कभी-कभी सर्वेक्षण करने वाली एजेंसी का अपना भी राजनीतिक रुझान होता है।
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पंद्रह-सोलह साल पूर्व चुनाव के दिनों में हम विधायक का रिपोर्ट कार्ड दिखाने वाले थे। इसके लिए एक एजेंसी को अनुबंधित किया गया। उसकी प्रश्नावली में कुछ ऐसे सवाल थे जिनके उत्तर मैदान में जाने पर ही मिल सकते थे।
मगर एजेंसी के कार्यकर्ताओं ने नागपुर के किसी स्थान पर बैठकर सारे प्रपत्र भर दिए। उदाहरण के तौर पर एक सवाल था कि विधायक से कितने प्रतिशत लोग परिचित हैं या उसका नाम जानते हैं। प्रपत्र में भर दिया गया कि 95 फ़ीसदी लोगों ने विधायक का नाम ही नहीं सुना। जब यह जानकारी प्रसारित हुई तो हम लोगों को ताज्जुब हुआ क्योंकि वह एक बेहद लोकप्रिय विधायक के बारे में था। जब संबंधित मतदाताओं से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उनके पास कोई आया ही नहीं। उसके बाद चैनल को लाखों रुपये का भुगतान रोकना पड़ा।
कभी-कभी सर्वेक्षण करने वाली एजेंसी का अपना भी राजनीतिक रुझान होता है। मतदाता कुछ भी कहें ,वह निष्कर्ष वही निकालती है ,जो वह चाहती है। मेरे एक छात्र ने बारह साल पहले एक एजेंसी इसीलिए छोड़ दी थी कि वह जिस इलाक़े से मेहनत करके अपनी रिपोर्ट लाया था, वह बदल दी गई। उसे बड़ा दुःख हुआ और उसने अपना इस्तीफ़ा प्रस्तुत कर दिया। इन दिनों हम देखते हैं कि एजेंसी के अलावा मीडिया घरानों का भी अपना रुझान होता है। ख़ासतौर पर मौजूदा दौर तो अत्यंत संवेदनशील है।
पत्रकार राजनीतिक खेमों में बंटे नज़र आने लगे हैं। ऐसे में सर्वे करने वाली एजेंसियों को उसका ध्यान रखना पड़ता है। अगर उसने अपनी रिपोर्ट में हक़ीक़त बयान कर दी,जो मीडिया समूह के रुझान के ख़िलाफ़ है तो उसका भुगतान लटक सकता है।
आज के आर्थिक दबाव में कोई एजेंसी यह एफोर्ड नहीं कर सकती। इस क्रम में राज नेताओं के अपने हित भी होते हैं।वे चुनाव जीतने के लिए सारे हथकंडे अपनाते हैं। यह छिपा नहीं है कि विधानसभा चुनाव में नेता जीतने के लिए दस से बीस करोड़ रूपए ख़र्च करता है।
इस बजट में वह आकलन एजेंसियों या उनके कार्यकर्ताओं को लुभाने का प्रयास करता है।वह जानता है कि भारतीय मतदाता इन सर्वेक्षणों पर भरोसा करता है। वोटर सोचता है कि जब उसका उम्मीदवार जीत ही नहीं रहा या उसके दल की सरकार नहीं बन रही तो वोट क्यों बर्बाद किया जाए। इस तरह ये चुनाव पूर्व आकलन परिणामों की दिशा भी मोड़ने का काम कर जाते हैं।
लोकतंत्र के नज़रिए से इस तरह के पूर्वानुमानों का निर्दोष और निष्पक्ष होना बहुत आवश्यक है। ओपिनियन पोल और एग्जिट पोल के बीच बड़ा फ़ासला है। ऐसे में अगर मीडिया इस फासले का दुरुपयोग करता है तो वह किसी भी सूरत में मंज़ूर नहीं किया जाना चाहिए।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।