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इसलिए कश्मीर में दिलचस्पी ले रहा है अमेरिका, ट्रंप के बयानों में छिपी है पाकिस्तान की चाल

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एक बार फिर डोनाल्ड ट्रंप ने कश्मीर मामले पर मध्यस्थता की पेशकश की है। - फोटो : PTI
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एक बार फिर डोनाल्ड ट्रंप ने कश्मीर मामले पर मध्यस्थता की पेशकश की है। कुछ दिनों में ही ट्रंप की यह दूसरी पेशकश है। हालांकि भारत ने इस पेशकश को ठुकरा दिया है। लेकिन ट्रंप की इस पेशकश ने फिर भारत को असमंजस की स्थिति में ला दिया है। इस पेशकश में अमेरिकी कुटनीति का वो राज है, जिसमें अमेरिकी स्वार्थ भी है और पाकिस्तानी दबाव भी है।

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इस पूरे खेल को बहुत हल्के में लेने की जरूरत नहीं है। एक तरफ अगले साल अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव है। ट्रंप दूसरी बार राष्ट्रपति चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। दूसरी तरफ अफगानिस्तान के बहाने अमेरिका से पाकिस्तान कई मदद चाहता है, क्योंकि पाकिस्तान की मदद के बिना अफगान शांति वार्ता सफल होने की उम्मीद न के बराबर है।

इधर, पाकिस्तान-अफगानिस्तान की लंबी भौगोलिक सीमा, ईऱान का पाकिस्तान का पड़ोसी होना इन सबने अमेरिका को परेशान किया है। ऐसे में दोनों में से एक की मदद के बिना अफगानिस्तान में शांति आ नहीं सकती। ईरान किसी भी कीमत पर अमेरिका की मदद नहीं करेगा। ऐसे में पाकिस्तान की शर्तों को माने बिना अफगान शांति वार्ता अमेरिका सफल नहीं करवा सकता है।

 

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इमरान खान की अमेरिका यात्रा से पहले पाकिस्तान ने एक सुनियोजित अभियान चलाया। - फोटो : PTI

पाकिस्तानी खेल को समझिए
तालिबान और पाकिस्तानी कट्टटरपंथियों के जमात के खास समर्थक रहे इमरान खान इस समय अफगानिस्तान शांति वार्ता में पाकिस्तान की भूमिका तय करने में सफल हो गए हैं। अमेरिका यात्रा के दौरान अफगानिस्तान मुद्दे पर ट्रंप ने उन्हें खासा तव्वजो दी है। लेकिन इमरान खान की अमेरिका यात्रा से पहले पाकिस्तान ने एक सुनियोजित अभियान चलाया। पाकिस्तान लगातार बोलता रहा कि ‘वॉर अगेंस्ट टेरर’ का सबसे ज्यादा नुकसान पाकिस्तान को हुआ, क्योंकि अफगान युद्ध पाकिस्तान का नहीं अमेरिका का था, लेकिन इससे पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था चौपट हो गई।

इमरान खान तर्क देते रहे कि 2001 से 2018 तक पाकिस्तान को 123 अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान हुआ। जबकि इसके एवज में पाकिस्तान को अमेरिकी से सिर्फ 33 अऱब डॉलर की मदद मिली। पाकिस्तान ने मानवीय नुकसान की बात लगातार की। पाकिस्तान ने कहा कि आतंकवाद के कारण पाकिस्तान में एक लाख के करीब लोग मारे गए।

इमरान खान की अमेरिका यात्रा के पहले पाकिस्तानी अखबारों और टीवी चैनलों में लगातार इस चर्चा पर जोर दी जा रही थी कि अगर पाकिस्तान अफगानिस्तान में शांति वार्ता में मदद करेगा तो इसके एवज में पाकिस्तान को क्या मिलेगा? मतलब पाकिस्तान अमेरिका से कई मदद इस सहयोग के बदले चाहता है।

