El Niño And It's Impact On Monsoon
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ठिठके मानसून के पश्चिम में फिर एक सप्ताह बाद ही सक्रिय होने का अनुमान है। जून का तीसरा सप्ताह भी औसत से कम बारिश के बीच ही बीतने जा रहा है। ऐसे में बारिश कम होती है तो इसका सीधा असर खेती पर पड़ना तय है। खेती प्रभावित होगी तो महंगाई बढ़ेगी। बारिश कम होने पर किसानों की खेती लागत बढ़ जाएगी। मौसम विभाग के इस सीजन में देश में औसत से कम बारिश के पूर्वानुमान के आधार पर रिजर्व बैंक ने महंगाई में एक-डेढ़ फीसदी तक की वृद्धि का अंदेशा जता दिया है, जो चिंताजनक है।
पश्चिम एशिया संघर्ष के चलते महंगाई पहले से आम लोगों की कमरतोड़ चुकी है। अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर तेजी से बढ़ रहे देश के कदम पर यह मानसूनी ब्रेक मुश्किलें पैदा कर सकता है। देश में खेती-सिंचाई वर्षा पर आधारित है। मौसमी बारिश के अलावा सिंचाई के दूसरे साधन के लिए बिजली-डीजल (ऊर्जा-ईंधन) पर निर्भरता है। गांवों में पर्याप्त बिजली आपूर्ति नहीं हो पा रही है। देश में अभी बिजली की मांग सर्वाधिक 265 गीगावाट है।
आने वाले एक-दो महीने में मांग और बढ़ेगी। पश्चिम एशिया संकट की वजह से कच्चे तेल में पहले से आग लगी हुई है। सरकार ने डीजल पर विंडफॉल टैक्स बढ़ाकर एहतियाती कदम उठाया है। उर्वरक की 583 लाख मीट्रिक टन के मुकाबले पहले से 195 लाख टन की उपलब्धता का दावा किया जा रहा है लेकिन संकट न हो, इसलिए सरकार की ओर से एहतियाती तौर पर नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (एनएफएल) से निविदा प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इन एहतियाती उपायों के बीच चिंता की बात यह है कि यदि बारिश कम हुई तो भूजल स्तर और नीचे गिरेगा।
जलाशय लबालब नहीं हो पाएंगे, तो हालात फिर और चुनौती वाले साबित होंगे। यदि मौसम विभाग की मानें तो अल नीनो आने वाली तिमाही (जुलाई-अगस्त-सितंबर) में कुछ और असर डाल सकता है। हिंद-प्रशांत महासागर के तापमान में और उबाल आ सकता है। दो फीसदी तक तापमान बढ़ने से अल नीनो की स्थिति बनती है। जलवायु परिवर्तन का आलम यह है कि मैदान में अभी पारा काफी चढ़ चुका है। नमी न होने से खेती का संकट बना रहेगा। गर्मी भी अपने पुराने रिकॉर्ड तोड़ रही है। मौसम के गिरगिट की तरह रंग बदलने का आलम यह है कि कभी नौतपा में झूमकर बदरा बरस जाते हैं तो कभी पहाड़ों पर बिन मौसम बर्फबारी हो जाती है।
कहीं सूखा पड़ जाता है तो कहीं बाढ़ आ जाती है। अल नीनो भी अपना प्रभाव छोड़ रहा है। अभी महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, तेलंगाना, तमिलनाडु, कर्नाटक, मध्य प्रदेश आदि राज्य भींगने को तरस रहे हैं। महाराष्ट्र और गुजरात की मुख्य फसल दलहन, कपास, गन्ना, मूंगफली, तंबाकू आदि को लेकर चिंता बढ़ गई है, तो दूसरी तरफ बड़े इलाके में धान जैसी मुख्य फसल के लिए सिंचाई का संकट पैदा हो सकता है। प्राकृतिक संकट के हालात में बरखा रानी से जम के बरसने की उम्मीद की जा सकती है लेकिन इस चुनौती से निपटने के लिए सरकारों को समय रहते ठोस कदम उठाने होंगे ताकि आर्थिक मोर्चे पर संकट के बादल छंट जाएं।
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