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E-Cigarettes: ई-सिगरेट का धुआं भी कम खतरनाक नहीं, ये कैंसरकारक

Mon, 13 Apr 2026 07:54 AM IST
Nitin Gautam बर्नार्ड स्टीवर्ट, अमर उजाला

सार

वेपिंग करने वाले जो धुआं अंदर लेते हैं, उसमें कई प्रकार के रसायन होते हैं। यह धुआं ‘कैंसर पैदा करने वाले गुणों’ को दर्शाता है।
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ई-सिगरेट - फोटो : फ्रीपिक
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विस्तार
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इस बात के प्रमाण 1880 के दशक की शुरुआत में ही मिल गए थे कि धूम्रपान फेफड़ों को नुकसान पहुंचाता है। लेकिन यह साबित करने में कि धूम्रपान फेफड़ों के कैंसर का कारण बनता है, लगभग 100 साल लग गए। तो फिर इलेक्ट्रॉनिक या ई-सिगरेट के बारे में क्या कहा जाए? जो लोग ई-सिगरेट पीते (वेपिंग) हैं, वे गैर-धूम्रपान करने वालों की तुलना में धूम्रपान शुरू करने की अधिक संभावना रखते हैं। लेकिन अभी तक साक्ष्यों से यह स्पष्ट नहीं है कि ई-सिगरेट कैंसर का कारण बनते हैं।
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हालांकि, हमने 2017 से 2025 के मध्य प्रकाशित सभी सहकर्मी-समीक्षित शोधों की पहचान की, जिनमें वेपिंग के स्वास्थ्य पर प्रभावों का अध्ययन किया गया था, जो संभावित रूप से कैंसर के कारणों की ओर संकेत करते हैं। वेपिंग करने वाले जो धुआं अंदर लेते हैं, उसमें कई प्रकार के रसायन होते हैं, जिनमें निकोटीन और उसके उप-उत्पाद, तथा धातुओं के वाष्पित कण शामिल होते हैं। यह धुआं लगभग उन सभी ‘कैंसर पैदा करने वाले गुणों’ को दर्शाता है, जिन्हें विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पहचाना है। रक्त और मूत्र के परीक्षणों से यह पुष्टि हुई कि वेपिंग करने वालों के शरीर में ई-सिगरेट से जुड़े रसायन अवशोषित हो रहे हैं, जो कैंसर से संबंधित माने जाते हैं।

हमने पाया कि वेपिंग करने वालों के मुंह और फेफड़ों के डीएनए में परिवर्तन हो रहे हैं, जो कैंसरकारी तत्वों के संपर्क का एक और प्रमाण है। इसके अलावा, वेपिंग करने वालों के फेफड़ों और मुंह के ऊतकों में कैंसर से जुड़े बायोमार्कर में भी बदलाव पाए गए। ये बायोमार्कर ऐसे परिवर्तन होते हैं, जो ट्यूमर बनने से पहले कोशिकाओं या अणुओं में दिखाई देते हैं।
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उपलब्ध साक्ष्य दर्शाते हैं कि निकोटीन आधारित वेपिंग से मुंह और फेफड़ों के कैंसर होने की आशंका है। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि इससे कितने मामलों में कैंसर होगा। शोधकर्ताओं का कहना है कि अब यह मानना उचित नहीं है कि वेपिंग का कैंसर जोखिम धूम्रपान से कम है। हमारा अध्ययन वेपिंग को कैंसर के कारण के रूप में देखता है।

फिर भी, अभी हमारे पास इसका प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है कि वेपिंग करने वाले लोगों में अपेक्षा से अधिक कैंसर के मामले सामने आ रहे हैं। जैसे धूम्रपान और कैंसर के बीच संबंध स्थापित करने में 100 साल लगे, वेपिंग के मामले में भी दशकों लग सकते हैं। इसके लिए ऐसे लोगों का अध्ययन करना होगा, जो केवल वेपिंग करते हैं। इसलिए सावधानीपूर्वक नियोजित शोधों की आवश्यकता है, ताकि हम कैंसर का समय रहते पता लगा सकें। यदि ऐसे शोधों को अभी से वित्तपोषित करना शुरू किया जाए, तो इससे कई लोगों की जान बचाई जा सकती है। - द कन्वर्सेशन से
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