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Farmers Protest: क्यों कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं किसान

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कृषि कानूनों को लेकर किसानों का प्रदर्शन लगभग दो महीने से चल रहा है - फोटो : अमर उजाला
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केंद्र सरकार द्वारा पारित तीनों कृषि कानूनों को लेकर किसानों का प्रदर्शन लगभग दो महीने से चल रहा है। पहले किसान हरियाणा-पंजाब में प्रदर्शन कर रहे थे। अपनी मांगों पर कोई विचार नहीं होता देख उन्होंने दिल्ली का रूख किया। पिछले दस दिनों से किसान अपनी मांगों को लेकर दिल्ली में आंदोलनरत हैं।

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इस इस दौरान सरकार और किसानों के बीच छह दौरे की वार्ता हुई। लेकिन उसमें कोई ठोस हल नहीं निकल सका। सरकार एमएसपी की पहली जैसी व्यवस्था बनाए रखने का आश्वासन दे रही है, उसके बावजूद किसान आंदोलन खत्म करने को तैयार नहीं है।


किसानों का कहना है कि जब तक तीनों कानूनों को सरकार वापस नहीं ले लेती, हम अपना आंदोलन खत्म नहीं करेंगे। वहीं सरकार का कहना है, वह कानूनों में संसोधन को तैयार है, लेकिन इसे वापस नहीं लेगी।

दरअसल, किसान एमएसपी को कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाना चाहते हैं। जिससे उन्हें अपनी ऊपज पर लाभ की गारंटी मिल सके। इसके अलावा किसान कांट्रैक्ट फॉर्मिंग को लेकर भी अपनी आशंकाएं व्यक्त कर रहे हैं। इस आंदोलन में किसानों की सबसे मुख्य मांग एमएसपी को लेकर कानून बनाने की है। लेकिन सरकार इस पर कोई कानून नहीं बनाना चाहती है।

  • क्या है एमएसपी और क्यों इसको लेकर इतनी रार

1960 के दशक में हरित क्रांति का लाभ सुनिश्चित करने और पूरे देश में खाद्यान्न की मांग को घरेलू स्तर पर पूरा करने के लिए सरकार गेहूं और धान की ऊपज को बढ़ाना चाहती थी। लेकिन किसान बिना लाभ की गारंटी के इसकी खेती को तैयार नहीं थे। जिसके बाद अनाज की कीमत तय करने के लिए 1964 में एल.के झा के नेतृत्व में एक समिति गठित की गई। इस समिति की सिफारिश के आधार पर पहली बार 1966-67 में गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया गया।

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उसके बाद से हर साल खेती से पहले सरकार फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करती है, ताकि किसानों को लाभ की गारंटी हो। स्वामी नाथन आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य कृषि लागत का डेढ़ गुणा तय किया गया। इसका निर्धारण सरकार सरकार कृषि लागत मूल्य आयोग (सीएसीपी) की सिफारिश पर करती है। यह कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय की एक संयुक्त समिति है।

सरकार के लिए इन सिफारिशों का मानना बाध्यकारी नहीं है। क्योंकि एमएसपी कोई कानून नहीं है। यह एक सरकारी नीति है जिसे प्रशासनिक स्तर पर लागू किया जाता है। सीएसीपी ने 2018-19 में अपनी मूल्य नीति रिपोर्ट में किसानों के लिए "The Right to Sale at MSP" के बारे में कानून बनाने का सुझाव दिया था। लेकिन सरकार ने नए कानून में इसका कोई जिक्र नहीं किया। इसको लेकर आंदोलनरत किसानों का एक बड़ा तबका नाराज है। वह नए कानून में सीएसीपी की इस सिफारिश को लागू करने की जिद्द पर अड़ा है।

