नीतीश कुमार क्या स्थिति को संभाल नहीं पाए?
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लीची के इलाकों में ही क्यों होता है इंसेफलाइटिस का आतंक?
इस सवाल के अनेकानेक जवाब हैं। कोई स्पष्ट जवाब नहीं है। कल यानी 16 जून 2019 को जब केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्द्धन मुजफ्फरपुर गए थे तब उन्होंने एक बार फिर जांच प्रयोगशाला स्थापित करने की बात कही। उनके मुताबिक मुजफ्फरपुर सहित चार अन्य पड़ोसी जिलों में ये प्रयोगशालाएं स्थापित की जाएंगी। पाठक यह भी जान लें कि 2014 में भी हर्षवर्द्धन इंसेफलाइटिस से पीड़ित बच्चों को देखने आए थे। उस वर्ष बिहार में 265 बच्चों की जान कथित तौर पर इंसेफलाइटिस ने ली। कथित रूप से इसलिए कि सरकार की ओर से आजतक यह नहीं बताया गया है कि बच्चों की मौत किस कारण से हो रही है।
एक दिलचस्प बयान सुनिए
मुजफ्फरपुर के मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. शैलेश प्रसाद के मुताबिक, लीची से इस बीमारी का कोई लेना-देना नहीं है। वे बताते हैं कि मुजफ्फरपुर में सरकार द्वारा बच्चों को स्वस्थ बनाए रखने के लिए तमाम तरह के उपाय किए जाते हैं। इनमें उन्हें आयरन, कैल्शियम, प्रोटीन आदि की गोलियां समय-समय पर दी जाती हैं। यानी मुजफ्फरपुर में कुपोषण समस्या नहीं है। फिर बच्चे इंसेफलाइटिस के कारण क्यों मर जाते हैं? यह पूछने पर उनका जवाब है कि लीची के दिनों में बच्चे दोपहर में लीची के बगानों में घूमते रहते हैं और इस कारण वे शिकार हो जाते हैं।
बहरहाल, जब राज्य के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया है कि वे नेता हैं, डॉक्टर नहीं, फिर एक नौकरशाह चिकित्सक से एक गंभीर जवाब की उम्मीद बेमानी है। हद तो यह है कि 2005 से लेकर अबतक इंसेफलाइटिस के कारण 2749 बच्चों की मौत हुई है और एक बार भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मुजफ्फरपुर नहीं गए हैं। जाहिर तौर पर बच्चों की मौत सुशासन पर बट्टा लगाती है।
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