दुष्यंत कुमार की रचनाएं लोगों ने खूब पसंद की।
- फोटो : Twitter
दुष्यंत कुमार के काव्य संग्रह
वैसे दुष्यंत कुमार के अन्य काव्य संग्रह 'सूर्य का स्वागत' 'आवाजों के घेरे' और 'जलते हुए वन का वसन्त' भी प्रकाशित हुए।उन्होंने 'आंगन के वृक्ष' और 'दुहरी जिंदगी' नाम से दो उपन्यास 'और मसीहा मर गया' नाम से नाटक भी लिखा।पर उन्हें लोकप्रियता हासिल हुई "साए में धूप" के गज़ल संग्रह से ही।
गज़ल कहने का जो सलीका और अंदाज होना चाहिए, वह फ़िराक साहब के बाद कुछ हद तक दुष्यंत कुमार में दिखती है। पर जो गहराई और दूर दृष्टि फ़िराक साहब की नज्मों और गज़लों में है, वह कहां किसी और को नसीब हुआ। फिर भी साफ़गोई के साथ अपनी बात कहने में दुष्यंत कुमार का भी कोई जोड़ नहीं था-
पतों से चाहते हो बजे साज की तरह
पेड़ों से पहले उदासी तो लीजिए,
और यह भी कि-
फिरता है - कैसे-कैसे सवालों के साथ वो
उस आदमी की जामातलाशी तो लीजिए।
'साए में धूप' की भूमिका में दुष्यन्त कुमार कहते हैं कि "उर्दू और हिंदी अपने सिंहासन से उतरकर जब आम आदमी के पास आती है, तो उसमें फर्क करना बड़ा मुश्किल होता है। मेरी नियत और कोशिश रही है कि इन दोनों भाषाओं को ज्यादा करीब ला सकूं। इसलिए गज़लें उस भाषा में कही गई हैं, जिसमें मैं बोलता हूं। यह भी कि ग़ज़ल एक पुरानी किंतु सशक्त विधा है। निराला से लेकर नए कवियों और गीतकारों ने भी इस विधा को आजमाया है। इस विधा में उतरते हुए आज भी संकोच है। पर उतना नहीं, जितना होना चाहिए।"
इलाहाबाद में अध्ययन के दौरान दुष्यंत कुमार 'परिमल' और 'नए पते' जैसी साहित्यक संस्थाओं से सक्रिय रूप से जुड़े। इलाहाबाद से कमलेश्वर, मार्कण्डेय और दुष्यंत कुमार कुमार ने संयुक्त रूप से "विहान" नामक पत्रिका भी निकाली। अब उसके कुछ अंक ही प्राप्त हैं। पर उस समय के लगभग सभी प्रमुख लेखकों ने इस पत्रिका में लिखा हैं।
इलाहाबाद की साहित्यिक 'सर्किल' उस वक्त कमलेश्वर, मार्कण्डेय और दुष्यन्त कुमार की तिकड़ी 'त्रिशूल' नाम से खूब चर्चित हुई। कमलेश्वर के बारे में दुष्यन्त कुमार की यह स्वीकारोक्ति काबिलेगौर है कि अगर कमलेश्वर न होता तो, शायद यह सिलसिला यहां तक नहीं आता।
हाथों में अंगारो को लिए सोच रहा था,
कोई मुझे अंगारों की तासीर बताए।
दुःख तकलीफों को शब्दों में उतारना जानते थे दुष्यंत
आम आदमी के दुःख तकलीफों को आम आदमी की भाषा में और वह भी गज़ल जैसी विधा में कहने की वजह से ही दुष्यन्त कुमार के जरिए हिंदी ग़ज़लों की लोकप्रियता की दरअसल शुरुआत हुई। इस लोकप्रियता की असली वजह यह है कि जब भी समाज जीवन में उदासी और हताशा का साया चारों ओर फैला दिखाई देता है, तब दुष्यन्त कुमार जैसे कवि-लेखकों की रचनाएं घने कुहासे को छिन्न-भिन्न कर उम्मीदों की नई किरण बनकर नयी राह दिखाती है।
इस अर्थ में ही मुंशी प्रेमचंद ने साहित्कारों को "समाज के आगे लेकर चलने वाला मशाल बताया है।" अपने अल्पायु में यह काम दुष्यन्त कुमार बखूबी कर गए। जो कवि लेखक अपने समय के सामाजिक-राजनीतिक सवालों से रूबरू होता उसे ही वह मुकाम हासिल होता है, जो दुष्यंत कुमार को है। गूंगे निकल पड़े है जुबां की तलाश में सरकार के खिलाफ ये साजिश तो देखिए।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।