कांग्रेस पार्टी को संगठन पर काम करने की जरूरत लगातार है।
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इंडिया गठबंधन के अस्तित्व पर भी उठेंगे सवाल
इन चुनावों के दम पर कांग्रेस विपक्षी गठबंधन में अपना सिक्का जमाना चाहती थी। वह साबित करना चाहती थी कि अगर भाजपा का मुकाबला करना है तो वह कांग्रेस ही कर सकती है और कांग्रेस की मदद से ही भाजपा को 2024 में हराया जा सकता है। जाहिर है कि नजर प्रधानमंत्री पद पर थी। इसी गलतफहमी में उसने इन चुनावों में ’इण्डिया गठबंधन’ के दलों से दूरी बनाए रखी।
कांग्रेस की रणनीति से सबसे अधिक नाराजगी अखिलेश यादव ने प्रकट की थी। आज अखिलेश अपनी बात दुहरा कर कांग्रेस के घावों में नमक छिड़क सकते हैं। अब कांग्रेस किस मुंह से पंजाब में आप से और उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी से और पश्चिम बंगाल में टीएमसी से लोकसभा चुनावों में अधिक सीटें मांगेगी।
कांग्रेस के एकला चलो रवैये से इंडिया गठबंधन को भी झटका लगा है। कांग्रेस ने गठबंधन के सहयोगियों का विश्वास अर्जित करने के बजाय उनका विश्वास तोड़ा है। इससे अब इंडिया गठबंधन के अस्तित्व पर ही सवाल उठने लगे हैं। स्वयं इस गठबंधन के प्रणेता नितीश कुमार गाहेबगाहे अपनी नाखुशी प्रकट कर ही रहे थे।
गहलोत और कमलनाथ ने डुबोया कांग्रेस को
राजस्थान में अशोक गहलोत और मध्य प्रदेश में कमलनाथ को लगाम न दे सकने का नतीजा भी इस चुनाव में दिखाई दे रहा है। कांग्रेस के लचर नेतृत्व के कारण इन दोनों बुजुर्गों की मनमानियों पर रोक नहीं लग सकी। जिसका नतीजा ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे परखे हुए वोट कमाऊ युवा नेता को खोना था। अगर सिंधिया आज कांग्रेस में होते तो मध्यप्रदेश में ऐसी दुर्दशा कांग्रेस की नहीं होती।
दरअसल, तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व सिंधिया का पक्षधर होते हुए भी कमलनाथ के आगे बेबस रहा और सरकार के गिरने के साथ ही कांग्रेस के वोट बैंक का एक बड़ा हिस्सा सिंधिया के साथ ही टूटकर भाजपा की ओर चला गया। कमलनाथ की गलतफहमी के कारण सपा जैसे छोटे दलों से इस चुनाव में गठबंधन नहीं हो सका, जिसका खामियाजा कांग्रेस ’इंडिया’ गठबंधन में भुगतेगी।
इसी तरह अशोक गहलोत व्यक्तिगत रंजिश के चलते युवा नेता सचिन पायलट को बाहर का रास्ता दिखाने के लिए निरन्तर उनकी आलोचना और हतोत्साहित करते रहे। वह पायलट को हमेशा अपने रास्ते का कांटा मानकर उनके खिलाफ बोलते रहे, इसलिए कांग्रेस के गुजर वोट बैंक का खिसक कर भाजपा के पाले में जाना स्वाभाविक ही था। गुर्जर समाज को लगा कि अब उनके नेता सचिन की कांग्रेस में कोई संभावनाएं नहीं हैं।
इसी तरह हार्दिक पटेल ने गुजरात में किनाराकसी कर अपने भविष्य का मार्ग चुना था। लोकतंत्र में विपक्ष का भी मजबूत होना जरूरी है। अन्यथा तानाशाही का खतरा बना रहता है। किसी भी दल का अजेय होना भी मनमानी की संभावनाओं को बढ़ाता है जैसा नजर आ भी रहा है।
पार्टी को अंदर और बाहर से संगठन को मजबूत करना होगा
पार्टी राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा को जिस तरह से कैश करना था वह कर नहीं पाई। खासतौर पर राहुल गांधी अपने बयानों से ही अपनी मेहनत पर पानी फेरते दिखे। यही नहीं संगठन के भीतर जिस तरह से चुनावों की तैयारियां की जानी थी वह नही दिखी। ऐसा लगा मानों मप्र में कमलनाथ, छग में बघेल और राजस्थान में गहलोत ही एक कांग्रेस बनकर सामने थे। ऐसा लगा नहीं कि राष्ट्रीय स्तर की एक पार्टी चुनावों में उतरी है जबकि इसके ठीक उलट भाजपा ने प्रधानमंत्री को चेहरा बनाकर तीनों राज्यों में चुनावों को एक बड़ी चुनौती बनाकर पेश किया। दरअसल, जीत की तैयारी ना कांग्रेस ने दिखाई बल्कि संगठन में कार्यकर्ता भी वैसे उत्साहित नहीं लगे।
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