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जीवन धारा: मनुष्य कभी रुकता नहीं

Sat, 27 Dec 2025 05:25 AM IST
लव गौर लुईस थॉमस

सार

मनुष्य अपनी बेचैनी का इस्तेमाल करने वाला प्राणी है और उसकी महानता इसी क्षमता में छिपी है कि वह डर के साथ जीते हुए भी जिंदगी में आगे बढ़ना नहीं छोड़ता।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
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मनुष्य प्रकृति की सबसे अनोखी रचना है-एक ऐसा जीव, जो अपने अनुभवों से कम और अपनी कल्पनाओं से अधिक संचालित होता है। उसके भीतर स्मृतियों तथा संभावनाओं का एक सतत प्रवाह चलता रहता है। वह बीते हुए समय में लौटता है, आने वाले समय में भटकता है, और इसी यात्रा में वर्तमान क्षण उसकी पकड़ से छूट जाता है। जहां अन्य जीव भोजन, सुरक्षा और प्रजनन की सीमाओं में संपूर्णता पा लेते हैं, वहीं मनुष्य की चेतना ‘क्या होगा’ की अनिश्चितता में भटकती रहती है और यही बेचैनी उसे आगे भी बढ़ाती है और भीतर से खोखला भी कर देती है।
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हमारी बुद्धि, जिसने कला, विज्ञान, भाषा और सभ्यता की अद्भुत इमारतें खड़ी कीं, उसी ने हमें भय भी दिए हैं-असफलता का भय, अकेलेपन का भय, और मृत्यु का भय। यह विडंबना है कि हम जानते हैं कि अंत निश्चित है, फिर भी उसे मन से स्वीकारना हमारे लिए कठिन है। शायद इसी असमर्थता ने हमें अमरता के प्रतीक गढ़ने पर मजबूर किया-धर्म में, विचारों में, साहित्य और संरचनाओं में, अपनी स्मृतियों में, ताकि किसी रूप में हम प्रवाह में बने रह सकें।

मनुष्य रुकने से डरता है, क्योंकि स्थिरता में उसे अपने भीतर के प्रश्न सुनाई देने लगते हैं, शांति में उसकी चिंताएं आकार लेने लगती हैं, और वह उनसे बचने के लिए शोर, काम तथा व्यस्तता का कवच ओढ़ लेता है। फिर भी, यही चिंता, जो उसे अस्थिर करती है, वही उसे खोज की ओर भी धकेलती है। भविष्य की अनिश्चितता ने हमें रोगों के उपचार खोजने, न्यायपूर्ण समाज बनाने और ब्रह्मांड के रहस्यों में झांकने की हिम्मत दी है।
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दरअसल, मनुष्य के अस्तित्व का एक गहरा विरोधाभास है कि वह चिंता से टूटता भी है और उसी से निखरता भी है। अगर वह अपने विकास के द्वंद्व को समझने व संभालने की कला सीख ले, तो वह ज्ञान, करुणा एवं संतुलित जीवन में बदल सकता है।

मनुष्य अपनी बेचैनी का इस्तेमाल करने वाला प्राणी है और उसकी महानता इसी क्षमता में छिपी है कि वह डर के साथ जीते हुए भी जिंदगी में आगे बढ़ना नहीं छोड़ता।   
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