सरकारी नौकरी केवल वेतन नहीं देती। वह आदमी को कुछ ऐसे अधिकार भी देती है, जिनका जिक्र किसी सेवा नियमावली में नहीं मिलता। इन अधिकारों की खोज कर्मचारी धीरे-धीरे करता है। सहारनपुर के कुछ बिजली कर्मियों ने तो इस अदृश्य संविधान का प्रायोगिक प्रदर्शन कर ही दिया। उन्होंने साबित किया कि सरकारी कटर केवल तार नहीं काटता, कभी-कभी लोकतंत्र की बची-खुची लाज भी काट देता है। उन्होंने यह भी सिद्ध किया कि सत्ता केवल संसद, सचिवालय और मंत्रालयों में नहीं रहती। उसका एक छोटा सा शाखा कार्यालय हर उस आदमी के भीतर खुल जाता है, जिसके पास किसी दूसरे आदमी का काम रोक देने की ताकत होती है। कुर्सी छोटी हो सकती है, अधिकार नहीं।
वैसे यह किसी एक शहर की खबर नहीं है। यह उस व्यवस्था का चरित्र है, जहां अधिकार सरकारी होता है, लेकिन उसका उपयोग धीरे-धीरे निजी हो जाता है। नागरिक इसे दुर्घटना समझता है। विभाग इसे प्रक्रिया कहता है और हमारे यहां प्रक्रिया की उम्र हमेशा नागरिक से लंबी होती है। कुछ दिन बाद सब अपने-अपने काम पर लौट जाएंगे। ठेके पर फिर रोशनी होगी।
विभाग फिर जनता की सेवा करेगा। पुलिस फिर किसी दूसरे सीसीटीवी में सच खोजेगी। नागरिक फिर समय पर बिल भरेंगे और यह मानकर जीते रहेंगे कि इस बार शायद उनका उजाला सुरक्षित रहेगा।
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