दीपावली की सफाई का घर-घर में बड़ा महत्व है। यह साल का वह अवसर है, जब घर की उन समस्याओं पर भी ध्यान दिया जाता है, जिन्हें साल भर नजरअंदाज करने के लिए पर्याप्त धूल उपलब्ध रहती है। पत्नी ने सुबह घोषणा की कि इस बार घर की पूरी सफाई होगी। घोषणा में दृढ़ता थी। कार्ययोजना तैयार थी। लक्ष्य स्पष्ट था। केवल यह तय नहीं था कि काम कौन करेगा। यह काम अपने आप तय हो गया। मैं घर में मौजूद था।
घर में सफाई शुरू हो गई । दीपावली की सफाई का अर्थ है कि घर में जो चीजें साल भर अपनी जगह पर पड़ी थीं, वे अचानक गलत जगह पर घोषित कर दी जाती हैं। घर की व्यवस्था में एक क्रांतिकारी परिवर्तन देखने में आता है। जो सामान उपयोगी था, वह अनुपयोगी हो जाता है। जो अनुपयोगी था, वह भावनात्मक हो जाता है और जो आदमी साल भर घर में आराम से बैठा रहता था, वह अचानक सबसे उपयोगी प्राणी साबित हो जाता है।
दीपावली की सफाई के बारे में मेरे गांव के गुजरी गुरु अलग ही राय रखते हैं, "मेरा विचार है कि यह घर को साफ करने की नहीं, पति को व्यस्त रखने की एक प्राचीन भारतीय परंपरा है। इसके आविष्कारक का नाम इतिहास में नहीं मिलता। संभव है, कोई ऐसा पति रहा हो, जिसने दीपावली के आस-पास एक दिन पत्नी से कह दिया हो कि आज मेरे पास कोई काम नहीं है। उसी दिन से दीपावली की सफाई का जन्म हुआ होगा।"
दीपावली की सफाई
दीपावली की सफाई के नाम पर मेरे घर में सबसे पहले स्टोर खोला गया। स्टोर में पिछले कई वर्षों की विकास योजनाएं जमा थीं। टूटी कुर्सी, बंद रेडियो, बेकार तार, पुराने कैलेंडर, खाली डिब्बे और कुछ ऐसी वस्तुएं थीं, जिनके उपयोग की संभावना केवल उस व्यक्ति को दिखाई देती थी, जिसने उन्हें फेंकने से इनकार किया था। वहां इतने सामान थे कि यदि कोई चोर गलती से घुस जाए तो चोरी करने के बजाय रास्ता पूछकर बाहर निकल जाए। लेकिन पत्नी को विश्वास था कि हर चीज उपयोगी है।
मैंने पूछा, "यह सब कबाड़ क्यों रखा है?"
पत्नी ने कहा, "कभी काम आ सकता है।" यह हमारे घर का सबसे सफल सिद्धांत है। जो चीज आज काम नहीं आ रही, वह कल काम आ सकती है। कल कब आएगा, यह तय करना आवश्यक नहीं। इस सिद्धांत के कारण घर में जगह समाप्त हो गई, लेकिन संभावनाएं समाप्त नहीं हुईं।
मैंने एक टूटी कुर्सी बाहर निकालनी चाही। पत्नी ने रोक दिया। "इसे रहने दो। बढ़ई से ठीक करवा लेंगे।" मैंने पूछा, "कब?" उन्होंने कहा, "जब समय मिलेगा।" कुर्सी वापस रख दी गई। काम को भविष्य में भेज देना भी एक प्रकार की कार्यवाही है। इससे वर्तमान में कोई असुविधा नहीं होती और भविष्य के पास शिकायत करने के लिए कोई प्रतिनिधि नहीं होता।
अगली वस्तु एक पुराना रिकाॅर्डर था। वह वर्षों से बंद था। मैंने कहा, "इसे फेंक देते हैं।" पत्नी बोलीं, "यह तुम्हारे पिता जी की निशानी है।"
रिकाॅर्डर बच गया। एक टूटा हुआ फूलदान निकला। वह भी बच गया। एक पुरानी साड़ी निकली। वह भी बच गई। एक डिब्बे में चाबियां मिलीं। किसी को पता नहीं था कि वे किस ताले की हैं। फिर भी उन्हें संभालकर रख लिया गया। सफाई के पहले घंटे में मुझे पता चला कि घर में कचरे की कमी नहीं है, उसे कचरा घोषित करने के लिए साहस की कमी है।
पद, प्रतिष्ठा और पुराने संबंधों का लिंक
हम वस्तुओं से अधिक उनके पद, प्रतिष्ठा और पुराने संबंधों का सम्मान करते हैं। कोई चीज कितनी उपयोगी है, यह बाद का प्रश्न है। पहले यह देखा जाता है कि वह किसकी है, किसने दी थी और उसे हटाने से किसकी भावना आहत हो सकती है। मैंने देखा कि घर में सफाई के नाम पर सामान एक कमरे से दूसरे कमरे में जा रहा था। जो बैठक में बेकार था, वह स्टोर में उपयोगी हो गया। जो स्टोर में बेकार था, वह छत पर सुरक्षित रख दिया गया। मैंने पत्नी से कहा, "हम सफाई कर रहे हैं या सामान का आंतरिक पर्यटन ?" वह बोली, "तुम अपना काम करो।"
