दिल्ली फ्लाईओवर की भी राजधानी है। कल एक दोस्त कह रहे थे कि पिछले दो साल में उनके घर से दफ्तर की दूरी तीन किलोमीटर बढ़ गई है। मैंने पूछा, “घर बदला?” बोले, “नहीं।” “दफ्तर बदला?” बोले, “वह भी नहीं।” “फिर दूरी कैसे बढ़ गई?” बोले, “बीच में दो फ्लाईओवर आ गए हैं।”फ्लाईओवर जाम से मुक्ति के लिए बने होंगे। बनने से पहले बताया गया होगा कि इनके बनते ही यातायात फर्राटे भरेगा। हमने ने भी सोचा होगा कि अब सड़क पर खड़े रहने की परंपरा खत्म होगी।
लेकिन फ्लाईओवर तो बन गए। सड़क वहीं रही। गाड़ियां वहीं रहीं। जाम भी वहीं रहा। अब तो कई बार लगता है कि दिल्ली में जाम नहीं लगेगा तो लोगों को लगेगा कि शहर की कोई महत्वपूर्ण परंपरा खतरे में है। दनादन फ्लाईओवर बनने के बाद फर्क सिर्फ इतना आया कि पहले जाम जमीन पर लगता था, अब दो मंजिलों में लगता है। नीचे वाले पूछते हैं-“ऊपर इतना जाम क्यों है?” ऊपर वाले पूछते हैं-“नीचे रास्ता क्यों नहीं खुल रहा?”
राष्ट्रीय चरित्र है भारत में जाम की समस्या
दुनिया ने सचमुच जाम से बचने के लिए फ्लाईओवर बनाया था। लंदन ने बहुत पहले समझ लिया था कि आदमी को नीचे खड़ा रखेंगे तो वह खड़ा ही रहेगा, इसलिए उसे ऊपर से निकाल दो। होलबोर्न वायडक्ट इसका पुराना उदाहरण है। दशकों बाद भारत ने भी यह ज्ञान अपनाया। मुंबई के केम्प्स कॉर्नर पर 1964-65 में देश का पहला फ्लाईओवर बना। तब शायद सबने यही सोचा होगा कि अब जाम इतिहास की वस्तु हो जाएगा।
लेकिन भारत में जाम कोई सड़क की समस्या नहीं है। यह राष्ट्रीय चरित्र है। दिल्ली ने भी फ्लाईओवर बनाकर जाम को खत्म नहीं किया, उसका वास्तु बदल दिया। पहले गाड़ियां एक ही स्तर पर फंसी रहती थीं। अब उन्हें ऊपर-नीचे बांट दिया गया है।
समस्या वही है, दृश्य अधिक आधुनिक हो गया है। ऊपर वाली गाड़ियां सोचती हैं कि नीचे वालों ने जीवन में कोई गलती की है। नीचे वाले सोचते हैं कि ऊपर वाले किसी योजना में शामिल हैं।
फ्लाईओवर के नीचे चायवाला पहले की तरह चाय बेच रहा है। उसने बताया कि फ्लाईओवर बनने से उसका धंधा बढ़ गया है। पहले लोग जाम में फंसे रहते थे और अब भी फंसे रहते हैं। फर्क इतना है कि अब ग्राहक ऊपर-नीचे दोनों तरफ से आते हैं।
मेट्रो आने से समस्या जस की तस
फिर मेट्रो आई। मेट्रो के आते ही दिल्ली को विश्वास हो गया कि अब उसे पैदल चलने की जरूरत नहीं। आदमी नीचे से ऊपर चला गया और शहर ने मान लिया कि समस्या भी उसके साथ ऊपर चली गई है। उद्घाटन हुआ। फूल लगे। फीते कटे। भाषण हुए। बताया गया कि अब सड़कों पर दबाव कम होगा। अगले दिन मेट्रो में पैर रखने की जगह नहीं थी और सड़क पर गाड़ी चलाने की।
दिल्ली ने फिर भी हार नहीं मानी। उसने कहा-“मेट्रो तो आ गई, अब बस लोगों की आदतें बदलनी बाकी हैं।” लोगों ने आदतें बदलीं। घर से निकले तो पहले मेट्रो स्टेशन तक कार से गए। स्टेशन पर कार खड़ी की और मेट्रो में बैठ गए। शहर ने इसे सार्वजनिक परिवहन की सफलता माना। मेट्रो ने आदमी को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाया, लेकिन आदमी को मेट्रो तक पहुंचाने के लिए सड़कें फिर भी जाम रहीं।
