तेल कंपनियों ने इथेनॉल आपूर्ति वर्ष 2026-27 के लिए 1,100 करोड़ लीटर इथेनॉल खरीदने की निविदा जारी की है। इस निविदा में मक्का से बनने वाले इथेनॉल की तुलना में टूटे चावल से बनने वाले इथेनॉल को कम कीमत पर खरीदने का विकल्प मौजूद है। इससे मक्का किसानों की कमाई, चावल की मांग और खाद्य पदार्थों की कीमतों पर असर पड़ने की आशंका जताई गई है। सवाल यह है कि क्या इथेनॉल की खरीद में कुछ रुपये बचाने की कोशिश देश के किसानों और उपभोक्ताओं पर भारी पड़ सकती है?
इथेनॉल की नई निविदा में ऐसा क्या है, जिससे सवाल उठ रहे हैं?
तेल विपणन कंपनियों ने इथेनॉल आपूर्ति वर्ष 2026-27 के लिए 1,100 करोड़ लीटर इथेनॉल खरीदने की निविदा जारी की है। इस बार गन्ने के रस, चीनी के घोल और बी-हैवी शीरे को निविदा से बाहर रखा गया है। ऐसे में इथेनॉल की ज्यादातर जरूरत अनाज से पूरी करनी होगी। सी-हैवी शीरे और दूसरे अनुमत स्रोतों से भी कुछ मात्रा मिल सकती है, लेकिन अनाज की भूमिका बढ़ने की संभावना है। पिछले साल गन्ने पर आधारित स्रोतों के लिए करीब 289 करोड़ लीटर इथेनॉल आवंटित किया गया था। अब इस मांग का बड़ा हिस्सा दूसरे स्रोतों की ओर जा सकता है। अनाज से इथेनॉल बनाने वाले उद्योगों के सामने बड़ी मात्रा में आपूर्ति का अवसर है, लेकिन इसी के साथ सस्ती कीमत पर उत्पादन करने का दबाव भी बढ़ सकता है।
क्या टूटे चावल से इथेनॉल बनाना मक्का किसानों के लिए चुनौती बनेगा?
- इथेनॉल की खरीद के लिए अलग-अलग कच्चे माल की अलग-अलग कीमत तय की गई है। मक्का से बने इथेनॉल की कीमत 68.86 रुपये प्रति लीटर रखी गई है, जबकि क्षतिग्रस्त खाद्यान्न यानी डीएफजी से बनने वाले इथेनॉल की कीमत 64 रुपये प्रति लीटर है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, टूटे चावल से बनने वाले इथेनॉल की आपूर्ति पिछले साल के करीब 80 करोड़ लीटर से बढ़कर 700 करोड़ लीटर से अधिक हो सकती है। यदि ऐसा होता है तो सवाल उठेगा कि इतनी बड़ी मात्रा में टूटे चावल की उपलब्धता कहां से होगी।
- टूटे चावल का हर दाना इंसानों के खाने लायक नहीं होता, लेकिन यह मान लेना भी सही नहीं होगा कि टूटे चावल का पूरा हिस्सा खाने के अनुपयोगी है। इसका इस्तेमाल भोजन, खाद्य प्रसंस्करण और पशु आहार में भी होता है। यदि इसकी बड़ी मात्रा इथेनॉल बनाने में इस्तेमाल होने लगी तो भोजन, पशु आहार और ईंधन बनाने वाले उद्योगों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। इससे अनाज की मांग और कीमतों पर दबाव पड़ने की आशंका है। ऐसे में इथेनॉल खरीदने में प्रति लीटर कुछ रुपये की बचत का फायदा खाद्य पदार्थ महंगे होने से कम भी पड़ सकता है।
जब सरकार मक्का की खेती को बढ़ावा दे रही है, तो उसके इथेनॉल की कीमत क्यों घटाई गई?
