फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

एग्जिट पोल 2019: कितने भरोसेमंद हैं अनुमान? क्या सटीक होंगे परिणाम?

विज्ञापन
ये अनुमान हर बार सटीक भले ही न बैठें हों लेकिन सीटों का अनुमान सामने आता है - फोटो : Amar Ujala
विज्ञापन

17वीं लोकसभा के लिए रविवार को सातवें चरण यानी अंतिम चरण का मतदान संपन्न हो गया। वोटिंग खत्म होते ही सभी पार्टियों और आम जनता की नजर अब चुनाव परिणाम पर जाकर टिक गई है। चुनाव परिणाम का अनुमान लगाने वाली एजेंसियां सक्रिय हो गई हैं। ये अनुमान हर बार सटीक भले ही न बैठें हों, लेकिन नतीजों से पहले चुनाव परिणाम की झांकी यह तो साबित ही कर देती है कि आखिर किसका पलड़ा भारी है और किसका हल्का। मसलन एग्जिट पोल्स यह साबित तो कर ही देता है कि किस पार्टी की स्थिति कैसी है। 

विज्ञापन


कैसे शुरू हुआ एग्जिट पोल 
लगभग सभी बड़े चैनल्स विभिन्न एजेंसियों के साथ मिलकर आखिरी चरण का मतदान खत्म होते ही एग्जिट पोल्स दिखाती हैं। इसमें बताया जाता है कि नतीजे किसके पक्ष में होंगे और किस पार्टी को कितनी सीटें मिल सकती हैं। इनसे एक मोटा-मोटा अंदाजा हो जाता है कि नतीजे क्या आ सकते हैं। हालांकि, यह कहना ठीक नहीं कि चुनाव के नतीजे एग्जिट पोल्स के अनुसार ही हों। भारत में सबसे पहले एग्जिट पोल 1960 में सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डिवेलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) ने जारी किए थे। 

क्यों नहीं होते हैं सटीक परिणाम? 
सबसे पहले यह जानते है कि एग्जिट पोल करने का तरीका क्या होता है? एग्जिट पोल के लिए तमाम एजेंसीज वोट डालने के तुरंत बाद वोटर्स से उनकी राय जानती हैं और उन्हीं रायों के आधार पर परिणाम पूर्व अनुमान लगाया जाता है। भारत में जहां चुनाव विकास से लेकर जाति-धर्म जैसे तमाम मुद्दों पर लड़ा जाता है, ऐसे में मतदाता ने किसको वोट दिया है, यह पता करना भी आसान नहीं है। अक्सर मतदाता इस सवाल का सही जवाब नहीं देते कि उन्होंने किसे वोट दिया। इस वजह से भी एग्जिट पोल्स चुनावी नतीजों से विपरीत जाते रहे हैं। ऐसे में एग्जिट पोल पर पूर्णतः भरोसा नहीं किया जा सकता। 
विज्ञापन


ओपिनियम पोल और एग्जिट पोल 
यहां यह बताना जरूरी है कि एग्जिट पोल और चुनाव से पहले ओपिनियन पोल में थोड़ा अंतर है। ओपिनियन पोल में वोटर्स की राय जानी जाती है और उसी आधार पर सर्वे तैयार किया जाता है, जबकि एग्जिट पाल में चुनाव परिणाम के बारे में बताई जाती है।

रीप्रिजेंटेशन ऑफ द पीपल ऐक्ट, 1951 के सेक्शन 126 के तहत चुनाव के शुरू होने से पहले और आखिर चरण की वोटिंग के खत्म होने के आधे घंटे बाद ही एग्जिट पोल्स दिखा सकते हैं। सेक्शन में साफ कहा गया है कि कोई भी किसी भी तरह के एग्जिट पोल को मीडिया के किसी रूप (प्रिंट या इलेक्ट्रोनिक) में दिखा या छाप नहीं सकता। इस नियम को तोड़ने पर दो साल की सजा, जुर्माना या फिर दोनों का प्रावधान है। 
 

विज्ञापन

एग्जिट पोल पर पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं। - फोटो : Amar Ujala
लगते रहे हैं पक्षपात के आरोप 
आलोचक और राजनीतिक पार्टियां अक्सर एग्जिट पोल्स करवाने वाली एजेंसियों को अपनी पसंद, तरीके आदि के हिसाब से पक्षपात का आरोप लगाती रही हैं। हालांकि इस मामले में सर्वेक्षण एजेंसियों पर बहुत भरोसा नहीं किया जा सकता है, लेकिन कुछ हद तक इसमें नैतिकता होती है क्योंकि यहां एजेंसियों की विश्वसनीयता का सवाल होता है। मसलन उनके पक्ष में न आने पर पार्टियां यह तक कहती हैं कि विरोधी दलों ने एग्जिट पोल्स एजेंसियों को इसके लिए पैसे देकर मतदाता की असल भावना को छिपाया है।

सभी जगह है एग्जिट पोल का हिसाब-किताब 
एग्जिट पोल केवल भारत में ही नहीं होते हैं बल्कि दुनिया में जहां कहीं भी संसदीय लोकतंत्र हैं वहां लगभग इस प्रकार के चुनाव पूर्व सर्वेक्षण जारी करने की परिपाटी है। चूंकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और यहां जितने वोटर हैं उतने वोटर शायद ही दुनिया के किसी लोकतांत्रिक देश में हों। लिहाजा भारत के बारे में जानकारी दुनिया के लोगों के लिए सदा से कौतुहल पैदा करता रहा है।

खास बात यह है कि इस बार जो चुनाव हो रहा है वह भारतीय लोकतंत्र की दिशा तय करेगा, साथ ही भारत में चुनाव प्रचार की प्रकिया को भी प्रभावित करेगा। 
 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें