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बेदम हुआ किसान आंदोलन: सरकार सख्त, आंदोलनकारी बिखरे 

Fri, 29 Jan 2021 12:37 AM IST
हरि वर्मा हरि वर्मा
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farmers protest - फोटो : Agency
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न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की लड़ाई वाला किसान आंदोलन 'न्यूनतम' समर्थन खो चुका है। आंदोलनकारियों के खिलाफ नारे लगने लगे हैं- तिरंगे का अपमान, नहीं सहेगा हिंदुस्तान। 26 जनवरी के तांडव के बाद आंदोलनकारियों के प्रति आम किसानों व अन्नदाता वाली हमदर्दी कम हुई है। आम किसानों के ही इससे दूरी बनाने से यह आंदोलन बेदम हुआ है। सिंघु, टीकरी, गाजीपुर बॉर्डर से किसानों की घर वापसी तेज हो गई है। टोल प्लॉजा बहाल हो गए हैं। हालांकि हाई वोल्टेज ड्रामा अब भी जारी है।

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सरकार सख्त, आंदोलनकारी बिखरे
26 जनवरी के तांडव के बाद यूं ही किसान नेताओं के खिलाफ लुकआउट सर्कुलर, पासपोर्ट जब्त करने जैसी कार्रवाई, देशद्रोह की धारा या यूएपीए के तहत मामले दर्ज नहीं किए गए हैं। नोटिस देकर तीन दिनों में जवाब मांगा गया है। आंदोलन के विदेश कनेक्शन और राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर पड़ताल जारी है। जब लालकिले पर तांडव हो रहा था, तो पाक समेत कई विदेशी मीडिया इसे चटकारे के साथ परोस रहे थे। तिरंगे के अपमान के बाद अब आंदोलन स्थलों पर सख्ती के साथ हाई-वे खाली कराने के लिए प्रशासन के साथ जनता ने भी दबाव बना दिया है। यूपी में 24 घंटे के भीतर चार आंदोलनकारी संगठनों, भाकियू एकता, वीएम सिंह गुट, भाकियू भानू और भाकियू लोकशक्ति ने आंदोलन से खुद को अलग कर लिया। यूपी में अब राकेश टिकैत और नरेश टिकैत सक्रिय हैं। हरियाणा के किसानों का अलग संयुक्त मोर्चा गुरनाम सिंह चढूनी की अगुवाई में पहले से सक्रिय है। पंजाब के किसान नेताओं पर सख्ती बढ़ी है।

बयानवीर नेताओं ने बिगाड़ा माहौल
26 जनवरी से पहले योगेंद्र यादव का बयान था- ट्रैक्टर रैली हर हाल में होगी, दिल्ली के अंदर आउटर रिंग रोड पर होगी, अनुशासित होगी, तिरंगे की आन-बान-शान दुनिया देखेगी। 26 जनवरी की घटना से तिरंगे की आन-बान-शान का जो अपमान हुआ, दुखदायी है। डॉ. दर्शनपाल ने संयुक्त किसान मोर्चा की प्रेस कांफ्रेंस में कहा था, हमारा किसी राष्ट्रीय स्मारक पर कब्जा या नुकसान पहुंचाने का इरादा नहीं है। लालकिले पर अनधिकृत कब्जा जमाकर नुकसान करने वाले उपद्रवियों ने जो तांडव मचाया वह सामने है। राकेश टिकैत का बयान था- टैंक और ट्रैक्टर साथ-साथ चलेंगे। दोनों का मिलन होगा।  
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दिल्ली पुलिस की सूझ और संयम
उपद्रवी जब एक-एक कर 394 पुलिस जवानों को चोट पहुंचा रहे थे, तब दिल्ली पुलिस के जवानों ने जो सूझ और संयम दिखाया, वह सराहनीय है। आंदोलनकारियों ने पुलिस के साथ विश्वासघात कर न केवल सारे वादे तोड़े, बैरिकेड भी तोड़े और निर्धारित गंतव्य मार्ग के बजाय लालकिले की ओर कूच किया। पुलिस को बल प्रयोग से बलवे और नुकसान का अंदेशा था। 

तिरंगे के अपमान से समर्थन खोया
करीब पिछले दो महीने से सिंघु, टीकरी, गाजीपुर, खेड़ा आदि में जमे आंदोलनकारियों के पक्ष में आसपास के ग्रामीण मदद में जुटे रहे, 26 जनवरी के बाद यही ग्रामीण अब इन आंदोलनकारियों से इलाके खाली करने को कह रहे हैं। रेवाड़ी के खेड़ा में पंद्रह गांवों की पंचायतों ने मिलकर शाहजहांपुर-जयसिंहपुर-खेड़ा बॉर्डर खाली करवा दिया। यह राजस्थान-हरियाणा की सीमा पर है। सिंघु बॉर्डर में बीस गांवों की पंचायतों ने विरोध जताया। गाजीपुर बॉर्डर पर आसपास के नागरिकों ने बृहस्पतिवार को आंदोलनकारियों के खिलाफ विरोध जताया। हाई-वे और गांव के रास्ते खाली करने का अल्टीमेटम दिया। तिरंगा लेकर नारेबाजी की गई- तिरंगे का अपमान, नहीं सहेगा हिंदुस्तान। 26 जनवरी को तिरंगे के अपमान के बाद अब यूपी के बड़ौत, बागपत, मथुरा के स्थलों से आंदोलन समेट लिए गए या समेट दिए गए। 