अमेरिकी कंट्रोल वाले फाइनांशियल एक्शन टास्क फोर्स से पाकिस्तान राहत चाहता है कि जिसने पाकिस्तान को आतंकियों पर ठोस कार्रवाई के लिए अक्टूबर तक का समय दिया है। वहीं अफगानिस्तान के बदले कश्मीर में अमेरिका की मध्यस्थता चाहता है। अमेरिका को पता है कि अफगान तालिबान के नेता पाकिस्तान के भी नजदीक है, ईऱान के भी नजदीक है। पाकिस्तान को पता है कि अमेरिका अफगानिस्तान में सलाना 50 अरब डॉलर खर्च कर रहा है। अमेरिका अब इस खर्च से उब चुका है, इसलिए अमेरिका जल्द से जल्द अफगानिस्तान से  निकलना चाहता है। वैसे में  पाकिस्तान अमेरिकी मजबूरी का लाभ उठाना चाहता है।  

पाकिस्तान अपनी भूगोल की अहमियत बताते हुए भारत को अफगानिस्तान से बाहर करना चाहता है। - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

पाकिस्तान क्या चाहता है अमेरिका से? कश्मीर पर क्यों बयान दे रहे हैं ट्रंप 
पाकिस्तान अपनी भूगोल की अहमियत बताते हुए भारत को अफगानिस्तान से बाहर करना चाहता है। निश्चित तौर पर इमरान खान ने अमेरिकी दौरे के दौरान ट्रंप को इशारों में ये बात कही है। वैसे भी अमेरिकी व्यवहार से साफ दिखता है कि अफगानिस्तान में भारत की भूमिका को लेकर अमेरिका इस समय ज्यादा गंभीर नहीं है।

इधर, अभी तक तालिबान से जितने दौर की शांति वार्ता हुई है, उसमें भारत बाहर रहा है। मॉस्को में एक वार्ता में भारतीय प्रतिनिधि जरूर थे। जबकि भारत अफगानिस्तान में खासा आर्थिक निवेश कर चुका है। अफगानिस्तान के बुरे दिनों में भारत ने वहां खासा विकास से संबंधित प्रोजेक्टों को भी पूरा किया है। वहीं इमरान खान एक बाऱ फिर अफगानिस्तान और कश्मीर की समस्या को एक दूसरे से जोड़ने में कामयाब होते नजर आ रहे हैं।

यही वजह है कि ट्रंप लगातार कश्मीर में मध्यस्थता की बात कर रहे हैं। वहीं पाकिस्तान भी लगातार कह रहा है कि अफगान शांति वार्ता तभी सफल होगी जब कश्मीर की समस्या को हल किया जाए। दरअसल पहले भी अमेरिकी प्रशासन ने कश्मीर और अफगानिस्तान की समस्या को एक दूसरे जोड़ कर देखा है।    

मध्यस्थता का प्रस्ताव ठुकराया, पर दबाव हमेशा रहा है
भारत ने कश्मीर विवाद पर मध्यस्थता का प्रस्ताव हमेशा ठुकराया है। लेकिन अंतराष्ट्रीय मध्यस्थता को लेकर भारत पर दबाव रहा है यह सच्चाई भी है। केंद्र में चाहे कांग्रेस की सरकार रही हो या भाजपा की, जाने-अनजाने में कश्मीर पर मध्यस्थता को खुद न्योता दिया गया।

दरअसल कश्मीर समस्या पर मध्यस्थता की गुंजाइश तभी बन गई थी जब कश्मीर मसला संयुक्त राष्ट्र में पहुंचा। इसके लिए भारत खुद जिम्मेवार था। संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर मसले को ले जाने का परिणाम 1950 में डिक्शन प्लॉन के तौर पर सामने आया था।

संयुक्त राष्ट्र ने ओवन डिक्शन को कश्मीर मामलों पर यूएन रिप्रजेंटेटिव नियुक्त किया था। डिक्शन कश्मीर को लेकर एक समझौता संबंधी मसौदा लेकर सामने आए। इस मसौदे में कश्मीर घाटी मे प्लेबसाइट की बात की गई। जम्मू क्षेत्र को भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजित करने का प्रस्ताव था। लद्दाख भारत को देने को प्रस्ताव था।

