सर विश्वेश्वरैया ने इंजीनियरिंग के क्षेत्र में कई इनोवेशन किए।
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क्या किया विश्वेश्वरैया ने?
आज से लगभग 100 साल पहले जब साधन और तकनीक इतनी ज्यादा उन्नत नहीं थी। विश्वेश्वरैया ने आम आदमी की समस्याओं को सुलझाने के लिए इंजीनियरिंग में कई तरह के इनोवेशन किए और व्यवहारिक तकनीक के माध्यम आम आदमी की जिंदगी को सरल बनाया। असल में इंजीनियर वह नहीं है जो सिर्फ मशीनों के साथ काम करें बल्कि वह है जो किसी भी क्षेत्र में अपने मौलिक विचारों और तकनीक के माध्यम मानवता की भलाई के लिए काम करे ।
देश और समाज के निर्माण में एक इंजीनियर की रचनात्मक भूमिका कैसे होनी चाहिए इस बात को विश्वेश्वरैया के प्रेरणादायक जीवन गाथा से जाना और समझा जा सकता है। विश्वेश्वरैया न केवल एक कुशल इंजीनियर थे बल्कि देश के सर्वश्रेष्ठ योजना शिल्पी, शिक्षाविद् और अर्थशास्त्री भी थे। तत्कालीन सोवियत संघ (रूस) द्वारा वर्ष 1928 में तैयार पंचवर्षीय योजना से भी आठ वर्ष पहले 1920 में अपनी पुस्तक रिकंस्ट्रक्टिंग इंडिया में उन्होंने भारत में पंचवर्षीय योजना की परिकल्पना प्रस्तुत कर दिया था।
1935 में उनकी एक पुस्तक प्लान्ड इकॉनामी फॉर इंडिया देश के विकास के लिए योजना बनाने के लिए बहुत महत्वपूर्ण थी। 98 वर्ष की उम्र में भी उन्होंने प्लानिंग पर एक पुस्तक लिखा। ईमानदारी और कर्त्तव्य के प्रति अपनी वचनबध्दता उनके जीवन की सबसे बड़ी विशेषता थी। बंगलुरू स्थित हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स की स्थापना में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही ।
आज से कई दशक पहले गांधी जी ने कहा था की देश की समग्र उन्नति और आर्थिक विकास के लिए तकनीकी शिक्षा का गुणवत्ता पूर्ण होना बहुत जरुरी है उन्होंने इसको प्रभावी बनाने के लिए कहा था की कॉलेज में हाफ-हाफ सिस्टम होना चाहिए मतलब की आधे समय में किताबी ज्ञान दिया जाए और आधे समय में उसी ज्ञान का व्यावहारिक पक्ष बताकर उसका प्रयोग सामान्य जिन्दगी में कराया जाए।
भारत में तो गांधी जी की बातें ज्यादा सुनी नहीं गई पर चीन ने उनके इस प्रयोग को पूरी तरह से अपनाया और आज स्थिति यह है की चीन उतपादन की दृष्टि में चीन भारत से बहुत आगे है। भारतीय बाजार चीनी सामानों से भरे पड़े है दिवाली, रक्षाबंधन हमारे देश के प्रमुख त्यौहार हैं पर आज बाजार में सबसे ज्यादा पटाखे और राखियां चीन की ही बनी हुई मिलती हैं।
स्वतंत्रता प्राप्ति के समय हमारा इंजीनियरिंग व प्रौद्योगिकी ढांचा न तो विकसित देशों जैसा मजबूत था और न ही संगठित।
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इंजीनियरिंग में है इनोवेशन की जरूरत
वास्तव में हम अपने ज्ञान को बहुत ज्यादा व्यावहारिक नहीं बना पाए हैं। नंबर होड़ युक्त शिक्षा प्रणाली ने मौलिकता को ख़त्म कर दिया। इस तरह की मूल्यांकन और परीक्षा प्रणाली नई सोच और मौलिकता के लिए ठीक नहीं है। आज तकनीकी शिक्षा में खासतौर पर इंजीनियरिंग में इनोवेशन की जरूरत है सिर्फ रटें रटाए ज्ञान की बदौलत हम विकसित राष्ट्र बनने का सपना साकार नहीं कर सकते। देश की आतंरिक और बाहरी चुनौतियों से निपटने के लिए हमें दूरगामी रणनीति बनानी पड़ेगी, क्योंकि भारत पिछले छह दशक के दौरान अपनी अधिकांश प्रौद्योगीकीय जरूरतों की पूर्ति दूसरे देशों से कर रहा है।
