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पश्चिम बंगाल डायरी: दुर्गा पूजा के बीच रचता-बसता सियासी और आर्थिक संसार

सार

पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा अब सिर्फ धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सियासत और अर्थव्यवस्था का भी बड़ा मंच है। जहां राजनीतिक दल चुनावी लाभ के लिए करोड़ों का अनुदान देते हैं, वहीं यह त्योहार राज्य की अर्थव्यवस्था में हजारों करोड़ का योगदान भी करता है।
 
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दुर्गा पूजा - फोटो : प्रभाकर मणि तिवारी
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विस्तार
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Politics of Durga Puja in West Bengal: पश्चिम बंगाल का सबसे बड़ा त्योहार दुर्गा पूजा महज एक धार्मिक उत्सव ही नहीं है। यह सामाजिक सद्भाव और जनसंपर्क बढ़ाने का बेहतरीन मौका भी है। ऐसे में स्वाभाविक है तमाम राजनीतिक दल इसे अपने हित में भुनाने से पीछे नहीं रहते। खासकर चुनाव से पहले वाली पूजा पर तो सियासत का रंग कुछ ज्यादा ही गहरा हो जाता है।

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इस सप्ताह शुरू होने वाली पूजा पर अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव का छाप साफ नजर आने लगी है। इसकी थीम और सरकारी अनुदान पर बहस लगातार तेज हो रही है।

पहले यह त्योहार ष्ष्ठी से नवमी यानी चार दिनों का ही होता था। लेकिन समय के साथ ही यह बढ़ कर दस दिवसीय उत्सव में बदल गया है। पश्चिम बंगाल में इस साल 45 हजार से ज्यादा पंडाल बनाए जा रहे हैं। इनमें से करीब साढ़े चार हजार अकेले राजधानी कोलकाता और उसके आस-पास हैं। कोलकाता में करीब सौ ऐसे पंडाल हैं जिनका बजट 80 से 90 लाख के बीच है। इसके अलावा करीब एक दर्जन पंडालों का बजट तीन से पांच करोड़ के बीच रहता है।

हाल के वर्षों में बंगाल में थीम आधारित पूजा के आयोजन का चलन तेजी से बढ़ा है। इसके तहत पूरे साल के दौरान देश-दुनिया में घटी घटनाओं को सजावट और बिजली की रोशनी के जरिए साकार किया जाता रहा है। इस साल भी अपवाद नहीं है। लेकिन इस साल की थीम पर चुनाव की छाप साफ नजर आ रही है।

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दुर्गा पूजा - फोटो : प्रभाकर मणि तिवारी
मुख्यमंत्री ममती बनर्जी ने बीते कुछ महीनों से खासकर भाजपा शासित राज्यों में बंगाल के प्रवासी मजदूरों के उत्पीड़न का मुद्दा बड़े पैमाने पर उठाया है। पार्टी ने इसके खिलाफ आंदोलन भी शुरू किया है। इस मुद्दे की अहमियत को भांपते हुए कोलकाता के करीब आधा दर्जन पूजा पंडालों ने इस साल प्रवासी मजदूरों को ही अपनी मुख्य थीम बनाया है। यहां इस बात का जिक्र प्रासंगिक है कि कोलकाता समेत राज्य की तमाम प्रमुख पूजा आयोजन समितियों ंकी बागडोर तृणमूल कांग्रेस के मंत्रियों और शीर्ष नेताओं के हाथों में ही है।

इसके साथ ही मुख्यमंत्री हर साल चालीस हजार से ज्यादा छोटी-बड़ी आयोजन समितियों को सरकार की ओर से अनुदान देती रही हैं। यह सिलसिला वर्ष 2018 से शुरू हुआ था। ध्यान रहे कि उसके अगले साल यानी 2019 में लोकसभा चुनाव होने थे। उस साल सरकार ने पूजा समितियों को 10-10 हजार का अनुदान दिया था जो इस साल बढ़ कर 1।10 लाख तक पहुंच गया है। इससे सरकारी खजाने पर करीब पांच सौ करोड़ का बोझ पड़ेगा।

भाजपा ने इसे चुनावी स्टंट करार दिया है।लेकिन तृणमूल कांग्रेस की दलील है कि यह रकम राज्य के इस सबसे बड़े त्योहार के आयोजन में सहूलियत के लिए बिना किसी भेदभाव के तमाम पंजीकृत समितियों को दी जाती है।

ममता बनर्जी की दलील है कि सरकारी अनुदान दुर्गा पूजा के लिए नहीं दी जाती। इसका मकसद कलाकार से कारीगर औऱ मजदूर तक सबकी आर्थिक स्थिति को मजबूत करना है।