पाकिस्तानी कब्जे वाला कश्मीर और नार्दन एरिया पाकिस्तान को देने का प्रस्ताव था। भारत ने डिक्शन प्लॉन नकार दिया। भारत को तबतक समझ में आ गया कि कश्मीर मसला संयुक्त राष्ट्र में ले जाना एक भूल थी। इसके बाद कश्मीर मसले को द्विपक्षीय बातचीत से हल करने की घोषणा भारत और पाकिस्तान ने खुलकर दो बार की। लेकिन सच्चाई यह है कि दोनों मुल्क समय-समय पर अंदर खाने तीसरे मुल्कों की मध्यस्थता तनाव बढ़ने पर स्वीकार करते रहे।

1972 में इंदिरा गांधी और जुल्फिकार अली भुट्टों के बीच शिमला समझौता हुआ। इसमें सारे मामले को द्विपक्षीय तरीके से हल करने की बात हुई। 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी और नवाज शरीफ ने लाहौर घोषणापत्र संधि को अंजाम दिया। इसमें भी दोनों मुल्कों के विवाद को दिपक्षीय तरीके से हल करने की बात की गई।

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चीन और पाकिस्तान की नजदीकी भारत के लिए खतरा बनी हुई है - फोटो : The Dawn

कश्मीर में थर्ड पार्टी के तौर पर चीन की घुसपैठ
तमाम मध्यस्थता को ठुकराए जाने के दावे के बाद भी कश्मीर मामले पर अंदरखाने मध्यस्थता हुई। इसका मुख्य कारण दक्षिण एशिया में चीन का बढ़ता प्रभाव, भारत और पाकिस्तान दोनों का परमाणु शक्ति संपन्न होना, अफगानिस्तान में अमेरिका की मौजूदगी और अमेरिका के लिए पाकिस्तान का भौगौलिक महत्व है।

बेशक भारत यह बात करे कि कश्मीर में भारत कोई मध्यस्थता स्वीकार नहीं करेगा। लेकिन एक सच्चाई यह है कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर जिसपर भारत का दावा है, वहां चीन का भारी निवेश हो चुका है। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर चीन के बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।

चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर के तहत चीन ने यहां खासा निवेश भी कर दिया है। यहां बिजली उत्पादन प्लांट चीन ने लगाए हैं। सड़क और रेल परियोजना की भी शुरुआत की है। झेलम नदी पर 2 अरब डॉलर की लागत से बनने वाले कारोट हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट चीन जल्द ही पूरा करने वाला है। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में 1100 मेगावाट का कोहाला पावर प्रोजेक्ट चीन जल्द पूरा करेगा।

जाहिर है इन परिस्थितियों में कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच युद की स्थिति पैदा होगी तो चीन तुरंत हस्तक्षेप करेगा, क्योंकि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में चीनी कंपनियों के जहां भारी पैसे लगे हैं, वहीं हजारों चीनी वर्कर भी मौजूद हैं।

कारगिल युद में भी बिल क्लिंटन मध्यस्थ थे
हालांकि मध्यस्थता की कोशिश पहले भी होती रही है। भारत ने भी मध्यस्थता स्वीकार की है। 1999 में कारगिल युद्ध के समय अमेरिका ने अंदर खाने की मध्यस्थता की। अटल बिहारी वाजपेयी और नवाज शरीफ दोनों की सरकारें युद्ध खत्म करने के लिए बिल क्लिंटन की सरकार की मध्यस्थता स्वीकार की थी। इसके बाद कारगिल युद्ध समाप्त हो गया।

कारगिल युद्ध से पहले दोनों मुल्क पूरी तरह से परमाणु संपन्न हो गए थे। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने पोखरण में परमाणु परीक्षण किया था। इसके जवाब में नवाज शरीफ सरकार ने भी परमाणु परीक्षण किए थे। चूकिं दोनों मुल्क परमाणु हथियारों से संपन्न थे, इसलिए अमेरिकी मध्यस्थता उस समय जरूरी हो गई थी, यही विशेषज्ञों की राय थी, क्योंकि युद्ध बढ़ने की स्थिति में दोनों मुल्कों के बीच परमाणु युद्ध हो सकता था।

