फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अल नीनो और मानसून की बेरुखी: कहीं सूखे की चपेट में ना आ जाए देश? क्या पड़ेगी अब मौसम की मार

सार

अल नीनो के प्रभाव से इस बार मानसून की रफ्तार कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है। इससे कृषि, खाद्यान्न उत्पादन और अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ गई है। 
विज्ञापन
El Niño And It's Impact On Monsoon - फोटो : AI Generated
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

अल नीनो के साये में मानसून कमजोर पड़ गया है। समय से केरल पहुंचकर यह पिछले एक सप्ताह से तेलंगाना-महाराष्ट्र में ठिठक गया है। इससे देश में खाद्यान्न उत्पादन से लेकर अर्थव्यवस्था और महंगाई के मोर्चे पर चिंता बढ़ गई है। इस बार मानसून की गति शुरुआती दौर में ही ऐसी थम गई कि 15 जून तक देश के 703 जिलों में से महज 103 जिलों में ही सामान्य बारिश हो पाई है। अभी जून के आखिर तक मानसून के पटरी पर लौटने के आसार कम ही हैं।

विज्ञापन


दूसरी तरफ, अल नीनो के जुलाई से सितंबर तिमाही में और मजबूत होने का खतरा है, जिससे वर्षा प्रभावित होगी। कहीं सूखे जैसे हालात होंगे तो कहीं बाढ़ सी नौबत। बारिश की कमी से उत्पन्न स्थिति से निपटने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के सामने समय रहते कदम उठाने की चुनौती है। कम बारिश से खाद्यान्न पैदावार संकट पैदा होगा। इसका चौतरफा असर पड़ेगा।

महंगाई का ग्राफ ऊपर की ओर जाएगा। करोड़ों देशवासियों के लिए मुफ्त अनाज की योजना को बिना बाधा जारी रखने की चुनौती होगी। ईंधन संकट की इस मुश्किल घड़ी में सरकार ने पहले ही उज्ज्वला गैस का कोटा घटा दिया है। ऐसे में सरकार की गरीबों के लिए जनकल्याणकारी योजनाओं को जारी रखने की बड़ी चुनौती होगी। बारिश की मौजूदा स्थिति से देश के तीन सौ से अधिक जिले चुनौतीपूर्ण हैं जबकि 16 राज्यों के 197 जिलों पर पूरी तरह से संकट के बादल छा गए हैं।
विज्ञापन


हालांकि, अभी मानसून शुरुआती दौर में है लेकिन खरीफ फसल की बुवाई का सीजन चालू है। कृषि प्रधान देश में 60 फीसदी सिंचाई वर्षा पर आधारित है। ऐसे में देश भर में औसत 28-30 फीसदी कम बारिश होना चिंताजनक है। मौसम विभाग को भी लगता है कि इस साल बारिश में 40 फीसदी तक की कमी आ सकती है। इस बार अभी अकेले महाराष्ट्र में ही 74 फीसदी कम बारिश हुई है। उसके बाद गुजरात है। किसानों से अधिक पानी वाली फसल से परहेज करने की अपील की जा रही है।

केंद्र ने अल नीनो के संकट को देखते हुए एहतियातन राज्यों के साथ मिलकर निगरानी समितियां बनाने का फैसला किया है। निगरानी समितियां महज निगरानी भर न रह जाएं बल्कि प्राकृतिक मार झेल रहे हिस्से के लिए ठोस कदम शुरू से ही उठाए तो इस संकट से उबरा जा सकता है। यह केंद्र व राज्य सरकारों, कृषि और वित्त मंत्रालय की सामूहिक जिम्मेदारी होगी। केंद्र और राज्य आपस में कंधे से कंधा मिलाकर इस चुनौती से उबर सकते हैं।

दरअसल, पश्चिम एशिया संघर्ष से उपजे हालात से देश अभी उबर नहीं पाया है और मानसून की कमजोरी ने खेतीबाड़ी को लेकर एक नई चिंता पैदा कर दी है। वैसे, अल नीनो और मानसून की बेरुखी का यह कोई पहला मौका नहीं है। अल नीनो का सबसे बुरा प्रभाव 1876 में पड़ा था। राहत की बात यह है कि 150 साल के भीतर ऐसी विकट स्थिति दोबारा नहीं आई। हालांकि, 1950 के बाद 16 बार अल नीनो का असर दिखा, जब बारिश औसत से कम (कभी-कभी 50 फीसदी तक कम) हुई लेकिन हर अल नीनो का प्रभाव एक जैसा नहीं रहा।