तब पता चला कि मेट्रो शहर के भीतर चल रही है, शहर की योजना के भीतर नहीं। मेट्रो स्टेशन के बाहर ई-रिक्शा, ऑटो, बस, कार, बाइक और पैदल आदमी एक ही लोकतांत्रिक कतार में खड़े थे। कोई किसी से कम महत्वपूर्ण नहीं था और कोई किसी के लिए रास्ता छोड़ने को तैयार नहीं था। मेट्रो ऊपर से गुजर रही थी। नीचे दिल्ली अपने पुराने ढंग से चल रही थी।
हमें लगा था मेट्रो आ गई है, इसलिए दिल्ली आधुनिक हो गई है। लेकिन दिल्ली शायद अभी इतनी ही आधुनिक हुई है कि जाम में खड़े होकर मेट्रो को जाते हुए देख सके।
मेट्रो अपने आप में समाधान नहीं है। फ्लाईओवर भी नहीं। सड़क भी नहीं। समस्या तब हल होती है जब शहर इस तरह बनाया जाए कि हर काम के लिए आदमी को एक छोर से दूसरे छोर तक न जाना पड़े। लेकिन यह विचार कठिन है।
फ्लाईओवर बनाना आसान है। उसका उद्घाटन भी हो जाता है। मेट्रो बनाना कठिन है, पर उसका उद्घाटन बहुत अच्छा होता है। मोहल्ले, बाजार, पैदल रास्ते, बसें, साइकिल, पार्किंग, स्कूल और दफ्तर इस तरह व्यवस्थित करना कि आदमी को रोज अनावश्यक यात्रा न करनी पड़े, इसमें उद्घाटन की संभावना कम होती है। इसलिए शहर में कंक्रीट तेजी से बढ़ता है और योजना धीरे-धीरे घटती है।
हमने यातायात को गाड़ियों की समस्या मान लिया है, जबकि वह शहर की बनावट की समस्या भी है। एक दिन फिर फ्लाईओवर बनेगा। फिर कहा जाएगा-“अब जाम नहीं लगेगा।” हम सब तालियां बजाएंगे। कुछ साल बाद उसी फ्लाईओवर के नीचे जाम लगा होगा। तब कोई नया प्रस्ताव आएगा, शायद एक और फ्लाईओवर का। शहर इसी तरह आगे बढ़ता रहेगा। बस यह तय नहीं होगा कि जा कहां रहा है।
कभी-कभी लगता है कि दिल्ली की योजनाओं में जाम के लिए नए पते बनाए जाते हैं। और जिस दोस्त ने कहा कि उसके घर से दफ्तर की दूरी तीन किलोमीटर बढ़ गई है, वह शायद गलत कह रहा था। दूरी बढ़ी नहीं है। दिल्ली ने बस उसके रास्ते में विकास की कुछ सीढ़ियां और जोड़ दी हैं। तमाम प्रगति के बावजूद हमने जाम को खत्म नहीं किया, उसका विस्तार किया है।
अब आदमी नीचे जाम में फंसा है, ऊपर फ्लाईओवर पर भी जाम में फंसा है और मेट्रो में बैठा आदमी दोनों को देखकर सोच रहा है, “आखिर बचा कौन है?
बचा है पैदल चलने वाला आदमी। दिल्ली में पैदल चलने वाला आदमी सबसे अधिक आशावादी प्राणी है। वह फुटपाथ खोजता है। फुटपाथ कहीं पार्किंग में है, कहीं छोले-भटूरे की दुकान में, कहीं निर्माण सामग्री के नीचे तोे कहीं मलबे के ढेर में। और जहां फुटपाथ सचमुच फुटपाथ है, वहां कोई दोपहिया वाहन खड़ा है।
पैदल आदमी सड़क पर उतरता है। सड़क पर गाड़ी वाला उसे देखता है। दोनों एक-दूसरे को रास्ता देने की प्रतीक्षा करते हैं और दिल्ली में रास्ता वही पाता है, जिसके पास रास्ता छीनने का मौलिक आत्मविश्वास हो।
--------------------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।