इन दिनों चंदा बहुत चर्चा में है। चंदा वैसे बड़ा सुंदर शब्द है। एक चंदा आसमान में होता है और दूसरा जमीन पर। आसमान वाला चंदा में चांदनी की ठंडक है और जमीन वाले चंदे में पैसे की गर्मी। आसमान वाला चंदा किसी से कुछ मांगता नहीं। वह चुपचाप निकलता है, अपनी रोशनी करता है और चला जाता है। कवि उसे देखकर कविता लिखते हैं और बच्चे उसे देखकर दूध-भात खाते हैं। लेकिन जमीन वाला चंदा बड़ा कर्मठ है। वह मौसम-बेमौसम आ पहुंचता है।
“हर आदमी चंदा नहीं ले सकता। सबसे महत्वपूर्ण है, रकम बताने की कला। इतनी कम बताओ कि सामने वाला खुद कहे कि और कुछ रख लीजिए। यही असली सफलता है। पहुंचे हुए चंदा कर्ता कभी रकम नहीं बताते। वे सामने वाले की सामाजिक प्रतिष्ठा को धीरे-से याद दिलाते हैं, जैसे कि आप जैसे लोगों के सहयोग से ही तो यह काम चलता है। इस तरह के वाक्य सुनते ही आदमी अपनी जेब नहीं, अपना कद देखने लगता है और कद के हिसाब से चंदा निकाल देता है। असली कलाकार वही है, जो दो हजार मांगकर पांच हजार की रसीद कटवा दे और जाते-जाते दाता को यह विश्वास भी दिला दे कि उसने सिर्फ पांच हजार नहीं दिए, समाज की इज्जत बचाई है। सामने वाला समझ जाता है कि आयोजन ऐतिहासिक होने वाला है और इतिहास में उसका पैसा भी दर्ज होने वाला है।”
चंदे में सबसे बड़ी बात यह है कि यह कभी अपने को चंदा नहीं कहता। वह सहयोग है, योगदान है, समर्पण है, सहभागिता है, जनभागीदारी है। पैसा वही है, लेकिन उसके नाम बदलते रहते हैं। लेकिन गुजरी गुरु हिदायत भी देते हैं कि चंदे की अपनी नैतिकता होती है, “जिससे चंदा लो, उससे कहो कि यह आपके ही कार्यक्रम के लिए है।”
यह हमारे देश की सबसे सफल आर्थिक व्यवस्था है। इसमें कोई असफल नहीं होता। इसका एक बड़ा फॉर्मूला भी है- “कोई बात नहीं, जितना बन पड़े।” यह ‘जितना बन पड़े’ भी बड़ा रहस्यमयी वाक्य है। इसमें पांच रुपये से लेकर पांच लाख तक की संभावनाएं छिपी रहती हैं। एक समय था, चंदा लेने वाले रसीद बुक लेकर आते थे। अब उनके पास मोबाइल है और वे कहते हैं, “क्यूआर कोड स्कैन कर लीजिए।”
डिजिटल श्रद्धा का दौर
श्रद्धा अब डिजिटल हो गई है। रसीद की जगह अब मैसेज आता है, “आपका ट्रांजेक्शन सफल रहा।” चंदा देने वाले को पहली बार मालूम पड़ता है कि वह भी सफल हो गया है। चंदे की एक बड़ी उपलब्धि यह भी है कि इसने सामाजिक संबंधों को भी मजबूत किया है। आपके मोहल्ले में जो आदमी पिछले एक साल से आपको नमस्ते नहीं करता था, वह चंदे के मौसम में आपके घर का रास्ता खोज लेता है, “पहचाना नहीं?”
आप पहचान जाते हैं, “अरे, आप!” वह मुस्कुराता है। आप भी मुस्कुराते हैं। फिर वह अपने मोबाइल में क्यूआर कोड निकालता है। आपकी श्रद्धा स्कैन हो जाती है। आपकी मुस्कान थोड़ी कम हो जाती है। उसकी मुस्कान थोड़ी बढ़ जाती है। यहीं से समाज चलता है।
चंदे ने हमें एक और चीज सिखाई है कि किसी काम को महान सिद्ध करने के लिए उसके खर्च को बड़ा करना जरूरी है। बड़ा कार्यक्रम है तो पांच लाख रुपये। ऐतिहासिक कार्यक्रम है तो दस लाख रुपये और अगर कार्यक्रम बहुत ही ऐतिहासिक है तो खर्च का हिसाब पूछना इतिहास में दखल माना जा सकता है। इसलिए हिसाब मत पूछिए, विश्वास रखिए।
चंदा विश्वास पर चलता है और जहां विश्वास होता है, वहां हिसाब अपने आप छोटा हो जाता है। चंदा हमारे समाज की उन संस्थाओं में है, जिनकी उपयोगिता पर कोई सवाल नहीं उठाता, क्योंकि सवाल उठाने वाले से अगली बार चंदा मांगा जा सकता है। वैसे चंदा लेने वालों की भी अपनी राजनीति होती है। किसके घर पहले जाना है, किसके यहां कितनी रकम मांगी जा सकती है, किससे पुराना हिसाब है और किससे भविष्य में काम पड़ सकता है, चंदे की सफलता के लिए इन सबका हिसाब अधिक महत्वपूर्ण होता है।
चंदे का एक और लाभ है। इससे स्थानीय नेतृत्व की पहचान होती है। जिसने सबसे अधिक चंदा दिया, उसे मंच पर आगे की कुर्सी मिलती है। जिसने उससे थोड़ा कम दिया, उसे पीछे की कुर्सी। जिसने कुछ नहीं दिया, वह कार्यक्रम में भीड़ के साथ खड़ा रहता है।
इस व्यवस्था को लोकतंत्र कहा जा सकता है, इसलिए चंदा केवल किसी आयोजन का आर्थिक साधन नहीं, सामाजिक जीवन का एक महत्वपूर्ण बहाना भी है। चंदा देने वाले और लेने वाले के बीच एक मौन समझौता रहता है। देने वाला जानता है कि उसकी रकम पूरी तरह उसी काम में नहीं जाएगी, जिसके नाम पर ली गई है। लेने वाला जानता है कि देने वाला यह जानता है। फिर भी दोनों इस ज्ञान को सार्वजनिक नहीं करते। यही सभ्यता है।
मेरे गांव में तो इसे परंपरा कहते हैं। इस परंपरा के चमकीले नक्षत्र गुजरी गुरु नए चंदा जीवियों को एक सीख भी देते हैं, “आकस्मिक व्यय के लिए एक अलग खाता बनाकर हमेशा जगह-जगह इस बात को दोहराना होता है कि पाई-पाई का हिसाब रखा जा रहा है। बस हिसाब देखने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।”
और जिसने इस हिसाब को साध लिया, वह चंदा कला का सफल कलाकार है। गुजरी गुरु याद दिलाते हैं कि चंदा मांगना केवल पैसे मांगना नहीं है। यह आदमी के भीतर छिपे अपराधबोध, सामाजिक प्रतिष्ठा और दिखावे को एक साथ जगाने की कला है, “जिस दिन आप किसी कंजूस से चंदा लेकर लौट आएं और वह आपको धन्यवाद दे, समझिए आपने चंदा मांगना सीख लिया है और जिस दिन वही कंजूस अगली बार आपको दूर से देखकर रास्ता बदल ले, समझिए कि आप इस कला में निपुण हो चुके हैं।
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