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देव की डायरी: सार्थक चर्चा में रसेदार लोकतंत्र और सूखी सब्जी का राष्ट्रीय प्रश्न

सार

Badayun Dry vs Gravy Vegetable Dispute: बदायूं के वजीरगंज इलाके के ब्यौली गांव ने लोकतंत्र के सामने एक ऐसा राष्ट्रीय प्रश्न रख दिया है, जिस पर अभी तक न तो किसी समिति का गठन हुआ है, न कोई सर्वदलीय बैठक हुई और न ही कोई सार्थक चर्चा। प्रश्न यह है कि यदि पति को सूखी सब्जी चाहिए और पत्नी रसेदार सब्जी बना दे, तो न्यायपालिका, कार्यपालिका और पुलिस प्रशासन की भूमिका क्या होगी? क्या आपको नहीं लगता है कि सार्थक चर्चाओं के इस सुनहरे काल में इस पर एक सार्थक चर्चा हो।
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सार्थक चर्चा व्यंग्य - फोटो : AI
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विस्तार
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Indian Media Sensationalism Satire: यह सार्थक चर्चाओं का दौर है। मेरे एक मित्र हैं। पड़ोस में रहते हैं और वरिष्ठ हैं। रोज किसी न किसी संस्था, मंच या टीवी डिवेट पर सार्थक चर्चा करते नजर आते हैं। कल लकदक कुर्ते में वह एक टीवी कार्यक्रम में यूपीआई पर सार्थक चर्चा के लिए निकल रहे थे। यूपीआई यानी वही चीज, जिससे किसको कितना देना है, किससे कितना लेना है और पैसा भेजने के बाद सामने वाला ‘थैंक्यू’ बोलेगा या सिर्फ अंगूठा दिखाएगा, यह सब तय होता है। लेकिन इन मामूली सवालों को मामूली ढंग से पूछना भी आजकल संभव नहीं है। उन पर चर्चा होती है, फिर सार्थक चर्चा होती है और फिर उस सार्थक चर्चा की सार्थकता पर भी चर्चा हो सकती है। इस तरह की चर्चाओं में वरिष्ठों का बोलवाला है।

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मैं भी उम्र के इस पड़ाव पर हूं कि देखने में वरिष्ठ लगने लगा हूं। मैंने भी ऐसी सार्थक चर्चा में भाग लेने की इच्छा जाहिर की तो लिफ्ट की ओर लपकते हुए बोले, “कुछ ज्वलंत विषय ढूंढो जिस पर चर्चा हो सके। कई बार उन लोगों के पास विषय नहीं होता। जो विषय सुझाते हैं, उसे बुला ही लेते हैं।” कहकर वे लिफ्ट की सुरंग में अंतर्ध्यान हो गए।

मैं तत्काल प्रभाव से सार्थक चर्चा के लिए एक सुयोग्य और ज्वलंत विषय की खोज में लग गया। वैसे ‘सार्थक’ शब्द का अर्थ बड़ा ही लचीला है। चार लोग बैठकर यह तय कर लें कि 'रील पर लाइक करना जरूरी है या सिर्फ देख लेना ही पर्याप्त सामाजिक दायित्व है', तो इस पर भी गंभीर और सार्थक चर्चा हो सकती है। बस बातचीत में एक-दो अंग्रेजी शब्द और तीन बार ‘एक्चुअली’ बोल दिया जाए। कुछ देर छपी हुई खबरों पर इधर-उधर हाथ-पांव मारने के बाद मेरी नजर एक सुयोग्य और ज्वलंत खबर पर गई। कुछ दिन पहले बदायूं के वजीरगंज इलाके के ब्यौली गांव ने लोकतंत्र के सामने एक ऐसा राष्ट्रीय प्रश्न रख दिया, जिस पर अभी तक न तो किसी समिति का गठन हुआ है, न कोई सर्वदलीय बैठक हुई और न ही कोई सार्थक चर्चा। प्रश्न यह था कि यदि पति को सूखी सब्जी चाहिए और पत्नी रसेदार सब्जी बना दे, तो न्यायपालिका, कार्यपालिका और पुलिस प्रशासन की भूमिका क्या होगी? ब्यौली के एक सज्जन ने इस जटिल सांविधानिक संकट का समाधान स्वयं खोज लिया था। उन्होंने डायल 112 पर फोन कर दिया।
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हमारे यहां पुलिस का काम अब केवल अपराध रोकना नहीं रह गया है। वह धीरे-धीरे भारतीय परिवार की सबसे ‘वरिष्ठ चाची’ बनती जा रही है। पहले वह चोरी, डकैती और मारपीट के बीच दौड़ती थी। अब उसे यह भी तय करना है कि आलू कितना सूखा होना चाहिए और लौकी में कितना पानी डालना चाहिए। पुलिस पहुंची तो पता चला कि मामला कानून व्यवस्था का कम और रसोई व्यवस्था का अधिक है। पति की शिकायत थी कि उसे सूखी सब्जी पसंद है, लेकिन पत्नी रोज रसेदार सब्जी बना देती है। उस रात भी उसने सूखी सब्जी की मांग की थी, मगर थाली में फिर रस आ गया।

यहां से मुझे लगा कि अब इस विषय पर सार्थक चर्चा होनी चाहिए। मैंने अपने पड़ोसी और वरिष्ठ मित्र से बात की। मित्र की राय थी कि संसद में एक स्थायी समिति बने। उसका नाम हो- ‘राष्ट्रीय सूखी सब्जी एवं रसेदार व्यंजन संबंधी समिति’। समिति पहले यह तय करे कि सूखी सब्जी आखिर कितनी सूखी होनी चाहिए। क्या उसमें तेल होना चाहिए? प्याज चल सकता है? टमाटर की अनुमति है? और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह कि रस की सांविधानिक सीमा क्या होगी? मित्र विस्तार से चर्चा के मूड में आ गए, न्यायपालिका यह देखे कि पति की सूखी सब्जी की मांग व्यक्तिगत स्वतंत्रता है या घरेलू निर्देश। कार्यपालिका यह तय करे कि रसेदार सब्जी बनने के बाद अगर बुलावा आए तो पुलिस को कितनी देर में घटना स्थल पर पहुंचना चाहिए और पुलिस को प्रशिक्षण दिया जाए कि ‘साहब, सब्जी में रस ज्यादा है’ जैसी शिकायत को किस श्रेणी में दर्ज किया जाए।”

रसोई घर, दरअसल, भारत का सबसे पुराना लोकतंत्र है। वहां रोज मतदान होता है। कोई कहता है भिंडी बनाओ, कोई कहता है बैंगन। बच्चे आलू पर अड़े रहते हैं। बुजुर्ग दाल के पक्ष में मतदान करते हैं। मां बजट देखती है और आखिर में वही बनता है, जिसे बाजार ने अनुमति दी होती है। इस लोकतंत्र में बहुमत से ज्यादा महत्व जेब और मौसम का होता है। लेकिन ब्यौली ने इस लोकतंत्र में पुलिस का पर्यवेक्षक नियुक्त कर दिया। घटना में शराब भी थी। सज्जन ने पुलिस को बताया कि उन्होंने शराब पी है। पूछने पर तर्क दिया, “सरकार बेचती है, इसलिए लोग पीते हैं।” यह तर्क सुनकर मुझे लगा कि हमारी सार्थक चर्चा के लिए इससे अच्छा विषय हो ही नहीं सकता।

मेरे वरिष्ठ मित्र ने सलाह दी कि समिति बनने से पहले जरूरी है कि वरिष्ठों को टीवी पर बुलाया जाए। एक वरिष्ठ आंखें मूंदकर कहेंगे, “देखिए साहब, बुनियादी तौर पर समस्या सब्जी की नहीं, हमारे सामाजिक ढांचे की है।” दूसरे वरिष्ठ अपनी गर्दन 60 डिग्री पर झुकाकर कहेंगे, “मैं इससे सहमत हूं, लेकिन मेरा दृष्टिकोण थोड़ा अलग है। हमें एक समग्र विजन की जरूरत है।”

बस, मिल गया विजन! मेरे सामने टीवी की स्क्रीन पर बड़े-बड़े लाल अक्षरों में चमकता हुआ दिखा- 'सब्जी पर संग्राम!' 'सूखी बनाम रसेदार-कौन जिम्मेदार?' कतारबद्ध हाई टेबल पर हाथ रखे कई वरिष्ठ नजर आए। तभी मेरे कानों में एंकर की आवाज गूंजी- “आखिर देश जानना चाहता है कि पत्नी को रसेदार सब्जी बनाने का अधिकार है या नहीं?”