अल नीनो के प्रभाव की तीव्रता इंडियन ओशन डायपोल व प्रशांत महासागर में तापमान के उतार-चढ़ाव पर निर्भर रहा। 2002-03, 2015-16 की तरह इस बार फिर मौसम विभाग ने अल नीनो के चलते औसत से कम बारिश का अंदेशा जताया है। हालांकि, अल नीनो अभी पूरी तरह से मजबूत नहीं हुआ है लेकिन मानसून जरूर कमजोर पड़ गया है। 15 जून तक 53 मिमी बारिश की जगह महज 19 मिमी बारिश ही हो पाई।

विज्ञापन

El Niño And It's Impact On Monsoon - फोटो : Freepik
ठिठके मानसून के पश्चिम में फिर एक सप्ताह बाद ही सक्रिय होने का अनुमान है। जून का तीसरा सप्ताह भी औसत से कम बारिश के बीच ही बीतने जा रहा है। ऐसे में बारिश कम होती है तो इसका सीधा असर खेती पर पड़ना तय है। खेती प्रभावित होगी तो महंगाई बढ़ेगी। बारिश कम होने पर किसानों की खेती लागत बढ़ जाएगी। मौसम विभाग के इस सीजन में देश में औसत से कम बारिश के पूर्वानुमान के आधार पर रिजर्व बैंक ने महंगाई में एक-डेढ़ फीसदी तक की वृद्धि का अंदेशा जता दिया है, जो चिंताजनक है।

पश्चिम एशिया संघर्ष के चलते महंगाई पहले से आम लोगों की कमरतोड़ चुकी है। अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर तेजी से बढ़ रहे देश के कदम पर यह मानसूनी ब्रेक मुश्किलें पैदा कर सकता है। देश में खेती-सिंचाई वर्षा पर आधारित है। मौसमी बारिश के अलावा सिंचाई के दूसरे साधन के लिए बिजली-डीजल (ऊर्जा-ईंधन) पर निर्भरता है। गांवों में पर्याप्त बिजली आपूर्ति नहीं हो पा रही है। देश में अभी बिजली की मांग सर्वाधिक 265 गीगावाट है।

आने वाले एक-दो महीने में मांग और बढ़ेगी। पश्चिम एशिया संकट की वजह से कच्चे तेल में पहले से आग लगी हुई है। सरकार ने डीजल पर विंडफॉल टैक्स बढ़ाकर एहतियाती कदम उठाया है। उर्वरक की 583 लाख मीट्रिक टन के मुकाबले पहले से 195 लाख टन की उपलब्धता का दावा किया जा रहा है लेकिन संकट न हो, इसलिए सरकार की ओर से एहतियाती तौर पर नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (एनएफएल) से निविदा प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इन एहतियाती उपायों के बीच चिंता की बात यह है कि यदि बारिश कम हुई तो भूजल स्तर और नीचे गिरेगा।

जलाशय लबालब नहीं हो पाएंगे, तो हालात फिर और चुनौती वाले साबित होंगे। यदि मौसम विभाग की मानें तो अल नीनो आने वाली तिमाही (जुलाई-अगस्त-सितंबर) में कुछ और असर डाल सकता है। हिंद-प्रशांत महासागर के तापमान में और उबाल आ सकता है। दो फीसदी तक तापमान बढ़ने से अल नीनो की स्थिति बनती है। जलवायु परिवर्तन का आलम यह है कि मैदान में अभी पारा काफी चढ़ चुका है। नमी न होने से खेती का संकट बना रहेगा। गर्मी भी अपने पुराने रिकॉर्ड तोड़ रही है। मौसम के गिरगिट की तरह रंग बदलने का आलम यह है कि कभी नौतपा में झूमकर बदरा बरस जाते हैं तो कभी पहाड़ों पर बिन मौसम बर्फबारी हो जाती है।

कहीं सूखा पड़ जाता है तो कहीं बाढ़ आ जाती है। अल नीनो भी अपना प्रभाव छोड़ रहा है। अभी महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, तेलंगाना, तमिलनाडु, कर्नाटक, मध्य प्रदेश आदि राज्य भींगने को तरस रहे हैं। महाराष्ट्र और गुजरात की मुख्य फसल दलहन, कपास, गन्ना, मूंगफली, तंबाकू आदि को लेकर चिंता बढ़ गई है, तो दूसरी तरफ बड़े इलाके में धान जैसी मुख्य फसल के लिए सिंचाई का संकट पैदा हो सकता है। प्राकृतिक संकट के हालात में बरखा रानी से जम के बरसने की उम्मीद की जा सकती है लेकिन इस चुनौती से निपटने के लिए सरकारों को समय रहते ठोस कदम उठाने होंगे ताकि आर्थिक मोर्चे पर संकट के बादल छंट जाएं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें