प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध प्रयोग क्यों?
वर्तमान समय में प्रकृति के संसाधनों का हम इतना अंधाधुंध प्रयोग करते जा रहे हैं कि हमें अपनी आगामी पीढ़ियों की चिंता ही नहीं है। पेयजल की बात करें तो हमारी आने वाली पीढ़ी तो दूर, हमारे खुद के लिए वर्तमान में इसकी कमी विकराल समस्या बनती जा रही है। पेड़, कोयला, रेत जैसे अन्य प्राकृतिक संसाधनों का भी यही हाल हो रहा है।
प्रकृति हमें खुद भविष्य के खतरों के प्रति आगाह कर रही है, लेकिन हम सावधान नहीं हो रहे। पर्यावरण से जुड़े कुछ तथ्यों पर गौर करें तो यह न केवल हमें चौंकाती है, बल्कि सावधान भी करती है।
- सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट की रिपोर्ट के अनुसार गंगा और यमुना नदी की दुनिया की 10 सबसे प्रदूषित नदियों में गिना जाता है।
- एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में 13 शहर सिर्फ भारत के हैं।
- हम जो टॉयलेट पेपर इस्तेमाल करते हैं, उसके लिए हर साल करीब 27000 पेड़ काटे जाते हैं।
- अगर एक टन कागज को रिसाइकिल किया जाए तो 20 पेड़ और 7000 गैलन पानी बचाया जा सकता है।
- यही नहीं, इससे जो बिजली बचेगी, उससे 6 महीने तक घर को रोशन किया जा सकता है।
- एक रिपोर्ट के अनुसार भारत वर्ष प्रदूषण के कारण करीब दो लाख करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ता है।
हमको, आपको समझना होगा, ताकि देर न हो जाए
पर्यावरण संरक्षण को लेकर अब केवल चर्चा का समय नहीं रह गया है। जागरूकता अभियानों के बीच सेमिनार और सम्मेलनों से आगे बढ़ते हुए हमको-आपको यह समझना ही होगा पर्यावरण संरक्षण हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण है। फिर से मैं वहीं आना चाहूंगी, जहां से मैंने अपनी बात शुरू की थी। हमें अपनी आवश्यकता और विलासिता का अंतर समझना होगा।
हमें जीवन के लिए ऑक्सीजन चाहिए तो हमें पेड़ भी लगाना चाहिए। हमें पीने के लिए पानी चाहिए तो जल संरक्षण भी करना होगा। हमें अपने लिए घर बनाना है, तो बेडरूम, किचन और टॉयलेट की तरह 'रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम' को भी मकान निर्माण में जगह देनी होगी। जल संकट न हो, इसके लिए भूजल स्तर को बनाए रखना होगा। प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग में सावधानी बरतनी होगी।
...और सबसे जरूरी बात इन सारी चर्चाओं को केवल आज के दिन नहीं बल्कि सालों भर जेहन में रखना होगा और अमल में लाना होगा। तभी हम रोजमर्रा की जिंदगी में अपने छोटे-छोटे प्रयासों से पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा सकते हैं।