- वर्ष 2023 से सरकार मक्का को इथेनॉल उत्पादन के लिए एक औद्योगिक फसल के रूप में बढ़ावा देने की कोशिश कर रही है। किसानों को धान जैसी अधिक पानी लेने वाली फसलों से हटाकर मक्का की खेती की ओर लाने के लिए प्रोत्साहन दिए गए। इथेनॉल उत्पादन में मक्का की मांग बढ़ने से किसानों को एक नया बाजार मिलने की उम्मीद थी। लेकिन नई निविदा में मक्का से बनने वाले इथेनॉल के लिए प्रोत्साहन 5.79 रुपये से घटाकर 2.79 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है।
- इससे इसकी खरीद कीमत 68.86 रुपये प्रति लीटर रह गई है। दूसरी ओर, टूटे चावल से बनने वाले इथेनॉल की कीमत 64 रुपये प्रति लीटर है। कम कीमत वाले विकल्प के सामने मक्का आधारित इथेनॉल बनाने वाली कंपनियों पर भी लागत घटाने का दबाव पड़ सकता है। निविदा की शर्त के मुताबिक, यदि किसी आपूर्तिकर्ता को कम कीमत वाले कच्चे माल के आधार पर आवंटन मिलता है और बाद में वह कच्चा माल बदलता है, तो उसे मूल आवंटित स्रोत और प्रस्तावित स्रोत में से कम कीमत ही दी जाएगी।
- इससे भी उत्पादकों के फैसले प्रभावित हो सकते हैं। यदि कंपनियों को कम कीमत पर इथेनॉल बेचना पड़ेगा तो वे मक्का खरीदने के लिए किसानों को कितना दाम दे पाएंगी, यह बड़ा सवाल है। किसान उसी फसल को उगाना पसंद करेंगे, जिससे उन्हें लागत के मुकाबले बेहतर और भरोसेमंद कमाई मिले।
क्या चावल की मांग बढ़ने से फसल विविधीकरण की कोशिशों को झटका लगेगा?
- सरकार लंबे समय से उन क्षेत्रों में धान की खेती पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रही है, जहां भूजल का स्तर दबाव में है। धान की खेती में अधिक पानी की जरूरत होती है, जबकि मक्का को वैकल्पिक फसल के तौर पर बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके पीछे उद्देश्य केवल इथेनॉल बनाना नहीं, बल्कि मक्का पर आधारित एक मजबूत घरेलू औद्योगिक व्यवस्था तैयार करना भी है। मक्का का इस्तेमाल इथेनॉल के अलावा स्टार्च, पशु आहार और दूसरे उद्योगों में होता है। यदि किसानों को मक्का की लगातार मांग और उचित कीमत का भरोसा मिलता है तो वे इसकी खेती बढ़ाने और उत्पादन सुधारने में निवेश कर सकते हैं।
- इसके उलट, यदि इथेनॉल खरीद में सस्ते टूटे चावल को प्राथमिकता मिलती है तो मक्का का बाजार कमजोर पड़ सकता है। दूसरी तरफ, चावल को पहले से सरकारी खरीद, सब्सिडी और सार्वजनिक खर्च का समर्थन मिलता है। इथेनॉल उद्योग में इसकी अतिरिक्त मांग बढ़ने पर धान और चावल से जुड़े बाजार को और सहारा मिल सकता है। इस तरह एक ओर मक्का की खेती बढ़ाने की कोशिश और दूसरी ओर चावल आधारित इथेनॉल को सस्ता विकल्प बनाने की नीति के बीच विरोधाभास दिखाई देता है। हालांकि, इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अलग-अलग स्रोतों से कितनी मात्रा में इथेनॉल खरीदा जाता है और किसानों को उनकी उपज का कितना दाम मिलता है।
क्या सबसे सस्ता इथेनॉल ही देश की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे अच्छा विकल्प है?
भारत के इथेनॉल कार्यक्रम के पीछे कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटाने, किसानों की आमदनी बढ़ाने, फसलों में विविधता लाने और घरेलू उद्योगों को मजबूत करने जैसे उद्देश्य रहे हैं। लेकिन यदि खरीद का मुख्य आधार केवल इथेनॉल की सबसे कम कीमत बन जाए तो इन उद्देश्यों पर असर पड़ सकता है। उद्योग से जुड़े डॉ. सीके जैन, जो ग्रेन इथेनॉल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं, ने नई निविदा को लेकर मक्का किसानों, उपभोक्ताओं और घरेलू कृषि आपूर्ति व्यवस्था पर पड़ने वाले संभावित असर के सवाल उठाए हैं। उनके मुताबिक, सरकार को मक्का की खेती के लिए आर्थिक प्रोत्साहन बनाए रखने, खाने योग्य टूटे चावल के इथेनॉल में इस्तेमाल पर सावधानी से विचार करने और कच्चे माल की खरीद को कृषि नीति के व्यापक उद्देश्यों के अनुरूप रखने की जरूरत है।
इथेनॉल की कीमत कम रखना महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ यह भी देखना होगा कि इससे किसानों की कमाई, अनाज की उपलब्धता और खाद्य महंगाई पर क्या असर पड़ता है। यदि सस्ता इथेनॉल बनाने के लिए मक्का किसानों का बाजार कमजोर होता है या चावल की मांग बढ़ने से खाद्य पदार्थ महंगे होते हैं, तो शुरुआती बचत का लाभ सीमित हो सकता है। इसलिए असली सवाल केवल यह नहीं है कि कौन-सा इथेनॉल सबसे सस्ता है, बल्कि यह भी है कि कौन-सा विकल्प किसानों, उपभोक्ताओं और देश की औद्योगिक जरूरतों के बीच बेहतर संतुलन बनाता है।
(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेख में दी गई जानकारी और तथ्यों के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।)