उपेक्षा कर निश्चित ही अन्य मतदाताओं का समर्थन लेना चाहेंगे। इसके अलावा छह महीने पहले उपचुनावों में ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी ने निचले सदन में अपना बहुमत खो दिया है। इससे ट्रंप की परेशानियों का दायरा बढ़ा है। 

इन उलझन भरी चिंताओं के मद्देनजर एस जयशंकर के लिए अमेरिकी प्रशासन के साथ रिश्तों का रसायन मजबूत करना पड़ेगा, जो पिछले पांच सालों में अगर परवान नहीं चढ़ पाए तो उनमें गिरावट भी नहीं आई है। विदेश मंत्री के रूप में उनकी यह पहली बड़ी परीक्षा होगी।

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