इस अनुदान के खिलाफ बीते महीने कलकत्ता हाईकोर्ट में दो जनहित याचिकाएं भी दायर की गई थी। उन पर सुनवाई के बाद अदालत ने इस पर रोक तो नहीं लगाई। लेकिन कहा कि बीते साल के अनुदान का हिसाब नहीं देने वाली समितियों को इस साल अनुदान नहीं दिया जा सकता।

इस त्योहार के साथ धार्मिक, सामाजिक और सियासी पहलू के साथ ही आर्थिक पहलू भी जुड़ा है। कोरोना के कारण दो साल की मंदी के बाद अब राज्य में साल दर साल इस उत्सव का टर्नओवर तेजी से बढ़ रहा है। वर्ष 2013 में यह आंकड़ा करीब 25 हजार करोड़ था। राज्य के पर्यटन मंत्रालय के निर्देश पर वर्ष 2019 में ब्रिटिश काउंसिल की ओर से किए गए शोध की रिपोर्ट में इस टर्नओवर को करीब 33  हजार करोड़ बताते हुए कहा गया था कि यह हर साल तेजी से बढ़ रहा है। रिपोर्ट में कहा गया था कि राज्य की जीडीपी में इस उत्सव का हिस्सा करीब 2।58  प्रतिशत  है। मोटे अनुमान के मुताबिक, बीते साल यह टर्नओवर 80 हजार करोड़ तक पहुंच गया। इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स का अनुमान है कि  वर्ष 2030 तक दुर्गा पूजा का टर्नओवर एक लाख करोड़ रुपए तक पहुंच जाएगा।

लेकिन आखिर राज्य में होने वाली दुर्गा पूजा का बजट लगातार क्यों बढ़ रहा है? इस सवाल पर आयोजन समितियों के साझा मंच फोरम फार दुर्गोत्सव का कहना है कि खासकर कोविड के बाद आयोजन के लिए जरूरी चीजों का खर्च बढ़ा है। इसलिए आयोजन का बजट भी करीब 50  प्रतिशत तक बढ़ गया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि दुर्गा पूजा समितियों को अनुदान का विरोध करना भाजपा के लिए मुश्किल है। वह हर बार हिंदुत्व के मुद्दे पर ही चुनाव मैदान में उतरती रही है। इसलिए वह सीधे इसका विरोध नहीं कर पा रही है।

भाजपा इसका विरोध भले नहीं कर रही हो लेकिन वह भी शायद इसकी अहमियत समझ गई है। इसलिए बांग्ला राष्ट्रवाद के दबाव और खुद को बंगाल की अस्मिता से जोड़ने की कवायद के तहत ही अगले साल होने वाले चुनावों को ध्यान में रखते हुए पार्टी दो साल बाद फिर कोलकाता के साल्टलेक इलाके में ईज्ञस्टर्न जोनल कल्चरल सेंटर में इस साल दुर्गा पूजा आयोजित कर रही है।

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में भारी कामयाबी के बाद पार्टी ने तब मुकुल राय के नेतृत्व में यहां पहली बार पूजा का आयोजन किया था। लेकिन 2021 के विधानसभा चुनाव में लगे सदमे के बाद उसने उस साल और 2022 में तो किसी तरह पूजा आयोजित की थी। लेकिन 2023 और 2024  में इसका आयोजन नहीं किया गया था। अब इस साल वह बड़े पैमाने पर पूजा का आयोजन कर रही है।

दूसरी ओर, चुनाव से पहले इस आखिरी पूजा को अपने पक्ष में भुनाने के लिए ममता बनर्जी ने भी बड़े पैमाने पर पूजा पंडालों का उद्घाटन करने की तैयारी कर ली है। वह हर साल सौ से ज्यादा पूजा पंडालों का उद्घाटन करती रही है।

पूजा से ठीक पहले इस महीने की शुरुआत से ही बाजारों में खरीद-फरोख्त भी तेजी से बढ़ी है। धर्मतल्ला इलाके के दुकानदारों का कहना है कि अगस्त तक कारोबार मंदा था। लेकिन सितंबर की शुरुआत से ही बाजारों में भीड़ उमड़ पड़ी है। पूजा से महीने भर पहले राज्य में तमाम प्रमुख बाजार और दुकानें सप्ताह के सातों दिन खुली रहती हैं।

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इस बार पूजा पर सियासत की रंग बेहद चटख होगा। सत्ता के दोनों प्रमुख दावेदारों ने इस मौके को अपने पक्ष में भुनाने की कवायद तेज कर दी है।

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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