मैंने अपना काम किया। दोपहर तक मैं घर के कई ऐसे हिस्सों में पहुंच चुका था, जहां वर्षों से नहीं गया था। वहां धूल थी, जाले थे और कुछ ऐसी चीजें थीं, जिनके बारे में मुझे मालूम नहीं था कि वे हमारे घर में हैं। मुझे लगा कि घर भी एक देश की तरह होता है। उसमें कुछ इलाके ऐसे होते हैं, जहां सरकार का ध्यान वर्षों तक नहीं जाता।
दीपावली की सफाई उन इलाकों में अचानक प्रशासनिक कार्रवाई है। लेकिन कार्रवाई के बाद भी व्यवस्था नहीं बदलती। पंखे तक पहुंचने के लिए टेबल पर चढ़ते समय मुझे अपने जीवन की ऊंचाइयों का अनुभव हुआ। नीचे पत्नी खड़ी थीं और निर्देश दे रही थीं। मैंने सोचा, देश में यदि हर काम का निरीक्षण इतनी तत्परता से हो तो विकास की गति बढ़ सकती है।
घर में कोई चीज बेकार नहीं होती
धीरे-धीरे मुझे समझ में आया कि घर में कोई चीज बेकार नहीं होती। हर चीज का कोई न कोई इतिहास होता है। केवल पति का इतिहास ऐसा होता है, जिसे पत्नी कभी भी वर्तमान में ला सकती है। सफाई के दौरान मुझे एक पुरानी कमीज मिली। मैंने कहा, "इसे फेंक दो।" पत्नी बोली, "यह तो तुम्हारी पसंदीदा कमीज थी।" मैंने कहा, "अब नहीं है।" "लेकिन अच्छी तो है।" मैंने कमीज को देखा। वह मुझसे ज्यादा पुरानी लगी। उसके बटन अलग-अलग रंग के थे। उसकी जेब में एक पुराना मुड़ा-फटा सा ट्रेन टिकट मिला। पत्नी ने टिकट को देखकर कहा, "यह कहां का है?"
मैंने कहा, "याद नहीं।" पत्नी बोली,"तुम्हें कुछ याद नहीं रहता।" मैंने सोचा, अगर आदमी को सब कुछ याद रहे तो घर में रहना मुश्किल हो जाए और आदमी को याददाश्त की समस्या तब तक नहीं होती, जब तक घर में सफाई नहीं होती। सफाई में सबसे ज्यादा परेशानी उस सामान से होती है, जिसका इस्तेमाल नहीं होता। इस्तेमाल होने वाली चीजें तो अपनी उपयोगिता साबित कर देती हैं। लेकिन बेकार चीजें भावनात्मक तर्क प्रस्तुत करती हैं।
पुराना रिकाॅर्डर कहता है, मैं तुम्हारे पिता की निशानी हूं। टूटा हुआ खिलौना कहता है, मैं तुम्हारे बच्चे का बचपन हूं। पुरानी साड़ी कहती है, मैं तुम्हारी शादी की याद हूं।
सफाई के दौरान घर का एक कमरा कचरे का अस्थायी गोदाम बन जाता है। जो सामान बाहर निकालना है, वह पहले दूसरे कमरे में रखा जाता है। फिर तय होता है कि इसे बाद में देखा जाएगा। बाद में देखने का अर्थ है कि अगले साल दीपावली तक इसे सुरक्षित रखा जाएगा। हमारे घर में सफाई का यह चक्र वर्षों से चल रहा है। हर साल कुछ सामान बाहर निकलता है, कुछ वापस अंदर चला जाता है। घर साफ होने के बजाय सामान की जगह बदल जाती है।
दीपावली की सफाई का एक सामाजिक पक्ष भी है। मां लक्ष्मी के स्वागत की तैयारी में आदमी पड़ोसी से आगे निकलने की कोशिश करता है। अंत में घर साफ हो जाता है। दीवारें चमकती हैं। फर्श पर रोशनी पड़ती है। पुराने सामान को नए ढंग से जमा दिया जाता है। पत्नी संतुष्ट होती है।
घर में दीपावली का वातावरण बन जाता है। पति थका हुआ एक कोने में बैठता है। पत्नी कहती है, "अब घर कितना अच्छा लग रहा है!" पति घर को देखता है। सचमुच अच्छा लग रहा है। फिर अपने हाथों को देखता है। वे भी सफाई के बाद किसी पुराने सामान की तरह लगने लगते हैं। पति पूछता है, "अब कुछ बाकी तो नहीं?" पत्नी कहती है, "नहीं, बस कल जरा छत साफ कर देंगे।" पति चुप हो जाता है।
दीपावली पर घर की सफाई इसलिए की जाती है कि लक्ष्मी जी आएं। लेकिन इस सफाई का सबसे बड़ा साइड इफेक्ट यह है कि लक्ष्मी के आने से पहले ही घर का आदमी अपनी सारी पूंजी, ऊर्जा, धैर्य और आत्मसम्मान घिस चुका होता है। घर की सफाई में पति का अनुभव भले ही सीमित हो, लेकिन दीपावली आते-आते वह इतना जरूर जान जाता है कि हर साल सफाई होती है और हर साल कचरा निकलता है। वह यह भी जान जाता कि कुछ कचरे इतने उपयोगी होते हैं कि उन्हें हटाया नहीं जा सकता। उन्हें बचाए रखने के लिए ही सफाई की जरूरत पड़ती है।
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