लोकसभा के 2024 में होने जा रहे चुनाव से पहले 2023 फरबरी में त्रिपुरा, मेघालय और नागालैंड विधानसभा चुनाव होने हैं।
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कांग्रेस को शर्मनाक हार और शानदार जीत दोनों मिलीं
गुजरात विधानसभा के 2017 में हुए चुनाव में कांग्रेस अपने नेताओं के बड़बोलेपन के कारण सत्ता के करीब आते-आते दूर छिटक गई थी। लेकिन इस बार की मोदी लहर ने उसे मान्यता प्राप्त विपक्षी दल कहलाने लायक भी नहीं छोड़ा। इतनी शर्मनाक हार के बावजूद कांग्रेस को हिमाचल प्रदेश के चुनाव नतीजों ने नई ऊर्जा और नई उम्मीद परोस कर दे दी। अब उसके पाले में तीन की जगह चार राज्य आ गए। वह तमिलनाडु, बिहार और झारखंड की सत्ता में भी मित्र दलों के साथ पार्टनर है।
फिर भी नरेन्द्र मोदी के करिश्माई नेतृत्व वाली महाबली पार्टी भाजपा से उसका एक राज्य छीनना कोई आसान काम नहीं था। इससे पहले उत्तराखण्ड में कांग्रेस सत्ता छीनने का विफल प्रयास कर चुकी थी। जब ’’आप’’ जैसा नया नवेला क्षेत्रीय दल कांग्रेस को हराकर उसकी जगह लेना चाहता हो और निराशा के घटाटोप में डूबते जहाज की तरह पंछी उसे छोड़ रहे हों, ऐसे मौके पर भाजपा जैसी पार्टी को एक राज्य में हराना कांग्रेस के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है।
अब कांग्रेस को आगे बचे गढ़ बचाने की चुनौती
राहुल गांधी तो 2024 के लिए मैदान तैयार कर ही रहे हैं, लेकिन उससे पहले कांग्रेस के सामने 2023 में अपने राज्यों का कुनबा बढ़ाने से पहले राजस्थान और छत्तीसगढ़ के गढ़ों को बचाने की चुनौती है। राजस्थान में गहलोत और पायलट के बीच का शीत युद्ध किसी से छिपा नहीं रह गया है। कांग्रेस की कर्नाटक और मध्य प्रदेश में भी संभावनाएं हैं। कर्नाटक में 2018 में कांग्रेस जनता दल सेकुलर के साथ सरकार बना चुकी थी, लेकिन अगले ही साल भाजपा के येदुरप्पा के हाथों उसका गठबंधन सत्ता गंवा बैठा। इसी प्रकार मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया की बगावत के कारण मध्य प्रदेश में भी जीती हुई बाजी हाथ से निकल गई थी।
हिमाचल में जीरो पर आउट आप राष्ट्रीय दल बनी
इन चुनावों में हिमाचल में खाता भी न खोल सकने और गुजरात में केवल 5 सीटों पर संतोष करने वाली आम आदमी पार्टी सबसे अधिक गदगद नजर आ रही है। वह इन दोनों राज्यों में भाजपा से सत्ता छीनने के लिए मैदान में उतरी थी और इस उद्धेश्य के लिए पूरे संसाधनों को झोंकने के साथ ही उसने पूरे चुनावी हथकण्डे अपना लिए थे। वह मुफ्त की रेवड़ियां बांटने में तो भाजपा से आगे निकल ही गई थी लेकिन वह भाजपा से हिन्दुत्व का एजेंडा छीनने का प्रयास भी कर रही थी।
बिल्किस बानो के साथ हुए अत्याचार का जिक्र करने से भी परहेज करना इसका उदाहरण है। उसके प्रचार का एक नरेटिव यह भी था कि ‘‘अब कांग्रेस कहीं नहीं है अपने वोट खराब न करो।’’ पार्टी को दो राज्यों में चुनावी हार के बावजूद सबसे बड़ी खुशी दिल्ली नगर निगम चुनाव में मिल गई। भले ही वह गुजरात-हिमाचल में भाजपा को सत्ता से बेदखल न कर सकी, मगर दिल्ली नगर निगम में तो उसने भाजपा को बाहर का रास्ता तो दिखा ही दिया। उससे भी बड़ी खुशी आम आदमी पार्टी को राष्ट्रीय दल का दर्जा प्राप्त होने की है।
अब तक 16 राज्यों में खाता नहीं खोल पाई आप
यह पार्टी 10 वर्षों के अपने जीवनकाल में अब तक 18 राज्यों में 21 चुनाव लड़ चुकी थी। इनमें से 15 चुनावों में वह जीरो पर आउट हो गई थी। अब खाली हाथ वाला सोलहवां राज्य हिमाचल बन गया है। लेकिन इस बार उसका खाता गुजरात में खुल ही गया। इस प्रकार वह दिल्ली, पंजाब, गोवा के बाद गुजरात में अस्तित्व में होने के कारण राष्ट्रीय दल बनने की हकदार बन गई। लेकिन उसका पहला लक्ष्य भाजपा न होकर कांग्रेस मुक्त भारत का है ताकि वह कांग्रेस की जगह ले सके और यह लक्ष्य फिलहाल संभव नजर नहीं आता। अलबत्ता विपक्षी एकता में सबसे बड़ा बाधक अवश्य बन सकता है।
सन् 2023 में होने हैं 9 राज्यों में चुनाव
लोकसभा के 2024 में होने जा रहे चुनाव से पहले 2023 फरवरी में त्रिपुरा, मेघालय और नागालैंड विधानसभा चुनाव होने हैं। उसके बाद मई में कर्नाटक के चुनाव, नवंबर में छत्तीसगढ़, मिजोरम और मध्य प्रदेश के चुनाव और दिसंबर में राजस्थान और तेलंगाना विधानसभा के चुनाव होने हैं। इनमें से नवंबर और दिसंबर में होने वाले चुनावों का असर 2024 के लोकसभा चुनाव पर पड़ सकता है।
इसलिए आने वाला साल भी चुनावी गहमागहमी वाला होने वाला है। इन चुनावों में केजरीवाल की पार्टी जरूर किस्मत आजमाएगी और उसे खाता खोलने का मौका मिले या न मिले मगर कांग्रेस को पलीता लगाने का मौका अवश्य मिल जाएगा। इन चुनावों में कांग्रेस अपने नए गढ़ बचाने के साथ ही कर्नाटक और मध्य प्रदेश के जैसे लुटे हुए गढ़ पुनः जीतने का प्रयास करेंगी।
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