भारत में दिवाली का अर्थ केवल दीप जलाना, मिठाइयां बांटना और आतिशबाजी करना नहीं है। यह ऐसा पर्व है, जिसमें देश की धार्मिक मान्यताएं, पौराणिक आख्यान, ऐतिहासिक स्मृतियां और क्षेत्रीय परंपराएं एक साथ दिखाई देती हैं। इसकी विशेषता यह है कि दिवाली का उत्सव पूरे देश में एक ही तिथि के आसपास मनाया जाता है, लेकिन उसके पीछे जुड़ी कथाएं और पूजा-पद्धतियां अलग-अलग हैं।
उत्तर भारत में भगवान श्रीराम के अयोध्या आगमन की स्मृति प्रमुख है, दक्षिण भारत में नरकासुर वध की कथा, पश्चिम भारत में लक्ष्मी पूजन और व्यापारिक नववर्ष की परंपरा तथा पूर्वी भारत में मां काली की उपासना दिवाली को अलग-अलग सांस्कृतिक पहचान देती है। इन परंपराओं को अलग-अलग देखने के बजाय भारतीय सभ्यता की व्यापक सांस्कृतिक विरासत के रूप में समझना चाहिए।
दिवाली की यही खूबी है कि इसमें स्थानीय आस्थाओं के लिए पर्याप्त स्थान है, लेकिन उसका मूल भाव प्रकाश, शुभता, धर्म और समृद्धि से जुड़ा हुआ है।
उत्तर भारत में दिवाली का सबसे लोकप्रिय धार्मिक आधार भगवान श्रीराम का अयोध्या लौटना है। रामायण की प्रचलित परंपरा के अनुसार, चौदह वर्ष का वनवास पूरा करने और रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण अयोध्या लौटे थे। उनके स्वागत में अयोध्यावासियों ने दीप जलाए। यह प्रसंग दिवाली को धर्म की अधर्म पर विजय, मर्यादा की प्रतिष्ठा और आदर्श शासन की वापसी का प्रतीक बनाता है। हालांकि, रामायण के विभिन्न पाठों और क्षेत्रीय परंपराओं में इस प्रसंग का वर्णन मिलता है, लेकिन कार्तिक अमावस्या को अयोध्या में दीपोत्सव मनाने की परंपरा उत्तर भारतीय लोकस्मृति में विशेष रूप से स्थापित है। अयोध्या में सरयू तट पर दीप प्रज्वलन इसी सांस्कृतिक स्मृति का सार्वजनिक रूप है।
कार्तिक अमावस्या की संध्या को मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा उत्तर भारतीय दिवाली का दूसरा प्रमुख पक्ष है। लक्ष्मी को धन, ऐश्वर्य और समृद्धि की देवी तथा गणेश को बुद्धि, विवेक और विघ्नों के निवारण का देवता माना जाता है। घरों और प्रतिष्ठानों की सफाई, रंगोली, दीपदान, नए वस्त्र और पूजा-अर्चना इसी परंपरा का हिस्सा हैं।
उत्तर भारत में दिवाली का संबंध केवल एक दिन से नहीं, अपितु धनतेरस से भाई दूज तक चलने वाले पांच दिवसीय दीपोत्सव से भी है। इस दौरान गोवर्धन पूजा और अन्नकूट की परंपरा भी निभाई जाती है। इस प्रकार उत्तर भारत की दिवाली में रामकथा, लक्ष्मी आराधना और पारिवारिक-सामाजिक उत्सव तीनों का समावेश है।
दक्षिण भारत में दिवाली
दक्षिण भारत में दिवाली की प्रमुख धार्मिक स्मृति भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध से जुड़ी है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार नरकासुर के अत्याचारों से देवता और मनुष्य परेशान थे। भगवान श्रीकृष्ण ने उसकी शक्ति का अंत कर लोगों को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई। कुछ परंपराओं में इस युद्ध में सत्यभामा की भूमिका को भी महत्वपूर्ण माना जाता है। नरकासुर वध की स्मृति में नरक चतुर्दशी मनाई जाती है, जो दिवाली से एक दिन पहले आती है।
- दक्षिण भारत के अनेक हिस्सों में यही दिन दिवाली उत्सव का प्रमुख दिन होता है। तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में सूर्योदय से पहले उठकर अभ्यंग स्नान करने, नए वस्त्र पहनने, पारंपरिक पकवान बनाने और पूजा करने की परंपरा है। तेल स्नान को शारीरिक शुद्धि और शुभ शुरुआत से जोड़ा जाता है।
- गोवा और कोंकण क्षेत्र में नरकासुर के विशाल पुतले बनाए जाते हैं। दिवाली से पहले की रात इन पुतलों का दहन किया जाता है। यह आयोजन अत्याचार और अहंकार के अंत का प्रतीक है। दक्षिण भारत में भी लक्ष्मी पूजन और दीप प्रज्वलन होते हैं, लेकिन नरकासुर वध की कथा इस क्षेत्र के दीपोत्सव को विशिष्ट पहचान देती है।
पश्चिम भारत में दिवाली धार्मिक आस्था के साथ व्यापारिक और आर्थिक जीवन से गहराई से जुड़ी है। गुजरात में कार्तिक अमावस्या की शाम चोपड़ा पूजन की परंपरा है। व्यापारी नए बहीखातों की पूजा करते हैं और आगामी वर्ष के कारोबार में उन्नति की कामना करते हैं। इसके अगले दिन गुजराती नववर्ष, जिसे बेस्टु वरस कहा जाता है, मनाया जाता है। लोग मंदिरों में दर्शन करते हैं और परिजनों तथा मित्रों को शुभकामनाएं देते हैं।
