26 जनवरी के दिन जब एक तरफ देश की सेनाएं राजधानी के राजपथ पर अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रही थीं, तब देश के ज्यादातर टेलीविजन चैनलों का ध्यान राजपथ की इस गौरवमयी झांकी को अपने दर्शकों तक पहुंचाने में था। ठीक उसी वक्त मीडिया के कुछ अन्य माध्यम दिल्ली की सीमाओं पर जारी हंगामे को अपने-अपने तरीके से दिखाने में व्यस्त थे। दुनिया के सामने भारत को शर्मसार करने वाले इन कोलाहली दृश्यों से गुजरते वक्त करीब दो महीने पहले का वाकया लगातार याद आता रहा..
29 नवंबर की रात करीब साढ़े दस बजे का समय था...एक दुखद पारिवारिक आयोजन से दिल्ली के छतरपुर इलाके से परिवार समेत एक टैक्सी के जरिए इन पंक्तियों का लेखक लौट रहा था..शायद पत्रकारिता के जरिए मिला दुर्गुण है या फिर गंवईं मन, जब भी टैक्सी या ऑटो की यात्रा होती है, ड्राइवर से बात करना शुरू हो जाता है।
ड्राइवर सरदार जी थे और उनसे परिचय का सिलसिला शुरू हुआ। ठीक उनके बगल में बैठकर घर-परिवार की बातें होने लगीं। सरदार जी महज आठ दिन पहले पंजाब के रोपड़ जिला स्थित अपने गांव से दिल्ली में टैक्सी स्टैंड की नौकरी पर लौटे थे। आठ महीने के लॉकडाउन के दौरान जो कठिन वक्त गुजरा और उसे गुजारते वक्त कितने पापड़ बेलने पड़े, उस दौरान सारी जमा-पूंजी खत्म हो जाने की दारूण कथा भी उन्होंने सुनाई...पंजाब के बारे में उसकी सीमाओं से बाहर एक ही धारणा है, वह कि पंजाब के लोग बहुत समृद्ध हैं...तकरीबन सबके पास सोना उगलने वाले खेत हैं।
शायद अंतश्चेतना में यही धारणा बैठी हुई है, लिहाजा ड्राइवर से एक सवाल पूछ लिया, ‘कोई बात नहीं, घर में खेती तो होगी ही?’
‘ना जी, हम तो दलित हैं..हमारे पास घर के अलावा एक इंच भी जमीन नहीं है। ’ ड्राइवर का जवाब था..इसके साथ ही अपने जीवन संघर्ष और अपनी आर्थिक बेबसी को भी उन्होंने उजागर कर दिया..
बहरहाल बात में से ही किसान आंदोलन की बात निकल पड़ी। इसके बाद चौंकने की बारी मेरी थी...
अब तक अपनी आर्थिक बदहाली, अपने संघर्ष की दारूण कथा सुनाते रहे सरदार जी का स्वर बदल गया..
पिछली सीट पर मेरा परिवार था, शायद इस वजह से केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री मोदी को पंजाबी अंदाज में गालियां देने से रूक गए, लेकिन यह कहने से खुद को रोक नहीं पाए।
‘हम पंजाबी हैं, इंदिरा को सिखा दिया तो मोदी क्या है...उसे भी सिखा देंगे..’
इसके बाद तो वे केंद्र सरकार को भला-बुरा कहने लगे। उनसे जब पूछा कि जब आपके पास खेत नहीं है, गांव में पीछे रह रहे परिवार को मजदूरी ही करनी है और शहर में आपको दूसरों की टैक्सी ही चलानी है तो फिर आप मोदी के खिलाफ इतनी आग क्यों उगल रहे हैं?
इस सवाल का जवाब उनके पास नहीं था..
बहरहाल यह बात आई-गई हो गई..लेकिन जब लालकिले की चारदीवारी उत्पाती किसानों ने पार कर ली, उसकी परछत्ती को फांद गए, किसी ने उस जगह अपना झंडा फहरा दिया, जिस जगह झंडा फहराने की पारंपरिक अनुमति भारत का वह लोकतंत्र अपने सर्वोच्च नेता को देता है, जिसकी महानता की बलैया लेते हम नहीं थकते। तब दो महीने पुरानी यह घटना याद आ गई।
सवाल यह है कि जिस व्यक्ति के पास खेती के लिए एक इंच जमीन नहीं है, जिसका परिवार मजदूरी पर ही गुजर-बसर करने को मजबूर है। वह भी केंद्र सरकार और उसके अगुआ के खिलाफ इस तरह आग उगल सकता है तो समझा जा सकता है कि किसान आंदोलन को लेकर पंजाब में कैसा माहौल बनाया गया और उसके लिए लोगों को किस तरह भड़काया गया। साल 2002 में पहली बार प्रकाशित अपनी आत्मकथा ‘जैसा जीवन जिया’ में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने लिखा है,
‘”कैसे लोगों के दिलों के जज्बातों को उभार कर उनका समर्थन पाया जाए, यही राजनीति होकर रह गई है। इसके लिए कोई मजहब का नारा लगा रहा है तो कोई जाति का।...खुल्लमखुल्ला ये बातें की जा रही हैं। इसी को लोग अपनी बड़ी भारी उपलब्धि मानते हैं।”
कहना न होगा कि इसे लिखे जाने के करीब दो दशक बाद यह प्रवृत्ति और आगे बढ़ गई है। अब तो सोशल मीडिया है, जहां किसी संपादन की जरूरत नहीं है। इसके जरिए बिना सिरपैर की बातों को और फैलाया जा रहा है और इस तरह जज्बात को खूब उभारा जा रहा है।
इसी प्रवृत्ति के तहत किसान आंदोलन को पंजाबी और सिख स्वाभिमान से जोड़ दिया गया। क्योंकि इसके बिना बात बननी नहीं थी। आंकड़ों को जानने वाले जानते हैं कि आनुपातिक रूप से पंजाब सबसे ज्यादा दलित जनसंख्या की हिस्सेदारी वाला राज्य है। यहां करीब 32 फीसद दलित हैं और पंजाब की खेती में उनकी हिस्सेदारी महज तीन-चार फीसद है।