ग्रामीण इलाकों में कैर भेड़, बकरी, ऊंट आदि पशुओं का भोजन है।
- फोटो : रामावतार सिंह
रेगिस्तान में सरीसृप एवं चूहे आदि काफी तादाद में होने के कारण यहां कई तरह के षिकारी पक्षी भी निवास करते हैं। इन पक्षियों को शिकार करने के लिए ऐसे पेड़ों की जरूरत होती है, जिनकी शाखाओं पर बैठकर वे अपने षिकार पर निगरानी रख सके।
डेजर्ट नेशनल पार्क, जैसलमेर एवं ताल छापर अभयारण्य, चुरू जैसे क्षेत्रों में कैर के पेड़ बहुलता से होने के कारण यहां कई प्रजातियों के बाज़, चील, गिद्ध आदि देखे जा सकते हैं। इसी कारण दुनियाभर के वन्य जीव प्रेमी/पर्यटक इन षिकारी पक्षियों के अवलोकन/अध्ययन के लिए यहां आते हैं। राजस्थान के सूखे एवं रेगिस्तानी क्षेत्रों में कैर भोजन एवं आजीविका का बहुत बड़ा साधन है। विषेशकर गर्मी के मौसम में यहां के लोग कैर के फल एकत्रित करते हैं, अचार बनाने के अतिरिक्त इन्हें सुखाकर रखते हैं, ताकि सब्जियों की उपलब्धता ना होने पर इन्हें पकाकर खाया जा सके। ग्रामीण इलाकों में कैर भेड़, बकरी, ऊंट आदि पशुओं का भोजन है।
किसान लोग कैर की लकड़ी को खेती के औजार बनाने एवं खेतों की फेंसिंग में इस्तेमाल करते हैं। अपनी मजबूती के कारण इसकी लकड़ी ईंधन के रूप में जलाने एवं कोयला बनाने में काम में ली जाती है। कैर की जड़, छाल, फल, पत्तियों आदि का आयुर्वेद एवं यूनानी औषधियों में भी बहुत महत्त्व है।
इन दिनों कैर के पेड़ लाल-गुलाबी फूलों से लदे हुए हैं, इन सूखे क्षेत्रों की शाेभा बढ़ाते हुए ये फूल पक्षियों, तितलियों, मधुमक्खियों, ततैयों सहित कई जीवों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। जल्द ही ये फूल छोटे-छोटे फलों में तब्दील हो जाएंगे और यहां के ग्रामीण लोग छोटे-छोटे समूहों में अपने झोलों में कैर के फल बटोरते हुए दिखाई देंगे। गर्मियां आते ही राजस्थान के कस्बों और बाजारों में भी कैर बिकते हुए दिखेंगे।
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