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श्रद्धांजलि: मार्च में थी फिर लाइट्स, कैमरा, एक्शन बोलने की तमन्ना, बोले, मिथुन में अभी बहुत माद्दा

सार

  • बुद्धदेब दासगुप्ता का 77 वर्ष की उम्र में निधन
  • अगली फिल्म की शूटिंग के लिए मुंबई आने वाले थे बुद्धदेब
  • ओटीटी पर उनकी आखिरी हिंदी फिल्म ‘अनवर का अजब किस्सा’ रिलीज हुई थी
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बुद्धदेब दासगुप्ता - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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तय हुआ था कि निर्देशक बुद्धदेब दासगुप्ता मुंबई आएंगे तो यहां मैं उससे पहले कोलकाता गया तो वहां, उनके मुलाकात जरूर होगी। बुद्धदेब मार्च में अपनी अगली हिंदी फिल्म की शूटिंग शुरू करने मुंबई आने वाले थे। नवंबर में ही ईरॉस नाउ ओटीटी पर उनकी आखिरी हिंदी फिल्म ‘अनवर का अजब किस्सा’ रिलीज हुई थी। फिल्म उन्होंने हालांकि ‘स्निफर’ नाम से बरसों पहले बनाई थी, उस दौर में जब नवाजुद्दीन सिद्दीकी को कम ही लोग जानते पहचानते थे। ‘अनवर का अजब किस्सा’ के सिलसिले में ही उनसे लंबी बात हुई थी।  सिनेमा से गुम होते आम आदमी को लेकर वह चिंतित थे। मिथुन को उनकी क्षमता के हिसाब से निर्देशक न मिलने का भी उन्हें दुख रहा और वह चिंतिंत थे कि कोरोना यूं ही चलता रहा तो वह अपनी अगली फिल्म कैसे शुरू कर पाएंगे।

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ऑडियो फाइल की तारीख बताती है कि ये बातचीत बीते साल की सर्दियों में 28 नवंबर में हुई। मैं अपने गांव उन्नाव जिले के फतेहपुर चौरासी में था और फिल्म ‘अनवर का अजब किस्सा’ के निर्माताओं की मनुहार थी कि मैं फिल्म को लेकर बुद्धदेब दासगुप्ता से बात जरूर कर लूं। नंबर उनका मेरे पास पहले से था तो संदेश पर समय लेकर उस दोपहर मैंने फोन लगा दिया। आदतन बात हिंदी में ही शुरू की लेकिन बुद्धदेब दासगुप्ता ने बातचीत शुरू होती ही माफी मांग ली कि हिंदी सिनेमा से उन्हें बहुत प्यार है पर वह बांग्ला या अंग्रेजी में ही बातचीत करने में सहज रहते हैं। तो बातचीत अंग्रेजी में ही हम दोनों देर तक करते रहे।

इस बातचीत में तमाम बातें उन्होंने ऐसी भी कहीं जिनसे लोगों का मन खट्टा हो सकने का अंदेशा भी तुरंत ही उन्हें हो गया। अनुराग बसु की फिल्म ‘लूडो’ को ओटीटी पर रिलीज हुए कुछ ही दिन हुए थे तो उस पर भी उन्होंने विस्तार से अपनी टिप्पणी की। लेकिन, फिर थोड़ा रुककर बोले, ‘इसे छापिएगा मत क्यों किसी का दिल दुखाना।’ फिल्म ‘अनवर का अजब किस्सा’  के बारे में भी उन्होंने कुछ खास ऐसा बताया नहीं था कि जिस पर कुछ रोचक लिखा जा सकता, सिवाय इसके कि नवाजुद्दीन को देखते ही उन्हें ये लग गया था कि उन्हें अपनी फिल्म का वह हीरो मिल गया है जिसकी उन्हें तलाश थी। और ऐसी बातें हर दूसरा फिल्म निर्देशक करता है।
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मिथुन चक्रवर्ती को लेकर जारी अपनी रिसर्च के बारे में मैंने जरूर उनके कुछ सवाल किए। बुद्धदेब दासगुप्ता की फिल्म ‘तहादेर कथा’ में ही मिथुन को सर्वश्रेष्ठ अभिनय का दूसरा राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला। देश के लिए सब कुछ गंवा देने वाले कोई शख्स क्या देश के आज के हालात से दुखी नहीं होता होगा? और क्या ऐसे सवालों पर फिर से सिनेमा बनाने का समय नहीं आ गया है?  ऐसे सवालों पर बुद्धदेब 76 साल की उम्र में थोड़ा सकपाकाए भी थे। लेकिन फिर वह मिथुन का मुद्दा उनके साथ बनी अपनी एक और फिल्म ‘कालपुरुष’ पर ले आए। मैं वापस उनको ‘तहादेर कथा’ पर लाया, वह इतना ही बोले कि इस फिल्म की पटकथा मिथुन के पास पहले ही कहीं से पहुंच गई थी। शायद निर्माता उनको लेकर ही ये फिल्म बनाना चाहते थे।

मिथुन चक्रवर्ती की काबिलियत पर बुद्धदेब दासगुप्ता को अब भी गुमान था। कहने लगे, मिथुन को निर्देशक सही मिलना चाहिए। सही निर्देशक के साथ मिथुन की अदाकारी का रुतबा ही कुछ और होता है। बुद्धदेब दासगुप्ता को मार्च में मुंबई आना था। लेकिन, तभी मुंबई समेत देश के दूसरे शहरों में कोरोना से प्रभावित लोगों की संख्या फिर से बढ़ने लगी। नवंबर में वह फिल्मों के ओटीटी पर रिलीज होने से काफी प्रभावित थे कि अब अच्छी फिल्मों को सिनेमाघरों की राह नहीं तकनी होगी और फिल्में सीधे दर्शकों तक उनके घर बैठे पहुंच सकेंगी। नई तकनीक ने उनके भीतर नया उत्साह भी भरा था। लेकिन, उत्साह का ये सिरा बंगाल की खाड़ी से निकलकर मुंबई के अरब महासागर से मिल पाता, उससे पहले ही समय की लहर उन्हें अपने साथ बहा ले गई।
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