1787 में बाबू जगत सिंह ने अपने नाम पर बाजार बनवाने के लिए इस क्षेत्र की खोदाई कराई, जिसमें मानव हड्डियां और बुद्ध की मूर्ति मिली थी। चुनार के बलुआ पत्थर का बक्सा स्तूप के अंदर 1835 में पाया गया था। जगत सिंह के मजदूरों ने करीब छह फीट तक खोदाई की व पत्थर का बक्सा छोड़ दिया। मेजर किट्टो ने इसका पूरा उत्खनन कराया।
विश्वविख्यात बौद्ध धर्मस्थल एवं पर्यटन केंद्र सारनाथ की खोज के ऐतिहासिक तथ्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि इसकी खोज वाराणसी के बाबू जगत सिंह ने की थी। बाद में श्रेय अलेक्जेंडर कनिंघम ने लिया। बाबू जगत सिंह की सूचनाओं के आधार पर कनिंघम ने इसका उत्खनन कराया। अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) ने ऐतिहासिक तथ्यों की गहन छानबीन के बाद बाबू जगत सिंह के योगदान को स्वीकार कर लिया है।
एएसआई के महानिदेशक वाई एस रावत के अनुसार, सारनाथ परिसर में लगी पट्टिका (शिलालेख) में अब संशोधन कर दिया गया है, जिसमें जगत सिंह की भूमिका को मान्यता दी गई है। नई पट्टिका में बताया गया है कि इस स्थल का महत्व 18वीं सदी के आखिर में तब सामने आया, जब बाबू जगत सिंह ने निर्माण सामग्री के लिए एक प्राचीन टीले की खोदाई कराई थी। लगभग 1787 में सारनाथ के जमींदार बाबू जगत सिंह को इस क्षेत्र में ईंटों और पत्थरों के अंबार का पता चला।
उन्होंने अपने नाम पर बाजार बनवाने के लिए इस क्षेत्र की खोदाई कराई। यह बाजार आज भी जगतगंज के नाम से विख्यात है। धमेख स्तूप से करीब 520 फीट पश्चिम में खोदाई के दौरान ईंट-पत्थरों के ढेर के नीचे 18 हाथ की गहराई पर बक्से में मानव हड्डियां, सोने की पत्तियां व अन्य मूल्यवान रत्न भी मिले थे। बुद्ध की एक मूर्ति भी पाई गई थी, जिसके नीचे पाल राजा महिपाल का एक शिलालेख था। यह विक्रम संवत 1083 (ईस्वी सन् 1026) का दिनांकित शिलालेख है। हालांकि, कनिंघम के अनुसार, चुनार के बलुआ पत्थर का बक्सा स्तूप के अंदर 1835 में पाया गया था। उन्होंने इसे पास के गांव के एक व्यक्ति (संगकर या शंकर) द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर खोजा था, जो 1787 में स्तूप की खोदाई करने वाली टीम के मजदूरों में से एक था।
कनिंघम के अनुसार, 49 फीट व्यास वाले ईंटों के अर्धगोलाकार स्तूप के भीतर मोटी गोलाकार दीवार सुरक्षित मिली। बाबू जगत सिंह के मजदूरों ने करीब छह फीट तक खोदाई की और पत्थर का बक्सा छोड़ दिया। 18 वर्ष बाद मेजर किट्टो ने इसका पूरा उत्खनन कराया। कुल मिलाकर, सारनाथ में स्तूप की खोदाई अनजाने में हुई थी और कोई नहीं जानता था कि यह स्थान पुरातात्विक महत्व का एक प्राचीन बौद्ध स्थल था। बाबू जगत सिंह के मजदूर को 1787 में खोदाई के दौरान जो दो बक्से मिले, उन्हें एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल को सौंप दिया गया था, जहां से वे कालांतर में गायब हो गए।