फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

धीरेंद्र शास्त्री की बंगाल यात्रा: नॉन-वेज से शुरू हुई बड़ी बहस

सार

Dhirendra Shastri Bengal Visit: कोलकाता में धीरेंद्र शास्त्री की नॉन-वेज खानपान को लेकर टिप्पणी ने भोजन की पसंद से कहीं बड़ी बहस को जन्म दिया है। मामला अब बंगाल की संस्कृति, धार्मिक आस्था, सामाजिक विविधता और राजनीतिक पहचान तक पहुंच गया है। बंगाली समाज की प्रतिक्रिया भी एकरंगी नहीं है। कोई इसे धार्मिक दृष्टिकोण से देख रहा है, कोई बंगाली जीवनशैली में दखल के रूप में और कोई इसे आने वाले राजनीतिक संघर्ष का संकेत मान रहा है। असली सवाल यही है-क्या बंगाल की पहचान अब थाली के जरिए तय करने की कोशिश हो रही है?
विज्ञापन
धीरेन्द्र शास्त्री - फोटो : अमर उजाला डिजिटल
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

Non Veg Dispute Bengal: बंगाल में धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की एंट्री सिर्फ एक धार्मिक कथा तक सीमित नहीं है। हनुमंत कथा के मंच से उनकी अपील ने ऐसा सवाल खड़ा कर दिया है, जिसका असर नवरात्रि से कहीं आगे तक जा सकता है। शास्त्री ने बंगाल के हिंदुओं से अपील की कि नवरात्रि में देवी की प्रतिमाओं के आसपास नॉन-वेज की बिक्री नहीं होनी चाहिए।
विज्ञापन


सुनने में यह एक धार्मिक अपील है, लेकिन बंगाल जैसे राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील राज्य में इसके मायने कहीं बड़े हैं।
क्योंकि यहां सवाल सिर्फ मांसाहार का नहीं है। सवाल है-बंगाल की धार्मिक पहचान कौन तय करेगा?

बात नॉन-वेज से शुरू हुई, पहचान तक पहुंच गई

बंगाल में मछली और मांस का भोजन सदियों से सामाजिक जीवन का हिस्सा रहा है। ‘माछ-भात’ को बंगाली पहचान से जोड़कर देखा जाता है। दूसरी तरफ यही बंगाल काली, दुर्गा और शक्ति उपासना की गहरी परंपरा वाला प्रदेश भी है। शाक्त परंपरा में अलग-अलग क्षेत्रों और मंदिरों में अलग-अलग रीति-रिवाज रहे हैं। इसलिए बंगाल को केवल शाकाहारी या केवल मांसाहारी समाज के चश्मे से देखना दोनों ही अतिशयोक्ति होगी।
यहीं से धीरेंद्र शास्त्री की अपील पर बहस शुरू होती है।

बंगाल की पहचान और खानपान का रिश्ता पुराना है। मछली-भात को अक्सर बंगाली संस्कृति का प्रतीक माना जाता है। बंगाली साहित्य, सिनेमा और लोकजीवन में भी भोजन की अपनी खास जगह रही है। लेकिन बंगाल की पूरी सामाजिक तस्वीर को केवल मछली-मांस खाने वाली आबादी के जरिए समझना अधूरा होगा।
विज्ञापन


इसी बंगाल में वैष्णव परंपरा की गहरी जड़ें हैं। बड़ी संख्या में परिवार और समुदाय शाकाहारी भोजन को प्राथमिकता देते हैं। धार्मिक आस्था, परिवार, क्षेत्र और व्यक्तिगत पसंद के आधार पर खानपान बदलता रहा है। इसलिए धीरेंद्र शास्त्री की टिप्पणी ने एक सीधा सवाल खड़ा किया है-क्या भोजन की पसंद किसी समाज की सांस्कृतिक पहचान तय कर सकती है?

