फारुख के पिता मुस्तफा शेख मुंबई के एक जाने माने वकील थे। फारुख ने अपनी पढ़ाई मुंबई के सेंट मैरी स्कूल में की।
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बहरहाल, फारुख शेख का होना एक तसल्ली थी, एक आस्था थी - भरोसा और विश्वास था कि यह सब उतना कठिन और दुरूह नहीं है। इस संसार की हर "मिस चमको" के लिए एक आदर्शवादी हीरो ही नहीं, धड़कते दिल ही नही बल्कि जीवन का पर्याय था, जो बहुत सहज रूप से हंसता बोलता है, संजीदा रहता है और हर क्षण जीता है एकदम साफगोई से ऐसे लोगों के काम को देखना भी सम्भवतः एक स्वर्गिक सुख ही है जो इस विलुप्त होती स्मृतियों में किसी रील से गुजर जाते हैं और रोते - हंसते हुए बार - बार आंसू पोछते हैं, अपने में ही मुस्कुराते हैं, गुनगुनाते हैं और गा उठते हैं।
"जिंदगी जब भी तेरी बज्म में लाती हैं हमें
ये जमीं चांद से बेहतर नजर आती है हमें"
फारुख - आज ना जाने क्यों याद आ रहा सुबह से, अभी लिखा तो लग रहा जैसे रूह को सुकून आ गया और वो यह लिखें जाने तक मेरे आसपास मंडरा रहा हो जैसे, ना जाने कितने दिलों की हसरत और धड़कन था वो, पर बन्दा था गजब का; सई परांजपे ने एक मराठी कादम्बरी के दीवाली विशेषांक में कहा था कि "कथा" से मुझे यश मिला और उसमें दिलफेंक मुम्बइया हीरो का चरित्र निभाने वाला मुंबईया चाल का असली जीवन परसोनिफाई करने वाला फारुख ना होता तो मेरा निर्देशक होना ही नहीं, एक बेहतरीन मनुष्य होना भी सम्भव नहीं था।
फारुख मरते नहीं वे बस दिलों में बस जाया करते हैं.
फिर छिड़ी रात, बात फूलों की
रात है या बारात फूलों की
फूल के हैं फूल के गजरे
शाम फूलों की, रात फूलों की
आपका साथ-साथ फूलों का
आपकी बात बात फूलों की
फूल खिलते रहेंगे दुनिया में
रोज़ निकलेगी बात फूलों की..
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