यूरोपियन यूनियन के इन सांसदों ने दिल्ली में अपनी पत्रकार वार्ता में जो कहा है उसने पाकिस्तान के दुष्प्रचार को खोखला साबित करने का काम किया
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अनुच्छेद 370 के हटाए जाने के बाद से पाकिस्तान ने पूरी दुनिया में कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघन औऱ सुरक्षा बलों के कथित दमन को लेकर दुष्प्रचार की हदें पार कर दी। लेकिन भारत सरकार के राजनयिक कौशल ने इस प्रोपेगेंडा को जमीन से उखाड़ने का सफलतापूर्वक काम किया है। यूरोपियन यूनियन दुनिया का सबसे प्रभावशाली दबाब समूह है जिसमें इंग्लैंड, फ्रांस, पोलेंड, जर्मनी जैसे 28 मुल्कों का प्रतिनिधित्व है।भारत आए इस प्रतिनिधि मंडल में 27 देशों के निर्वाचित सांसद शामिल हैं।
यूरोपियन यूनियन के इन सांसदों ने दिल्ली में अपनी पत्रकार वार्ता में जो कहा है उसने पाकिस्तान के दुष्प्रचार को खोखला साबित करने का काम किया क्योंकि इन सांसदों ने आतंकवाद को भारत के साथ साथ यूरोप समेत पूरी दुनिया के लिए खतरा बताया है। यूनियन के सदस्यों ने सार्वजनिक रूप से कश्मीर में सामान्य स्थिति का दावा किया उन्होंने सुरक्षा बलों ,सेना,औऱ पुलिस से आतंकवाद से निबटने के तौर तरीकों की खुली चर्चा कर इन बलों के विरुद्ध चलाए जा रहे पाकिस्तानी दुष्प्रचार को खंडित किया है।
भारतीय पत्रकारों के सवालों का जबाब देते हुए इन सांसदों ने स्पष्ट किया कि वे कश्मीर में सिर्फ वास्तविकता का पता लगाने आए हैं और उनका अनुभव भारत सरकार की नीतियों के साथ है। कश्मीर में लोगों ने उन्हें बताया कि केंद्र सरकार से उनकी बेहतरी के लिये आने वाले धन को राज्य की सरकार हड़प रही थीं। आम कश्मीरी अमन औऱ विकास चाहता है, इसलिए कश्मीर को लेकर भारत के रुख को समझा जाना चाहिये। इन सभी बातों का अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से विश्लेषण किया जाए तो यह कश्मीर के मामले में भारत की अहम प्रोपेगैंडा जीत भी है क्योंकि राजनय में बहुत से पहलुओं का जबाब शत्रु देश की चाल के अनुरूप भी देना पड़ता है।
delegation of European Union
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यूरोपियन यूनियन के संसदीय प्रतिनिधी मंडल का यह कश्मीर दौरा इसी कूटनीतिक एजेंडे का हिस्सा भी मान लिया जाए तो राष्ट्रीय हित में इस पर क्यों आपत्ति की जा रही है। भारत में बहुलतावाद की बात करने वाले राजनीतिक ,सांस्कृतिक दल बिना अध्ययन के इस प्रतिनिधि मंडल पर नाजीवादी होने का आरोप क्या सिर्फ इसलिये लगा रहे है क्योंकि वे प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से मिलकर घाटी में लोगों से मिलने गए थे। राहुल गांधी, ओबैसी, शिवसेना,डॉ सुब्रमण्यम स्वामी जैसे लोगों के आरोपों का जिस मुखरता के साथ इस प्रतिनिधि मंडल ने जबाब दिया है वह कश्मीर मामले पर इनकी निष्ठा और समझ दोनों को कटघरे में खड़ा कर गया।
सवाल यह है कि अगर कश्मीर पर किसी अंतर्राष्ट्रीय दबाब समूह के समक्ष भारत का पक्ष मजबूती से रखा जा रहा हो और पाकिस्तान के प्रोपेगैंडा बार की हवा निकालने में मददगार हो तो ऐसे किसी भी उपक्रम का विरोध क्यों किया जाए?क्या भारत मे मोदी विरोध की राजनीति विदेशियों तक को निशाना बनाने से नहीं चुकेगी ? अगर यह भारत की स्थानीय राजनीति में स्थाई रूप से घर कर रही है तो बेहद ही खतरनाक औऱ दुःखद पहलू है। क्योंकि राष्ट्रीय हितों को हमारी संसदीय सियासत ने सदैव मतभेदों से परे रखा है। अटल जी को राष्ट्रमंडल औऱ तमाम कूटनीतिक मिशनों में तब की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी भारत का नेतृत्व करने भेजती थी औऱ विपक्षी नेता भी भारत से बाहर भारत के प्रतिनिधि बनकर मुखरित होते थे। आज के कमजोर विपक्ष को अपने पूर्वजों के इतिहास उनकी समग्र दृष्टि को समझने की महती आवश्यकता है।
यूरोपियन यूनियन सांसदों के मामले में जो आचरण कुछ राजनीतिक दलों ने किया उसने न केवल भारत के पक्ष को कमजोर किया है बल्कि कश्मीर के मामले में खुद की राष्ट्रीय सोच को भी देश की जनता के सामने बेनकाब कर दिया है।
यही कारण है कि मोदी भारत मे लोकप्रिय नेता के रूप में जमे हुए है और दूसरे नेता जनभावनाओं को समझने के लिए तैयार नहीं है।
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