पहले भी होती रही है अमेरिका की ओर से मध्यस्थता की पेशकश 
वैसे डोनाल्ड ट्रंप पहले राष्ट्रपति नहीं है, जिन्होंने कश्मीर को लेकर मध्यस्थता की बात की है। इससे पहले 2008 में बराक ओबामा ने राष्ट्रपति चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि दोनों मुल्कों के कश्मीर को लेकर चल रहे तनाव को खत्म करने के लिए अमेरिका का सहयोग देना एक गंभीर विषय है। वैसे अमेरिका के अलावा ब्रिटेन ने भी कश्मीर विवाद को हल करने के लिए मध्यस्थता की अंदरखाने से की है।

इधर, नार्वे ने भी कश्मीर विवाद में मध्यस्थता की भूमिका निभाने की पेशकश पिछले साल ही की थी। नार्वे के पूर्व प्रधानमंत्री बोंडेविक ने नवंबर 2018 कश्मीर घाटी में दौरा कर अलगाववादियों से मुलाकात की थी। वे पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर में भी गए। वे आर्ट ऑफ लीविंग के श्री श्री रविशंकर के आमंत्रण पर  कश्मीर में मध्यस्थता का प्रस्ताव लेकर पहुंचे थे।

दरअसल, रूसी ब्लॉक के कमजोर होने और शीत युद्ध समाप्ति के बाद अमेरिकी ताकत पूरे विश्व में मजबूत हुई थी। जबतक भारत को मजबूत रूसी ब्लॉक का समर्थन रहा कश्मीर मसले पर भारत अंतराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान को पछाड़ता रहा। भारत ईऱान समेत कई इस्लामिक देशों का समर्थन भी लेता रहा। लेकिन अमेरिका की स्वार्थी कूटनीति और चीन के पाकिस्तानी अधिकृत कश्मीर में आर्थिक हितों ने भारत की परेशानी बढ़ाई। 

मध्यस्थता पर चीन का स्टैंड भारत की परेशानी
कश्मीर मसले पर मध्यस्थता का समर्थन करने वाला चीन का स्टैंड भी भारत को असहज करने वाला है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कश्मीर मसले पर मध्यस्थता की पेशकश को चीन ने समर्थन दिया है। चीन के प्रमुख अखबार ग्लोबल टाइम्स जो चीनी सरकार का एक तरह से मुखपत्र है ने भी कश्मीर पर अंतराष्ट्रीय मध्यस्थता जरूरी बतायी है।

ग्लोबल टाइम्स में हाल ही में छपे लेख मे कहा गया कि डोनाल्ड ट्रंप से पहले भी नेल्सन मंडेला और नार्वे ने कश्मीर विवाद हल करने के लिए मध्यस्थता की पेशकश की थी। लेकिन भारत ने मध्यस्थता के दरवाजे बंद किए, जो बेहद दुखद है।

ग्लोबल टाइम्स के लेख के अनुसार भारत को यह समझना चाहिए कि आखिरकार क्यों अंतराष्ट्रीय समुदाय भारत और पाकिस्तान के बीच 70 सालों से चल रहे तनाव को खत्म करने के लिए मदद करना चाहता है? क्योंकि दोनों मुल्क आपस में बातचीत से अभी तक तनाव खत्म नहीं कर सके है। इन परिस्थितियों में चीन हमेशा अंतराष्ट्रीय मध्यस्थता का समर्थन करता है।

ग्लोबल टाइम्स ने साफ लिखा कि दोनों मुल्कों के बीच तनाव परमाणु युद्ध में बदल सकता है, इससे चीन के राष्ट्रीय हितों का भी भारी नुकसान हो सकता है। इससे चीन के बेल्ट एंड रोड पहल को भारी नुकसान हो सकता है, इसलिए चीन अंतराष्ट्रीय मध्यस्थता का समर्थन करता है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।            

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