गाजीपुर बॉर्डर पर बैठे किसान
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हमारे घर में भी परिवार के मुखिया कई बार ऐसे निर्णय लेने को बाध्य होते हैं, जिस पर सभी सदस्यों की सहमति नहीं होती पर परिवार की सुरक्षा और संप्रभुता के भाव से ये निर्णय लिए जाते हैं और बाद में सभी सदस्यों की सहमति हो ही जाती है बस समझने में तनिक विलंब हो जाए तो भी कोई बात नहीं।
कल कहीं देख रहा था कि किसानों की ओर से एकमात्र शर्त यह है कि कृषि कानूनों की वापसी के बिना कोई बातचीत नहींं। सरकार की ओर से यह कहा जा रहा कि नए कानून में संशोधन और थोड़े बहुत बदलाव के लिए वे सहमत है।
इसी उहापोह में बात बनती नहीं दिख रही.!
मेरे विचार से किसानों को भी एक कदम आगे बढ़कर कुछ संशोधनों के साथ ही इस कानून को आगे बढ़ने देना चाहिए क्योंकि सरकार तो पीछे हटने से रही, ऊपर से तुर्रा यह कि,किसानों के एक नए संगठन ने सरकार की नीतियों के समर्थन में भी सड़कोंं पर उतरने का फैसला कर लिया है इससे किसानों का संगठन ही कमजोर होगा और आपस मे टूट-फूट भी संभावित.!
किसानों के तथाकथित रहनुमाओं को इस बात को समझने और समझाने की आवश्यकता है क्योंकि अब शायद यह आंदोलन अपने निश्चित लक्ष्य से तनिक भटक कर कुछ राजनीतिक लोलुपों के हत्थे चढ़ रहा यह इसलिए कि, आंदोलन के कुछ तस्वीरों में किसानों के मुद्दे से अलग की विचारधारा भी दृष्टित होती सी है.!
यह राजनीतिक लोलुपता किसी का न तो भला होने देगी, और न ही किसी मुद्दे को सुलह की ओर बढ़ने ही देगी.!
किसानों को यह समझना होगा कि, यह कानून अगर विवादित है, किसानों के हित में नहीं है, तो कोई बात नहीं, कुछ साल इंतजार ही कर लीजिए, अगले चुनाव में सरकार बदलने की ताकत तो हाथ मे हैं ही अगर इस बीच मे कानून की अच्छाई समझ आ जाए तो बीच के राजनीतिक दलालों को उखाड़ फेंकने की भी आवश्यकता हो जाएगी।
नुकसान किसी का हो, अपने देश और परिवार का ही है.!
आरंभिक दिनों में यह कहा गया था कि इस मंच पर कोई भी राजनीतिक रोटी नहीं सेंकी जाएगी, पर आज स्थिति यह कि बयानबाजी करने वाले सभी तथाकथित किसान नेता किसी न किसी दलविशेष से सम्बद्धता रखते हैं।
सरकार भी इन किसानों को अपना मानते हुए कुछ कदम पीछे की ओर आए और किसानों को भी अपनी जिद छोड़कर एकाध कदम आगे आना चाहिए, तभी इस ठहराव में गति और मति दोनों का समावेश सकल होगा, क्योंकि अगर यह ठहराव गतिमान नहीं हुआ, तो देश की धड़कन राजधानी की गति तो रुक ही चुकी है, मति रुक गई तो,अनर्थ भी संभावित.!
अभी हमारा देश अपनी सीमाओं पर उलझा हुआ है, इस समय मे राष्ट्र की शक्ति और संसाधनों का उपयोग राजनीतिक हल में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों को साधने में लगना चाहिए.!
ठंड है, सरकारी गर्मी भी इन किसानों तक पहुंचे, और किसानों की उष्णता भी सरकारी महकमे को पिघलाए, यह दोनों पक्षों के लिए आवश्यक है।
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