  • एमएसपी पर कानून क्यों नहीं बनाना चाहती सरकार

सरकार का कहना है कि फसलों पर एमएसपी तय करने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत ज्यादा हो जाती है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में फसलों के खरीदार नहीं मिलते। एमएसपी देने से किसान उसी फसल का ज्यादा उत्पादन करते हैं, जिससे सरकार के सामने उन फसलों का खरीद और भंडारण करने की समस्या आ जाती है। इसके अलावा सरकार का दावा है कि इन कानूनों से किसानों को आने वाले समय में काफी लाभ होगा। यह किसानों की आय दोगुनी करने में भी कारगर साबित होगा।

अन्य फसलों की एमएसपी पर खरीद नहीं के बराबर हुई...

खुले बाजार में फसल बेचने पर किसानों को एमएसपी से कम दाम ही मिलेंगे- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : पीटीआई
  • एमएसपी कैसे सरकार के लिए बन गया सिरदर्द

1964 में एल.के झा के नेतृत्व में बनी समिति के सुझाव पर 23 तरह की फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने की बात कही गई। लेकिन दुर्भाग्य से किसानों को सिर्फ गेहूं और धान पर ही एमएसपी का लाभ मिल सका। इसका परिणाम यह हुआ है कि अधिकतर किसान सिर्फ गेहूं और धान की खेती ही करते हैं। पंजाब में भी गेहूं और धान की खेती व्यापक पैमाने पर होती है।

अन्य फसलों की एमएसपी पर खरीद नहीं के बराबर हुई। इसकी मुख्य वजह यह रही कि जनवितरण प्रणाली के लिए सरकार गेहूं और धान की खरीद लगातार करती रही। इसका अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि 2019-20 में धान के कुल उत्पादन 118.43 मिलियन टन की 43.26 फीसद और गेहूं के कुल उत्पादन 107.59 मिलियन टन की 36.44 फीसद की खरीद एमएसपी पर हुई। जबकि चना की 18.47 फीसद सरसों की 8.7 फीसद और मूंग की 5.69 फीसद खरीद ही एमएसपी पर हुई।

सरकार का कहना है कि एमएसपी पर कानून बनाने से इसका असर अंतरराष्ट्रीय बाजार पर पड़ेगा। फसलों की कीमत अधिक होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसके खरीदार नहीं मिल सकेंगे। वहीं, सरकार को सब्सिडी के रूप में ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ेंगे जिसका असर अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा।

गन्ने पर एमएसपी की गारंटी से घरेलू बाजार में चीनी का मल्य अधिक होने के कारण अंतराष्ट्रीय बाजार में इसके खरीदार नहीं मिल रहे हैं। जिसके कारण सरकार को निर्यात सब्सिडी देनी पड़ रही है। अगर, अन्य फसलों में भी एमएसपी की गांरटी दी गई तो यहां भी स्थिति कुछ ऐसी ही हो जाएगी। इससे यह तो तय है कि निकट भविष्य में एमएसपी पर फसलों की खरीद नहीं हो सकेगी।

यह भी स्प्ष्ट है कि खुले बाजार में फसल बेचने पर किसानों को एमएसपी से कम दाम ही मिलेंगे। जिससे किसानों के लिए खेती घाटे का सौदा होगा। इसका दुष्परिणाम बिहार, उत्तरप्रदेश व मध्यप्रदेश में देखा जा चुका है। यही वजह है कि बिहार में लोगों का खेती से मोहभंग हो गया है। अगर, सरकार एमएसपी की गारंटी नहीं देती है तो पंजाब-हरियाणा व अन्य राज्यों जहां किसान एमएसपी पर अपनी फसलों को बेचते हैं उनका भी कृषि से मोह भंग होगा। जिससे निकट भविष्य में फिर से खाद्यान्न की किल्लत होगी।

सरकार का कहना है कि एमएसपी पर फसल खरीदने से अंतरराष्ट्रीय बाजार की तुलना में घरेलू बाजार में इसकी कीमतें ज्यादा होती हैं। इसमें कितनी सच्चाई है इसे जानने के लिए पहले हमें यह समझना होगा कि एमएसपी कैसे होती है और इसका आधार क्या है?

