14वीं शताब्दी में भारत आए प्रसिद्ध मोरक्को यात्री इब्नबतूता ने ‘किशरी’ नाम के एक व्यंजन का जिक्र अपने यात्रा वृत्तांत रिहला में किया। दरअसल, यह व्यंजन खिचड़ी थी, जो भारतीय उपमहाद्वीप में पुरातन काल से ही खाई जाती रही है। इब्नबतूता के अलावा कई अन्य विदेशी यात्रियों जैसे रूसी यात्री अफनासी निकितन व फ्रांसीसी जीन बैप्टिस्ट ने भी दाल और चावल मिश्रित इस व्यंजन का जिक्र किया है। भले ही उन्होंने अलग-अलग तरीकों से लिखा हो, पर मान्यता है कि सभी ने खिचड़ी के बारे में ही लिखा है।
आइने अकबरी में अबुल फजल ने खिचड़ी की रेसिपी लिखी, जबकि बीरबल की खिचड़ी की कहावत तो पूरे देश में मशहूर है। आयुर्वेद में खिचड़ी को त्रिदोष, यानी वात, पित्त और कफ में संतुलन बनाने वाला व्यंजन माना गया है।
खिचड़ी का ब्रज नगरी में अलग ही रूप है। खिचड़ी का अभिप्राय है दो अनाजों का मिश्रण, पर ब्रज में इसकी परिभाषा अलग है। ब्रज से लगने वाले मांट क्षेत्र के बेलवन मेले में लाखों लोग मान्यताओं, परंपराओं व मनाैतियों के साथ खिचड़ी का भोग लगाते हैं। वृंदावन के राधाबल्लभ मंदिर में पौष शुक्ल दौज से माघ शुक्ल प्रतिपदा तक खिचड़ी महोत्सव का कार्यक्रम आयोजित होता है, जिसमें ब्रज संस्कृति की विविधताएं देखने को मिलती हैं। एक पद इसकी महत्ता को दर्शाता है...खिचरी युगल रुचित सो खात। पौष शुक्ला दोज तें, ले मास एक प्रभात। इस महोत्सव में राधाबल्लभ छद्म रूपों में दर्शन देते हैं।
अहम बात यह है कि ब्रज में खिचड़ी केवल खाई ही नहीं जाती है, बल्कि गाई भी जाती है। ब्रज की संस्कृति देवालयी है। इसी में राधाकृष्ण की निकुंज लीलाओं को दर्शाते हुए खिचड़ी पद भी गाए जाते हैं। भोग, राग, शृंगार को ही इस उत्सव का वास्तविक प्रतीक माना गया है। खिचड़ी इन तीनों का ही अद्भुत समन्वय है। हितजीमहाराज कृत श्रीमद् चतुरासी में एवं श्रीराधा सुधा निधि साहित्य में खिचड़ी उत्सव का वर्णन है। 18वीं सदी में ब्रज साहित्यकार चाचा हित वृंदावनदास ने पद लिखा...खिचरी भोर नीकी बनी। ललिता गाइ बजाइ वीना, करत विनती घनी ॥ राखी आनि अंगीठी आगै, अगर धूप ठनी। धरयौ मंगल भोग खिचरी, दही घृत सौं सनी॥
वृंदावन शोध संस्थान के शोध अधिकारी डॉ. राजेश शर्मा कहते हैं कि खिचड़ी में रसमयता का समन्वय ब्रज की विशेषता को बताता है। ब्रजभाषा साहित्य की लिखित परंपरा में मुद्रण तकनीक से पूर्व खिचड़ी उत्सव से जुड़ी पांडुलिपियां इसका प्रमाण हैं। पांडुलिपियां बताती हैं कि भक्तिकाल के दौरान गोस्वामियों ने समाज गायन में खिचड़ी को शामिल किया है। यही कारण है कि गोस्वामी किशोरीलाल, कमलनैन, कुंजलालजी, रूपलाल तथा चाचा वृंदावनदास ने खिचड़ी उत्सव को लेकर बहुविधि पद लिखे हैं, जो आज भी समूचे ब्रज में गाए जाते हैं।