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भारत और रूस की इस दोस्ती को स्थाई वरदान न समझें

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vladimir putin, PM Modi
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रूस के साथ भारत के रिश्तों को किसी प्रमाण की जरूरत नहीं है। दशकों से ये परवान चढ़ते रहे हैं और वक्त के पैमाने पर इन संबंधों की गहराई भी साबित हुई है। इसे देखते हुए रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की अपने चौथे कार्यकाल की आठवीं यात्रा भारत के लिए बहुत अर्थ रखती है। सोवियत संघ के विघटन से पहले भी भौगोलिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनयिक स्तर पर दोनों देशों ने लंबा साझा सफर तय किया है।

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यह भी खास है कि एकाध अपवाद को छोड़कर कहीं मतभेद की स्थिति भी नहीं बनी है। यही भारतीय विदेश नीति की विशेषता है कि सरकारों के बदलने के साथ उसकी नीति नहीं बदलती। इतिहास गवाह है कि जब भी इससे आंशिक विचलन भी हुआ तो हिंदुस्तान के लिए वह बहुत फायदेमंद साबित नहीं रहा। 

हाल के वर्षों में अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य पर कुछ ऐसी धारणा बनने लगी थी कि भारत अपने इस पुराने और परखे दोस्त से थोड़ा दूर जा रहा है। रूस के लिए यह झटका था। इसी कारण बीते कुछ बरसों में उसकी दिशा पाकिस्तान की ओर जाती दिखाई दी थी।
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हिंदुस्तान के लिए यह एक इशारा था। अच्छी बात यह रही कि भारत ने इस संकेत को समय रहते समझ लिया। पाकिस्तान से रूस और चीन की मित्रता एक सिरदर्द बन जाती। किसी एक मुल्क के साथ एक जंग भी हमेशा के लिए फासले की लकीर खींच देती है और नहीं भूलना चाहिए कि रूस और चीन की सेनाएं अतीत में एक युद्ध लड़ चुकीं हैं।

लिहाजा भारत से स्थायी दोस्ती भारत और रूस दोनों के हित में है। अगर आप समझना चाहें तो राष्ट्रप्रमुखों की यात्राएं रिश्तों के बारीक रेशों की पड़ताल करने का अवसर देती हैं। इस नजर से ध्यान दीजिए कि अपने हर कार्यकाल में पुतिन करीब करीब दो बार भारत आए हैं। इसके उलट एक बार भी वो पाकिस्तान नहीं गए हैं।

इसी तरह अगर चीन के राष्ट्रपति की यात्राएं देखें। वे हिंदुस्तान आते हैं तो पहले पाकिस्तान जाते हैं। यहां तक कि मालदीव और लंका भी वो भारत से पहले जाते रहे हैं। इनका अपने आप में अर्थ है। चार अक्टूबर को पुतिन की यात्रा इस बार भारत के लिए दूरगामी परिणाम देने वाली साबित होगी। हम यह आशा कर सकते हैं। 

भारत कैसे भूल सकता है ,जब 1951 में देश के सामने गंभीर अनाज संकट था और भुखमरी की नौबत आ गई थी। भारत ने अमेरिका और रूस दोनों से मदद मांगी। अमेरिका अपनी संसद में चर्चा ही करता रहा और रूस ने 50000 टन गेहूं तुरंत भेज दिया था। इसी तरह जब 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध हुआ तो अमेरिका, ब्रिटेन, संयुक्त अरब अमीरात, फ्रांस और चीन जैसे देश उसके पक्ष में खुलकर आ गए थे। भारत को धमकियां देने लगे थे।

अमेरिका ने अपना सातवां जहाजी बेड़ा भेज दिया था , जो परमाणु हथियारों से लैस था। जवाब में रूस ने अपनी परमाणु पनडुब्बी और नौसेना उन्हें रोकने के लिए भेजी थी। भारत अगर उस जंग में जीता तो बड़ा समर्थन रूस का था। इस जंग से पहले भारत और सोवियत संघ ने मजबूत रक्षा संधि की थी।

ये दो तो ऐसे उदाहरण हैं, जो भारत के लिए उपकार जैसे हैं। मगर सत्तर साल के सफर में रूस हरदम चट्टान की तरह भारत के साथ खड़ा रहा है। भिलाई स्टील प्लांट से लेकर कलपक्कम परमाणु बिजलीघर तक एक लंबी साझी यात्रा है। 


अगर अत्यंत निरपेक्ष मूल्यांकन करें तो यह साफ है कि जब भी दोनों देशों के संबंधों में बारीक सी दरार दिखी है, उसमें भारत की गलती रही है। आज के दौर में विचारधाराओं के आधार पर दुनिया की खेमेबाजी दम तोड़ चुकी है। सारा जोर आर्थिक हितों पर आधारित है। जो अमेरिका आजादी के बाद पाकिस्तान के साथ पींगें बढ़ाता रहा, वह भारत के साथ संबंध सुधारने पर मजबूर हुआ क्योंकि आर्थिक मंदी के दौर में उसे भारत के बड़े बाजार की जरूरत थी।

आज भी उसके लिए अपने वित्तीय हित सर्वोपरि हैं। वह ईरान को सबक सिखाने के लिए भारत के हितों को कुर्बान करने का फरमान दे रहा है। भारत पर प्रतिबंध लगाने की धमकी तक दे रहा है। पहले भी भारत ने अमेरिकी संबंधों का ध्यान रखते हुए ऐसे फैसले लिए हैं, जिनका नुकसान उठाना पड़ा है।

भारत को अमेरिकी दांव में उलझने से बेहतर अपने पारंपरिक दोस्ती को प्राथमिकता देनी होगी। हम किसी भी दोस्ती को आज स्थाई वरदान या संबंधित देश की विवशता नहीं मान सकते। चाहे वह मालदीव जैसा कोई छोटा मुल्क ही क्यों न हो।
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