महाराष्ट्र की दिवाली
महाराष्ट्र में दिवाली का उत्सव वसुबारस से शुरू होता है, जिसमें गाय और बछड़े की पूजा की जाती है। इसके बाद धनतेरस, नरक चतुर्दशी, लक्ष्मी पूजन, बलिप्रतिपदा और भाई दूज मनाए जाते हैं। बलिप्रतिपदा का संबंध राजा महाबली और भगवान विष्णु के वामन अवतार की कथा से है। पौराणिक मान्यता के अनुसार वामन ने तीन पग भूमि मांगकर महाबली को सुतल लोक का अधिपति बनाया। महाराष्ट्र और कोंकण की परंपराओं में राजा बलि की स्मृति का विशेष स्थान है।
राजस्थान में दिवाली का स्वरूप लक्ष्मी-गणेश पूजन, व्यापारिक बहीखातों के शुभारंभ और पारिवारिक उत्सव से जुड़ा है। विशेषकर मारवाड़ी व्यापारी समुदाय में दिवाली नए लेखा-वर्ष और कारोबारी संकल्पों का अवसर होती है। पश्चिम भारत की इन परंपराओं में धर्म और अर्थ का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
पूर्वी भारत में दिवाली का सबसे विशिष्ट स्वरूप मां काली की पूजा है। पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा में कार्तिक अमावस्या की रात्रि को काली पूजा का आयोजन होता है। जहां देश के अनेक हिस्सों में इस रात मां लक्ष्मी की पूजा प्रमुख होती है, वहीं बंगाल की शाक्त परंपरा में मां काली की आराधना को विशेष महत्व प्राप्त है। मां काली को शक्ति, साहस और दुष्ट प्रवृत्तियों के विनाश की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। काली पूजा के अवसर पर मंदिरों और सार्वजनिक पंडालों में प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। रात्रि में विशेष पूजा, मंत्रोच्चार, आरती और प्रसाद वितरण होता है। कोलकाता सहित बंगाल के अनेक शहरों में यह आयोजन व्यापक जनभागीदारी के साथ होता है।
ओडिशा में कार्तिक अमावस्या की एक अलग परंपरा है। यहां लोग पितरों के स्मरण में कौड़िया काठी जलाते हैं। जूट की छोटी लकड़ियों से बने प्रकाश के माध्यम से पूर्वजों को स्मरण करने और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने की परंपरा निभाई जाती है। इसे स्थानीय धार्मिक मान्यताओं में पितृलोक से जुड़ी स्मृति और श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है। इस तरह पूर्वी भारत में दिवाली शक्ति उपासना के साथ पितृ-स्मरण की परंपरा को भी स्थान देती है।
दीपोत्सव से जुड़ी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं
दिवाली की क्षेत्रीय विविधता को समझते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये अलग-अलग त्योहार नहीं, अपितु एक व्यापक दीपोत्सव से जुड़ी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं हैं। नरकासुर वध की स्मृति मुख्यतः नरक चतुर्दशी से और राजा बलि की कथा बलिप्रतिपदा से जुड़ी है। इसी तरह कार्तिक अमावस्या को जैन समाज भगवान महावीर के निर्वाण का स्मरण करता है, जबकि सिख समाज बंदी छोड़ दिवस मनाता है। ये अपनी स्वतंत्र धार्मिक-ऐतिहासिक पहचान रखने वाली परंपराएं हैं।
भारत की सांस्कृतिक एकता का आधार यह नहीं है कि सभी क्षेत्रों में पूजा का तरीका एक जैसा हो। इसकी वास्तविक शक्ति इस बात में है कि अलग-अलग आस्थाएं और परंपराएं एक व्यापक सांस्कृतिक परिवेश में साथ-साथ विकसित हुई हैं। कहीं राम की मर्यादा का स्मरण है, कहीं कृष्ण की विजय का उत्सव, कहीं लक्ष्मी की आराधना और कहीं शक्ति की उपासना। इन सभी के बीच दीप प्रज्वलित करने का भाव एक साझा प्रतीक बन जाता है।
उपनिषदों की प्रार्थना 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' अर्थात अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलने की कामना, दिवाली के आध्यात्मिक अर्थ को व्यक्त करती है। यह पर्व मनुष्य को केवल घर रोशन करने की नहीं, बल्कि अपने भीतर के अज्ञान, अहंकार और नकारात्मकता को दूर करने की प्रेरणा भी देता है।
दिवाली इसलिए भारतीय संस्कृति का विशिष्ट उत्सव है कि इसमें एक कथा नहीं, अनेक कथाएं हैं, एक पूजा-पद्धति नहीं, अनेक परंपराएं हैं, लेकिन जीवन के प्रति आशा, शुभता और प्रकाश का विश्वास साझा है। चारों दिशाओं की ये विविध परंपराएं मिलकर बताती हैं कि भारत की सांस्कृतिक चेतना एकरूपता से नहीं, अपितु विविधता के सम्मान और सहअस्तित्व से निर्मित हुई है।
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