बदला सुर, अदालत की आई याद
अब तक आंदोलनकारी अदालत की अनदेखी करते रहे। जब प्रशासनिक अमला गाजीपुर बॉर्डर खाली कराने पहुंचा तो राकेश टिकैत ने कहा कि लालकिले पर पहुंचने वालों की कॉल डिटेल व रिकार्ड की जांच सुप्रीम कोर्ट करे। चेतावनी दी कि धरना जबरन हटाया गया तो अदालत जाएंगे। राकेश टिकैत ने फिर गोली वाली बोली कही। पहले सवाल किया, जो लालकिले तक पहुंच गए, पुलिस ने उन्हें गोली क्यों नहीं मारी। गाजीपुर पहुंचे प्रशासनिक अमले से कहा, गोली-लाठी चलाओ, हम नहीं हटेंगे। घड़ियाली आंसू बहाये। खुदकुशी की धमकी दी। टकराव की नौबत पैदा हुई। हकीकत यह है कि तिरंगे के अपमान के बाद आंदोलनकारियों ने भरोसा खो दिया है। लालकिले पर तांडव ने जितना आंदोलनकारियों को कलंकित किया, उससे कहीं ज्यादा तिरंगे के अपमान से देश कलंकित और शर्मशार है। दोषियों को किसी कीमत पर बख्शा नहीं जाना चाहिए। सोशल मीडिया पर किसान आंदोलन के विरोध में सुर तेज है। अखबारों के पन्ने के हेडर अन्नदाता में आक्रोश के बजाय किसानों का उत्पात में बदल गए हैं।

लालकिला बनाम धन्नीपुर
26 जनवरी को जब किसान आंदोलन के उपद्रवियों ने लालकिले पर तिरंगे का अपमान कर दुनियाभर में देश को शर्मसार किया, तभी यूपी के गांव धन्नीपुर में तिरंगे का मान बढ़ा। तिरंगे का मान बढ़ाने वाली यह खबर ट्रैक्टर परेड की आवाज में गुम हो गई। काश, आंदोलनकारी किसान धन्नीपुर से सीख पाते। 26 जनवरी को लालकिले पर जो कुछ हुआ, वह पिछले 72 सालों में नहीं हुआ। उधर, 26 जनवरी को ही जो कुछ धन्नीपुर गांव में हुआ, वह भी पिछले 72 सालों में नहीं हुआ।

तिरंगे के मान में नई इबारत
यूपी का धन्नीपुर गांव सोहावल तहसील में है। यहां इस 26 जनवरी को तिरंगे के मान में नई इबारत लिखी गई। 26 जनवरी को पांच एकड़ जमीन पर बनने वाली मस्जिद की आधारशिला रखी गई। तिरंगा फहराया गया। राष्ट्रगान गाया गया। दिल्ली में जब उपद्रवी लालकिले को नुकसान पहुंचा रहे थे, तभी धन्नीपुर गांव में संग्रहालय की नींव रखी जा रही थी। दिल्ली में जब उपद्रवी पुलिस के 394 जवानों को जख्म दे रहे थे, तभी धन्नीपुर गांव में अस्पताल की बुनियाद रखी जा रही थी। आंदोलनकारियों के उपद्रव को धन्नीपुर से जोड़कर देखने की वजह है। यह धन्नीपुर वही है जहां अयोध्या श्रीराम जन्मभूमि विवाद में मस्जिद बनाने के लिए पांच एकड़ जमीन दी गई। किसान आंदोलन पांच महीने पुराना है। अयोध्या विवाद पांच सौ साल पुराना। तीन दशक पहले ढांचा ढहाया गया। जमीन के मालिकाना हक की लड़ाई अदालत में चली। अयोध्या विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने पहले मध्यस्थता की पहल की। मध्यस्थ सफल नहीं हुए। जमीन पर मालिकाना हक की लड़ाई लंबी चली। सुनवाई हुई। फैसला आया। जमीन विवाद में सर्वोच्च फैसले के बाद कहीं कोई शोर तक नहीं।

किसान आंदोलन भी जमीन की सुरक्षा व एमएसपी की लड़ाई को लेकर है। इस मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थ की पहल की। कमेटी बना दी। आंदोलनकारियों ने इसे भी खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने आंदोलन के लिए शांतिपूर्ण गांधीवादी सत्याग्रह की मिसाल दी। दिल्ली में ट्रैक्टर रैली का मामला सरकार-पुलिस पर छोड़ा। आंदोलनकारियों को ट्रैक्टर रैली के लिए सुरक्षित मार्ग का विकल्प मिला। आंदोलनकारी नहीं माने। लालकिले पर उपद्रवियों द्वारा तिरंगे के बजाये धार्मिक झंडे को अहमियत निंदनीय और दुखदायी है। 26 जनवरी को जो हुआ, कलंकित कर गया।  हालांकि, सरकार ने बातचीत के दरवाजे अभी बंद नहीं किए हैं। ऐसे में टकराव टालने के लिए बातचीत का रास्ता बचता है। अदालत में मामला विचाराधीन है। जब अयोध्या जैसे पुराने दो पक्षों की जमीन और आस्था से जुड़े विवाद का हल अदालत से संभव है, तो इस मसले का हल क्यों नहीं। यह संभव है।
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