खुले बाजार में फसल बेचने पर किसानों को एमएसपी से कम दाम ही मिलेंगे- सांकेतिक तस्वीर
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- एमएसपी कैसे सरकार के लिए बन गया सिरदर्द
1964 में एल.के झा के नेतृत्व में बनी समिति के सुझाव पर 23 तरह की फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने की बात कही गई। लेकिन दुर्भाग्य से किसानों को सिर्फ गेहूं और धान पर ही एमएसपी का लाभ मिल सका। इसका परिणाम यह हुआ है कि अधिकतर किसान सिर्फ गेहूं और धान की खेती ही करते हैं। पंजाब में भी गेहूं और धान की खेती व्यापक पैमाने पर होती है।
अन्य फसलों की एमएसपी पर खरीद नहीं के बराबर हुई। इसकी मुख्य वजह यह रही कि जनवितरण प्रणाली के लिए सरकार गेहूं और धान की खरीद लगातार करती रही। इसका अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि 2019-20 में धान के कुल उत्पादन 118.43 मिलियन टन की 43.26 फीसद और गेहूं के कुल उत्पादन 107.59 मिलियन टन की 36.44 फीसद की खरीद एमएसपी पर हुई। जबकि चना की 18.47 फीसद सरसों की 8.7 फीसद और मूंग की 5.69 फीसद खरीद ही एमएसपी पर हुई।
सरकार का कहना है कि एमएसपी पर कानून बनाने से इसका असर अंतरराष्ट्रीय बाजार पर पड़ेगा। फसलों की कीमत अधिक होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसके खरीदार नहीं मिल सकेंगे। वहीं, सरकार को सब्सिडी के रूप में ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ेंगे जिसका असर अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा।
गन्ने पर एमएसपी की गारंटी से घरेलू बाजार में चीनी का मल्य अधिक होने के कारण अंतराष्ट्रीय बाजार में इसके खरीदार नहीं मिल रहे हैं। जिसके कारण सरकार को निर्यात सब्सिडी देनी पड़ रही है। अगर, अन्य फसलों में भी एमएसपी की गांरटी दी गई तो यहां भी स्थिति कुछ ऐसी ही हो जाएगी। इससे यह तो तय है कि निकट भविष्य में एमएसपी पर फसलों की खरीद नहीं हो सकेगी।
यह भी स्प्ष्ट है कि खुले बाजार में फसल बेचने पर किसानों को एमएसपी से कम दाम ही मिलेंगे। जिससे किसानों के लिए खेती घाटे का सौदा होगा। इसका दुष्परिणाम बिहार, उत्तरप्रदेश व मध्यप्रदेश में देखा जा चुका है। यही वजह है कि बिहार में लोगों का खेती से मोहभंग हो गया है। अगर, सरकार एमएसपी की गारंटी नहीं देती है तो पंजाब-हरियाणा व अन्य राज्यों जहां किसान एमएसपी पर अपनी फसलों को बेचते हैं उनका भी कृषि से मोह भंग होगा। जिससे निकट भविष्य में फिर से खाद्यान्न की किल्लत होगी।
सरकार का कहना है कि एमएसपी पर फसल खरीदने से अंतरराष्ट्रीय बाजार की तुलना में घरेलू बाजार में इसकी कीमतें ज्यादा होती हैं। इसमें कितनी सच्चाई है इसे जानने के लिए पहले हमें यह समझना होगा कि एमएसपी कैसे होती है और इसका आधार क्या है?
किसान नए कानून में विवादों के निपटारे के लिए कोर्ट जाने की मांग कर रहे हैं
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सीएसीपी न्यूनत समर्थन मूल्य तय करने से पहले विभिन्न पहलुओं को देखती है:
- बाजार में मौजूदा कीमतों का रूख, मांग और आपूर्ति की स्थिति, राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्थिति।
- देश भर में प्रति हेक्टेयर लागत।
- प्रति क्विंटल अनाज उगाने के दौरान होने वाला खर्च।
- फसल लागत निकालने का फॉर्मूला
ए2 : किसानों की ओर से किया गया सभी तरह (कैश व वस्तु के रूप में) का भुगतान, बीज, खाद, कीटनाशक, मजदूरों की मजदूरी, ईंधन व सिंचाई खर्च को शामिल किया जाता है।
ए2+एफएल : इसमें ए2 के अलावा परिवार के सदस्यों द्वारा खेती में की गई मेहनत का मेहनताना भी जोड़ा जोता है।
सी2 (कांप्रिहेंसिव कॉस्ट): यह लागत ए2 और एफएल के ऊपर होती है। इसमें जमीन की कीमत भी जोड़ी जाती है। इसमें जमीन का किराया व जमीन की खेताबाड़ी के काम में लगी स्थायी पूंजी पर ब्याज को भी शामिल किया जाता है।
इन सब बिंदुओं पर आकलन करने के बाद सीएसीपी सरकार से फसलों का एमएसपी तय करने की सिफारिश तय करती है। जिसके आधार पर सरकार फसलों के एमएसपी की घोषणा करती है। यहां गौर करने वाली बात यह है कि सीएसीपी सभी बिंदुओं का आकलन कर के एमएसपी तय करने की सिफारिश करती है, उसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय बाजार की तुलना में फसलों की कीमत ज्यादा हो रही है। इससे तो यहीं पता चलता है कि भारत में कृषि लागत अन्य देशों की तुलना में काफी ज्यादा है।
- कांट्रैक्ट फॉर्मिंग से डर
इस कानून के धारा 6(2) में यह प्रावधान है कि प्रायोजक फसल खरीदने से पहले फसलों का निरीक्षण करेगा। ऐसे में किसानों का डर है कि अगर फसल खराब होती है तो प्रायोजक उनसे फसल नहीं लेगा। जबकि सरकारी मंडियों में फसल की गुणवत्ता प्रभावित होने के बावजूद इस बात की गांरटी होती है कि सरकार फसल खरीद लेगी, जिसका खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ेगा। किसानों का कहना है कि अगर प्रायोजक को अनुबंध के तहत कम गुणवत्ता वाली फसलों को भी खरीदना है तो फिर इस कानून में खरीद से पहले निरीक्षण का प्रावधान क्यों जोड़ा गया है?
- विवादों के निपटारे के लिए कोर्ट जाने का विकल्प नहीं होने से डर
उत्तर प्रदेश गन्ना अधिनियम 1953 के तहत 25-50 हजार छोटे एवं सीमांत गन्ना किसान 67 साल से गन्ना उत्पादन सहकारी समितियों के जरिए चीनी मिलों के साथ अनुबंध खेती कर रही है। इस समझौते में दोनों पक्ष की स्वीकृति व हस्ताक्षर भी हैं, उसके बावजूद किसानों को बिना सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के भुगतान नहीं हो पाता है। यहीं वजह है कि किसान नए कानून में विवादों के निपटारे के लिए कोर्ट जाने की मांग कर रहे हैं।
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