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बाजार और गोरेेेेपन की चाहत: इस नई पैंतरेबाजी को कितना समझेगा समाज?

सार

  • तमाम गोरेपन की क्रीम बनाने वाली कंपनियों को भी लोगों की भावनाएं अब समझ में आईं और आनन-फानन में अपनी योजनाओं में बदलाव कर रही हैं।
  • भारतीयों का शोषण किया। यहां ब्यूटी और पर्सनल केयर बाजार की दर 9 प्रतिशत सीएजीआर यानी कंपाउन्ड एनुअल ग्रोथ अर्थात निवेश के विकास की वार्षिक दर बढ़ने का अनुमान है।
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फेयरनेस क्रीम बाजार सकते में है कि कब आंच यहां भी न पहुंच जाए- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Social Media
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विस्तार
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मल्टीनेशनल कंपनियों ने चमड़ी के रंग को गोरा बनाने के झूठ को अपना बड़ा बाजार बनाया और भारतीयों का शोषण किया। कई नामी गिरामी कंपनियां इसी का फायदा उठाकर जबरदस्त कमाई कर चुकी हैं।

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बाजार के जानकार भी मानते हैं कि हो सकता है इसीलिए तमाम ब्यूटी प्रोडक्ट्स अपनी ब्रांड मार्केट रणनीति के तहत ही अपने विज्ञापन और टैगलाइन में बदलाव करने के साथ ब्रांड एंबेसडर को बदलें और सिंबॉल या नाम से बाजार में फिर बरसों बरस बेखौफ राज करने के लिए उतरें।
 

कहते हैं कि किसी भी बड़े बदलाव की चिन्ता या जरूरत तब होती है जब कोई बड़ी मुसीबत सामने दिखती है। अमूमन यह इंसानी फितरत है कि जब सब बिल्कुल ठीक चल रहा है और सौ टका दुरुस्त और फायदेमन्द भी तो फिर फालतू बैठे बिठाए क्यों मुसीबत मोल ली जाए? 
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यह काम तो इंसान ही करता है फिर वह चाहे बड़ी कंपनियों के संचालक हों या गृह उद्योग से जुडे लोग। ऐसा ही कुछ 1975 से अब तक यानी 45 सालों से धड़ल्ले से बिक रही और भारतीय बाजार में खासकर गांवों के 70 प्रतिशत इलाकों में अपना बाजार बना चुकी मशहूर फेयरनेस क्रीम फेयरएण्ड लवली भी करने जा रही है।

दरअसल, अमेरिकी-अफ्रीकी समुदाय के अश्वेत जाॅॅर्ज फ्लायड की मौत के बाद जो कुछ हुआ उससे एक बार फिर दुनियाभर में रंगभेद पर बहस छिड़ गई और इसी की झुलसन ने गोरेपन और त्वचा को सुंदर करने वाली तमाम क्रीमों को भी लपेटे में ले लिया।

हालांकि भारत में ऐसा कुछ नहीं है, लेकिन फेयरनेस क्रीम बाजार जरूर सकते में है कि कब आंच यहां भी न पहुंच जाए। ऐसे में तमाम गोरेपन की क्रीम बनाने वाली कंपनियों को भी लोगों की भावनाएं अब समझ में आईं और आनन-फानन में अपनी योजनाओं में बदलाव कर रही हैं।

इस कड़ी में कोलकाता में मौजूद देश की दिग्गज एफएमसीजी कंपनी इमामी लिमिटेड भी अपने गोरेपन की क्रीम फेयर एंड हैंडसम से फेयर शब्द हटाने की सोच रही है। कंपनी को सुध आ गई है कि वह एक जिम्मेदार कॉर्पोरेट है और उपभोक्ताओं की भावनाओं का ध्यान रखती है जिसकी दुहाई दे रही है।

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संभव है कि अमेरिका में कोरोना महामारी के बीच भड़के नस्लीय हिंसा से डरी मल्टीनेशनल कंपनियां पहले ही भारत में अपनी पकड़...

मल्टीनेशनल कंपनियों ने चमड़ी के रंग को गोरा बनाने के झूठ को अपना बड़ा बाजार बनाया- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : social media
चर्चा तो यह भी है कि लॉरियल कंपनी भी अपने ब्रांड से व्हाइट, लाइट और फेयर जैसे शब्दों को डिलीट कर सकती है। अब यह सवाल समझने वालों के लिए है कि पहले ऐसी सुध क्यों नहीं आई? जॉर्ज फ्लायड की मौत के बाद ही क्यों ध्यान आया? फिर भी न देर आए, दुरुस्त आए।

आज से 45 साल पहले जब हिंदुस्तान यूनीलीवर ने पहली बार भारतीय महाद्वीप की सांवली लड़कियों की त्वचा को गोरा बनाने का रामबाण नुस्खा फेयर एण्ड लवली क्रीम देकर दिया। देखते ही देखते यह गांव-गांव के लोगों के दिलों में राज करने लग गई, कई-कई पीढ़ियां गुजर गईं लेकिन किसी का सांवला रंग बदला नहीं, लेकिन उम्मीद की आस में ऐसी क्रीमों की बाढ़ सी आ गई, बाजार बेहिसाब बढ़ता गया और पुरुषों को भी गोरा बनाने के लिए तमाम क्रीम, लोशन बाजार में  छा गए।

हकीकत से वाकिफ बढ़ता झूठा बाजारवाद और जानबूझकर छलावे को बढ़ावा देते उपभोक्ता संबंध, चोली-दामन जैसे रहे। न क्रीम का असर हुआ न सांवला रंग गया। अब नाम बदलकर वही धंधा जारी रखने की यह कवायद है।

जबकि सब जानते हैं कि लोगों की आंख और त्वचा की रंग का फर्क सिर्फ मेलेनिन की वजह से है। मेडिकल साइंस का कहता है कि यह मेलेनिन की मात्रा से होता है। मल्टीनेशनल कंपनियों ने चमड़ी के रंग को गोरा बनाने के झूठ को अपना बड़ा बाजार बनाया।

भारतीयों का शोषण किया। यहां ब्यूटी और पर्सनल केयर बाजार की दर 9 प्रतिशत सीएजीआर यानी कंपाउन्ड एनुअल ग्रोथ अर्थात् निवेश के विकास की वार्षिक दर बढ़ने का अनुमान है। 2017 में यह बाजार 14-15 अरब डॉलर था जो 2022 तक 22-23 अरब डॉलर हो सकता है।

शायद यही आंकड़ा भारत में गोरा बनाने वाली क्रीम कंपनियों को ललचा रहा हो? तभी नस्लभेद विरोधी एकाएक उग्र हुए आन्दोलनों से डर, भविष्य को आंकते हुए सचेत होकर खुद को संवारने की रणनीति के तहत ऐसा कुछ कर रहे हों जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।
 
संभव है कि अमेरिका में कोरोना महामारी के बीच भड़के नस्लीय हिंसा से डरी मल्टीनेशनल कंपनियां पहले ही भारत में अपनी पकड़ को मजबूत करने, काली चमड़ी को गोरी बनाने वाले अनफेयर धंधे को आगे फेयर नाम देकर जारी रखने की नई पैंतरेबाजी और तौर तरीकों में जुटी हो? 

बहरहाल, जिस देश में देवी-देवताओं की सांवली सूरत भी बिना किसी भेदभाव के पूरे श्रध्दा से पूजी जाती हों, वहां गोरी चमड़ी के खातिर नाम बदलकर ऐसा व्यापार कब तक चलेगा?
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 
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