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विवादों के निपटारे के लिए कोर्ट जाने का विकल्प नहीं होने से डर...

किसान नए कानून में विवादों के निपटारे के लिए कोर्ट जाने की मांग कर रहे हैं - फोटो : पीटीआई

सीएसीपी न्यूनत समर्थन मूल्य तय करने से पहले विभिन्न पहलुओं को देखती है:

  1. बाजार में मौजूदा कीमतों का रूख, मांग और आपूर्ति की स्थिति, राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्थिति।
  2. देश भर में प्रति हेक्टेयर लागत।
  3. प्रति क्विंटल अनाज उगाने के दौरान होने वाला खर्च।
  • फसल लागत निकालने का फॉर्मूला

ए2 : किसानों की ओर से किया गया सभी तरह (कैश व वस्तु के रूप में) का भुगतान, बीज, खाद, कीटनाशक, मजदूरों की मजदूरी, ईंधन व सिंचाई खर्च को शामिल किया जाता है।

ए2+एफएल : इसमें ए2 के अलावा परिवार के सदस्यों द्वारा खेती में की गई मेहनत का मेहनताना भी जोड़ा जोता है।

सी2 (कांप्रिहेंसिव कॉस्ट): यह लागत ए2 और एफएल के ऊपर होती है। इसमें जमीन की कीमत भी जोड़ी जाती है। इसमें जमीन का किराया व जमीन की खेताबाड़ी के काम में लगी स्थायी पूंजी पर ब्याज को भी शामिल किया जाता है।

इन सब बिंदुओं पर आकलन करने के बाद सीएसीपी सरकार से फसलों का एमएसपी तय करने की सिफारिश तय करती है। जिसके आधार पर सरकार फसलों के एमएसपी की घोषणा करती है। यहां गौर करने वाली बात यह है कि सीएसीपी सभी बिंदुओं का आकलन कर के एमएसपी तय करने की सिफारिश करती है, उसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय बाजार की तुलना में फसलों की कीमत ज्यादा हो रही है। इससे तो यहीं पता चलता है कि भारत में कृषि लागत अन्य देशों की तुलना में काफी ज्यादा है।

  • कांट्रैक्ट फॉर्मिंग से डर 

इस कानून के धारा 6(2) में यह प्रावधान है कि प्रायोजक फसल खरीदने से पहले फसलों का निरीक्षण करेगा। ऐसे में किसानों का डर है कि अगर फसल खराब होती है तो प्रायोजक उनसे फसल नहीं लेगा। जबकि सरकारी मंडियों में फसल की गुणवत्ता प्रभावित होने के बावजूद इस बात की गांरटी होती है कि सरकार फसल खरीद लेगी, जिसका खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ेगा। किसानों का कहना है कि अगर प्रायोजक को अनुबंध के तहत कम गुणवत्ता वाली फसलों को भी खरीदना है तो फिर इस कानून में खरीद से पहले निरीक्षण का प्रावधान क्यों जोड़ा गया है?

  • विवादों के निपटारे के लिए कोर्ट जाने का विकल्प नहीं होने से डर

उत्तर प्रदेश गन्ना अधिनियम 1953 के तहत 25-50 हजार छोटे एवं सीमांत गन्ना किसान 67 साल से गन्ना उत्पादन सहकारी समितियों के जरिए चीनी मिलों के साथ अनुबंध खेती कर रही है। इस समझौते में दोनों पक्ष की स्वीकृति व हस्ताक्षर भी हैं, उसके बावजूद किसानों को बिना सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के भुगतान नहीं हो पाता है। यहीं वजह है कि किसान नए कानून में विवादों के निपटारे के लिए कोर्ट जाने की मांग कर रहे हैं।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 
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