बंगाली समाज की प्रतिक्रिया एक जैसी नहीं

इस मुद्दे पर बंगाली समाज को एक ही खांचे में रखकर देखना भी सही नहीं होगा। प्रतिक्रिया के कई स्तर दिखाई दे सकते हैं। एक वर्ग धीरेंद्र शास्त्री की बात को धार्मिक और सांस्कृतिक नजरिए से देखता है। दूसरा वर्ग इसे बंगाल की पारंपरिक खानपान संस्कृति पर टिप्पणी मानता है। वहीं तीसरा वर्ग इसे राजनीतिक बयानबाजी का हिस्सा मानकर देखता है।

यही बंगाल की जटिलता है। यहां किसी व्यक्ति के बंगाली होने का प्रमाण उसकी थाली नहीं है। मछली खाने वाला भी बंगाली है, शाकाहारी भी बंगाली है और अपनी धार्मिक परंपरा के अनुसार भोजन करने वाला व्यक्ति भी उतना ही बंगाली है।इसलिए इस बयान के विरोध या समर्थन में पूरे बंगाली समाज की ओर से बोलने का दावा करना खुद बंगाल की विविधता को सीमित करना होगा।

क्या नॉन-वेज अब राजनीतिक मुद्दा बनेगा?

सवाल यहीं से राजनीतिक होता है। पश्चिम बंगाल की राजनीति में ‘बंगाली अस्मिता’ कोई नया विषय नहीं है। वर्षों से भाषा, संस्कृति, बाहरी-बंगाली की बहस और धार्मिक पहचान चुनावी राजनीति के महत्वपूर्ण मुद्दे रहे हैं। ऐसे माहौल में अगर खानपान को भी सांस्कृतिक पहचान के साथ जोड़ दिया जाए तो उसका राजनीतिक असर होना स्वाभाविक है।

तृणमूल कांग्रेस के लिए यह मुद्दा बंगाली जीवनशैली और सांस्कृतिक स्वायत्तता की रक्षा के रूप में सामने आ सकता है। भाजपा और व्यापक दक्षिणपंथी राजनीति इसे हिंदू धार्मिक-सांस्कृतिक विमर्श के संदर्भ में रखने की कोशिश कर सकती है। यानी सवाल यह नहीं रह जाएगा कि कौन नॉन-वेज खाता है। सवाल यह बनने लगेगा कि बंगाल की संस्कृति की परिभाषा कौन तय करेगा?

बंगाल की थाली में सिर्फ एक स्वाद नहीं

बंगाल को समझने के लिए उसकी थाली को भी उसी तरह देखना होगा, जैसे उसकी भाषा और परंपराओं को। बंगाल में मछली और मांस की परंपरा है, लेकिन साथ ही शाकाहारी भोजन की भी अपनी जगह है। धार्मिक त्योहारों, पारिवारिक संस्कारों और अलग-अलग समुदायों में भोजन की परंपराएं बदलती रहती हैं।

बंगाल की सांस्कृतिक ताकत इसी विविधता में है।समस्या तब पैदा होती है जब किसी एक खानपान को पूरे समाज की पहचान और दूसरे खानपान को उसकी पहचान के विरोध में खड़ा कर दिया जाए। इससे संस्कृति की वास्तविक तस्वीर सामने नहीं आती, बल्कि राजनीतिक ध्रुवीकरण का रास्ता खुलता है।

बयान पर बहस हो, बंगाली समाज पर नहीं

धीरेंद्र शास्त्री की टिप्पणी से असहमति जताना पूरी तरह स्वाभाविक है। उसी तरह कोई व्यक्ति उनकी बात से सहमत हो, यह भी लोकतांत्रिक समाज में उसका अधिकार है। लेकिन बहस का स्तर व्यक्ति की पसंद से उठकर विचार और राजनीति तक जाना चाहिए।

किसी व्यक्ति का नॉन-वेज खाना या न खाना उसकी व्यक्तिगत पसंद हो सकती है। इसी तरह किसी धार्मिक व्यक्ति का भोजन को लेकर अपना दृष्टिकोण रखना भी उसका अधिकार है। लेकिन जब वही बात पूरे समाज की सांस्कृतिक पहचान से जोड़ दी जाती है, तब सवाल ज्यादा गंभीर हो जाता है।

