भीम राव अम्बेडकर जयंती विशेष
- फोटो : Facebook/Gurudev Sri Sri Ravi Shankar
उन्होंने भारतीय समाज व्यवस्था, जाति व्यवस्था, धर्म का, अर्थ-तंत्र, वंचित वर्ग के अधिकार, मजदूरों और कामगारों का हित, महिला-अधिकार, व्यवस्थापिका, कार्यपालिका एवं सरकारी सेवा में दलित वर्ग के स्वाभाविक प्रतिनिधितत्व के साथ ही शिक्षा, ज्ञान-विज्ञान आदि मुद्दों पर सर्वाधिक तार्किक ढ़ंग से सोचा-विचारा और अपने निष्कर्षों को हमारे सामने रखा। वे एक बहुपठित और बहुज्ञ व्यक्तित्व के स्वामी थे. उनका वैचारिक-पक्ष न्यायोचित एवं मानवीय था। उनका सम्पूर्ण जीवन और वैचारिक-भूमिका भारतीय समाज और चेतना में समरसता को स्थापित करने हेतु न्यायोचित परिवर्तन के लिए समर्पित रहा।
उन्होंने अपनी श्रमसाध्य ज्ञानात्मक प्रयासों से यह पाया कि भारतीय समाज व्यवस्था में निहित संरचनाएं, जैसे, जाति-व्यवस्था, वर्ण-व्यवस्था, अस्पृश्यता, ऊंच-नीच, शोषण, अन्याय आदि बाद के दिनों में आये विभिन्न गतिरोधों एवं विकृतियों की उपज हैं न कि प्राचीन भारतीय समाज-व्यवस्था का मूल स्वभाव।
भारतीय समाज व्यवस्था, आर्थिक तंत्र, राजनैतिक प्रक्रियाओं एवं सभ्यता की उपलब्धियां तथा दुविधाओं के प्रति बाबा साहेब का समझ अतुलनीय है। अपनी इसी विशिष्ट प्रतिभा के चलते वे स्वतंत्र भारत के प्रथम विधि एवं न्याय मंत्री बने। वह भारतीय संविधान के जनक एवं भारतीय गणराज्य के निर्माताओं में से एक थे। उनके भारतीय संविधान के अभूतपूर्व योगदान के लिए उन्हें ‘भारतीय संविधान का पितामह’ कहा जाता है। सन् 1951 में उन्होंने ‘भारत के वित्तीय कमीशन’ की स्थापना की।
डॉ. अम्बेडकर की अंतिम पांडुलिपि “द बुद्धा एंड हिज़ धम्म” को पूरा करने के 3 दिन पश्चात्, उनकी मृत्यु 6 दिसंबर, 1956 को दिल्ली में नींद में ही हो गई पर आज भी वे ‘बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर’, ‘जय भीम’, ‘एक महानायक’ के रूप में अमर हैं।
गूगल द्वारा उनके 124वें जन्मदिवस पर एक होम पेज Doodle (डूडल) प्रारंभ किया गया। डॉ. अम्बेडकर कहा करते थे, “हम शुरू से लेकर अंत तक भारतीय हैं और मैं चाहता हूँ कि भारत का प्रत्येक मनुष्य भारतीय बने, अंत तक भारतीय रहे और भारतीय के अलावा कुछ न बने।”
ऐसे युग निर्माता के 131वें जन्मदिवस पर हम सभी भारतीयों के लिए उनका संदेश “शिक्षित बनो, संगठित बनो, संघर्ष करो” प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है। भारतीय संविधान में बहुमूल्य योगदान इस देश को एक नई दिशा देने वाले बाबा साहेब समता, स्वतंत्रता और समरसता के सौन्दर्य के स्वाभाविक प्रतीक पुरुष थे।
उनके क्रांतिकारी विचार और निष्कर्ष, उनके द्वारा खोजे और पाये गये प्राथमिक स्रोतों पर आधारित हैं। इसीलिए वर्तमान समय में भी उनके विचारों की प्रासंगिकता बनी हुई है बल्कि यूं कहें कि और बढ़ गई है।
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