हमारे घरेलू उद्योगों ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज कराई है इसलिए देश की जरूरतों को पूरा करने के लिए भारतीय उद्योग के कौशल संसाधनों एवं प्रतिभाओं का बेहतर उपयोग करना जरूरी है, क्योंकि आयातित टेक्नोलॉजी पर हम ब्लैकमेल का शिकार भी हो सकते हैं। इसके लिए मध्यम और लघु उद्योगों की प्रौद्योगिकी के आधुनिकीकरण व स्वदेशीकरण में अहम भूमिका हो सकती है।
देश में स्वदेशी प्रौद्योगिकी को बड़े पैमाने पर विकसित करने की जरूरत है और इस दिशा में जो भी समस्याएं है उन्हें सरकार द्वारा अविलम्ब दूर करना होगा तभी सही मायनों में हम विकसित राष्ट्र का अपना सपना पूरा कर पाएंगे।
सर विश्वेसरैया ने देश के भावी इंजीनियरों को सन्देश देते हुए कहा था कि मानवता की भलाई तथा देश के वातावरण को ध्यान में रखते हुए राष्ट्र निर्माण में अपना पूर्ण सहयोग प्रदान करें। एक व्यक्ति के तौर पर अपने कार्य और समय के प्रति जो लग्न, निष्ठा, प्रतिबद्धता उनमें थी, वो शायद ही किसी में देखने को मिल सके। मैसूर प्रांत के दिवान होते हुए भी उनमें लेश मात्र भी अहंकार नहीं था। यदि वो चाहते तो अपनी काबलियत के आधार पर विदेश में कार्य कर सकते थे लेकिन उन्होंने भारत भूमि की सेवा को सर्वोपरि रखा। निष्ठा और लग्न के कारण ही डॉ. विश्वेसरैया आज देश के वैज्ञानिकों, इंजीनियरों व अन्य बुद्धिजीवियों में पूजनीय हैं।
स्वतंत्रता प्राप्ति के समय हमारा इंजीनियरिंग व प्रौद्योगिकी ढांचा न तो विकसित देशों जैसा मजबूत था और न ही संगठित। इसके बावजूद प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हमने काफी कम समय में बड़ी उपलब्धियां हासिल की।
स्वतंत्रता के बाद भारत का प्रयास यही रहा है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के माध्यम से आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन भी लाया जाए, जिससे देश के जीवन स्तर में संरचनात्मक सुधार हो सके। इस उद्देश्य में हम कुछ हद तक सफल भी रहें है लेकिन अभी भी इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी को आम जन मानस से पूरी तरह से जोड़ नहीं पाए हैं।
आज देश को विश्वेसरैया जैसे इंजीनियरों की जरूरत है जो देश को एक नई दिशा दिखा सके क्योंकि आज के आधुनिक विश्व में विज्ञान,तकनीक और इंजीनियरिंग के क्रमबद्ध विकास के बिना विकसित राष्ट्र का सपना नहीं सच किया जा सकता। इसके लिए देश में इंजीनियरिंग की पढ़ाई को कौशल विकास से जोड़ना होगा जिससे इंजीनियर अपने स्किल के साथ काम कर सकें साथ ही पूरे इंजीनियरिंग क्षेत्र को आकर्षक ,व्यवहारिक और रोजगारपरक बनाने की जरूरत है ।
(लेखक मेवाड़ यूनिवर्सिटी में डिप्टी डायरेक्टर और टेक्निकल टूडे पत्रिका के संपादक हैं)
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