पहला वरिष्ठ- “यह केवल सब्जी का मामला नहीं है। यह भारतीय परिवार में संवाद के संकट का मामला है।”
दूसरा वरिष्ठ- “मैं इससे सहमत नहीं हूं। असली सवाल यह है कि पति को सूखी सब्जी चाहिए थी तो पत्नी ने रसेदार क्यों बनाई?”
तीसरा वरिष्ठ- “देखिए, हमें सब्जी को सब्जी की तरह नहीं, एक व्यापक सामाजिक परिघटना की तरह देखना होगा।”
एंकर- “बिल्कुल और मेरा सीधा सवाल है- क्या रसेदार सब्जी हमारे लोकतंत्र के लिए खतरा है?” आगे के लगभग 40 मिनट की सार्थक चर्चा की रूपरेखा मेरे दिमाग में गूंजती-सी रही। कोई वरिष्ठ कहते दिखे कि यह लैंगिक समानता का प्रश्न है। किसी ने इसे पारिवारिक संवाद का संकट बताया। कोई भारतीय संस्कृति में भोजन की बदलती भूमिका पर प्रकाश डालने लगे। कोई डिजिटल युग में घरेलू असहमति के संस्थानीकरण पर बोलते दिखे। मेरे दिमाग में बहस आगे बढ़ती चली गई।
पहला वरिष्ठ- “हमारे समय में लोग सूखी सब्जी खाते थे, देश चलता था।”
दूसरा वरिष्ठ- “रसेदार सब्जी हमारी गंगा-जमुनी तहजीब है।”
तीसरा वरिष्ठ- “यह सब्जी नहीं, नारी सशक्तीकरण का प्रश्न है।”
चौथा वरिष्ठ- “लेकिन भाई साहब, पुलिस को क्यों बुलाया?”

सब चुप। तभी एंकर की आवाज गूंजी- “यही तो हम पूछ रहे हैं! आखिर पुलिस क्यों आई? क्या अब थाने में सब्जी का स्वाद तय होगा?”
एक विशेषज्ञ ने बताया कि पति ने चार-पांच बार डायल 112 किया था। शराब पी थी। डेढ़ क्वार्टर पी थी। उसने यह भी कहा कि जब सरकार बेचती है तो हर कोई पीता है। अब बहस का विषय मुझे बदलता हुआ दिखा- 'शराब कौन बेचता है?'
पहला वरिष्ठ- “सरकार को इस पर सोचना चाहिए।
दूसरा वरिष्ठ- “सरकार को बीच में मत लाइए।”
तीसरा वरिष्ठ- “सरकार को बीच में लाना ही लोकतंत्र है।”
चौथा वरिष्ठ- “सूखी सब्जी का क्या हुआ?“
अब एंकर की बारी- “आप मुद्दे से भटक रहे हैं।”

और यहीं टीवी की सार्थक बहस अपने चरम पर पहुंच जाएगी। जिस आदमी ने पुलिस इसलिए बुलाई थी कि उसे रसेदार सब्जी नहीं चाहिए, उसकी समस्या अब राष्ट्रीय हो चुकी होगी। बहस के अंत में एंकर की आवाज फिर से सुनाई देगी- “आज की बहस से एक बात तो साफ है- देश को सूखी या रसेदार सब्जी में से किसी एक को चुनना ही होगा। इस विषय पर और व्यापक स्तर पर सार्थक चर्चा की आवश्यकता है।”

यही हमारी सार्थकता है। बात इतनी सार्थक हो जाती है कि उसका कोई अर्थ निकालना असंभव हो जाता है। पहले यूपीआई पर चर्चा होती है कि किसको कितना देना है। फिर सब्जी पर चर्चा हो तो किसको कितना रस देना है। फिर समिति तय करती है कि भुगतान में पारदर्शिता और सब्जी में पारदर्शिता दोनों जरूरी हैं। इस बहस की रूपरेखा के बाद मेरा मन उत्साह से सरोबार है।

अगर मेरा यह विषय पास हो गया और मुझे बुला लिया गया तो मैं जरूर जाऊंगा। मैं वरिष्ठ हूं और उम्र भर अनुभव जमा करने का असली मतलब यही निकलता है कि आखिर में आप भी उसी कतार में जाकर खड़े हो जाएं, जो कतार कहती हो- “अभी और सार्थक चर्चा की जरूरत है।”

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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