बंगाल के संदर्भ में यह संवेदनशील इसलिए भी है क्योंकि यहां संस्कृति और राजनीति का रिश्ता बेहद गहरा है।

असली लड़ाई ‘कौन क्या खाता है’ की नहीं

दरअसल, यह विवाद भोजन से ज्यादा उस राजनीतिक कथा का हिस्सा बन सकता है जिसमें बंगाल की पहचान को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश हो रही है। एक तरफ बंगाली अस्मिता है, जिसमें भाषा, साहित्य, संगीत, दुर्गापूजा, लोकसंस्कृति और खानपान सब शामिल हैं। दूसरी तरफ धार्मिक पहचान का विमर्श है, जो बंगाल की राजनीति में लगातार ज्यादा मुखर हुआ है।

इन दोनों धाराओं के बीच टकराव बढ़ता है तो छोटी-सी सांस्कृतिक टिप्पणी भी बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकती है। यही कारण है कि धीरेंद्र शास्त्री का बयान केवल एक संत की व्यक्तिगत टिप्पणी मानकर छोड़ देना भी शायद इस बहस के राजनीतिक अर्थ को नजरअंदाज करना होगा।

बंगाल की पहचान थाली से बड़ी है

बंगाल की पहचान किसी एक भोजन, किसी एक समुदाय या किसी एक राजनीतिक विचारधारा में कैद नहीं है। इसकी ताकत उसकी विविधता में है। यहां परंपरा भी है और आधुनिकता भी, धार्मिक आस्था भी है और व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी, मछली-मांस की भोजन संस्कृति भी है और शाकाहारी परंपराएं भी। इसलिए नॉन-वेज के बहाने शुरू हुई बहस को अगर सिर्फ ‘कौन क्या खाता है’ तक सीमित रखा गया तो असली सवाल छूट जाएगा।

असली सवाल यह है कि क्या बंगाल की सांस्कृतिक पहचान को अब भोजन के जरिए राजनीतिक रूप से परिभाषित किया जाएगा?अगर ऐसा हुआ, तो आने वाले समय में यह विवाद सिर्फ खानपान का नहीं रहेगा। यह बंगाली अस्मिता, धार्मिक पहचान और चुनावी राजनीति के बीच एक बड़ी बहस का रूप ले सकता है।

और यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है-बंगाल की थाली में जितनी विविधता है, उसकी राजनीति में भी उतनी ही विविधता है। किसी एक स्वाद को पूरे बंगाल की पहचान बना देना आसान है, लेकिन बंगाल को समझना उतना आसान नहीं।

सवाल है बंगाल की आस्था का

बंगाल की अपनी धार्मिक परंपराएं हैं, अपनी बौद्धिक परंपरा है और अपनी राजनीतिक संवेदनशीलता भी। इसलिए असली परीक्षा नॉन-वेज की नहीं है। असली परीक्षा यह है कि धीरेंद्र शास्त्री बंगाल की आस्था को कितना समझते हैं और बंगाल उनकी आस्था की भाषा को कितना स्वीकार करता है। अगर उनकी बात को धार्मिक अपील तक सीमित रखा गया, तो यह सामान्य सामाजिक बहस बनकर रह सकती है। 

लेकिन अगर यह खान-पान से आगे बढ़कर बंगाल की सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान को प्रभावित करने की कोशिश के रूप में दिखाई देने लगी, तो टकराव तय है। क्योंकि बंगाल में देवी की आराधना भी गहरी है और अपनी जीवनशैली पर गर्व भी। यही कारण है कि धीरेंद्र शास्त्री का ‘नॉन-वेज’ वाला बयान शायद नॉन-वेज का मुद्दा है ही नहीं। यह बंगाल में बदलते सांस्कृतिक विमर्श की पहली घंटी हो सकती है।

-----------------

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें