भारतीय स्कूलों का छात्र छठी-सातवीं क्लास में ही नाक की महत्ता से परिचित हो जाता है। शरीर का चाहे कोई भी अंग, भंग हो जाए, नाक नहीं कटनी चाहिए। नाक सिर्फ एक अंग नहीं, बल्कि हमारे समाज का सबसे संवेदनशील प्राण-वायु संस्थान है। चेहरे पर आंख-कान भी हैं, पर किसी ने आज तक 'कान कटने' या 'आंख कटने' की चिंता में रातों की नींद नहीं उड़ाई।
समाज में सिर ऊंचा रहे न रहे, पर नाक ऊंची रहनी चाहिए। नाक के दुश्मन हजार हैं। दूसरों की नाक का नाप-जोख रखने वालों की संख्या इतनी बढ़ गई है कि अब आम आदमी अपनी नाक की हिफाजत के लिए रुमाल नहीं, ढाल ढूंढ रहा है। ऐसे माहौल में अपनी नाक बचाना कोई मामूली बात नहीं, एक राष्ट्रीय कर्तव्य है और इज्जत की पूरी व्यवस्था नाक के भरोसे चलती है।
अब भारतीय रेल ने इस पुरानी व्यवस्था को एक नया आयाम दिया है। नाक, जो अब तक मुहावरे में कटती थी, इस बार सचमुच कट गई। वह भी फर्स्ट एसी के कोच में।
चूहे का समानता सिद्धांत
चंडीगढ़ से इंदौर जा रहे 78 वर्षीय रिटायर्ड अधिकारी फर्स्ट एसी में सो रहे थे। रात करीब साढ़े दस बजे एक चूहा आया और उनकी नाक काटकर भाग गया। यात्री की आंख दर्द से खुली तो सामने भारतीय रेल की वह व्यवस्था दिखी, जिसमें यात्री को सोने के लिए बर्थ मिलती है और चूहे को काटने के लिए नाक। आम तौर पर फर्स्ट एसी का नाम सुनते ही मन में एक सभ्य संसार बनता है।
साफ पर्दे, सफेद चादर, मुलायम सा तकिया और एक अघोषित भरोसा कि रात में शांति रहेगी। लेकिन चूहे के लिए तो क्या स्लीपर और क्या फर्स्ट एसी? वह तो सबको समभाव से देखता है। ऐसा नहीं है कि उसने सोचा होगा, फर्स्ट एसी में नाक शायद थोड़ी बेहतर गुणवत्ता की मिलेगी, इसलिए वह फर्स्ट एसी में आ गया। उसने जिंदगी का सबसे सरल सिद्धांत अपनाया, ‘इस असार संसार में सब बराबर हैं।’
हालांकि इस मामले में परिवार ने ट्रेन में चूहा घूमने की शिकायत पहले कर दी थी। गंदगी की भी शिकायत हुई थी। गंदगी निर्जीव थी, इसलिए पकड़ी गई और सफाई कर्मी झाड़ू लेकर समस्या तक पहुंच गए, लेकिन दूसरी समस्या अपने पैरों पर चल रही थी, अत: वह उनसे दो कदम आगे निकल गई। अंततः रेलवे ने चूहे को पकड़ने के बजाय उसे स्वतंत्र नागरिक की तरह विचरण करने का अधिकार दे दिया।
चूहा भी शायद समझ गया होगा कि शिकायत का अर्थ कार्रवाई नहीं, केवल सूचना है। कार्रवाई कब होती है, यह देखने के लिए चूहे के पास पर्याप्त समय था। उसने उस समय का सदुपयोग किया। बाहर निकला और सीधे यात्री की नाक पर जा पहुंचा। लेकिन चूहे को क्या मालूम था कि वह किसी की सांस की नली नहीं, भारतीय समाज का कुल-गौरव कुतर रहा है और मामला सीधे हिंदी साहित्य के मुहावरे में दर्ज हो गया- 'नाक कट गई!'
एक नाक रेलवे की भी
इस पूरी घटना में सबसे बड़ी बात यह है कि नाक खबर बनाती है। अब वह चूहा कोई साधारण चूहा नहीं रह गया। पहले लोग अक्सर कहते थे, “रेलवे की नाक कट गई।” जवाब में रेलवे भी अक्सर कहता था, “नहीं, व्यवस्था ठीक है।” लेकिन इस बार रेलवे के पास कहने को भी बहुत कुछ नहीं है, क्योंकि यात्री की नाक सचमुच कुतर गई और रेलवे की नाक मुहावरे में कट गई।
अब रेलवे के सामने दो नाक हैं- एक यात्री की और दूसरी खुद उसकी अपनी। यात्री की नाक पर पट्टी बंध सकती है, इंजेक्शन लग सकता है। रेलवे की नाक पर क्या लगेगा, यह एक घनघोर किस्म का प्रश्न है।
रेलवे के क्रिया और कर्मों के जानकार कहते हैं कि रेलवे को अपनी नाक बचाने के लिए एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करनी चाहिए, जिसमें कहा जा सकता है कि “घटना दुर्भाग्यपूर्ण है। जांच के आदेश दिए गए हैं। पेस्ट कंट्रोल बढ़ाया जाएगा। सफाई व्यवस्था की समीक्षा हो रही है। संबंधित अधिकारियों से रिपोर्ट मांगी जा रही है।”
रेलवे अब बिल्ली पाले
और चूहा? अगर उसके खिलाफ कार्रवाई करनी हो तो क्या कार्रवाई करेगा रेलवे। मेरे गांव के गुजरी गुरु ऐसे गरिष्ठ मामलों में बड़े कल्पनाशील हो जाते हैं। उनका सुझाव है कि रेलवे चाहे तो हर कोच में एक बिल्ली रखे। वह चाहे तो बिल्लियों की भी स्थायी या फिर संविदा पर नियुक्ति कर सकती है। फिर वह विशेषज्ञ की हैसियत से बोले, “बिल्लियों को ट्रेंड करने के लिए एक विभाग बने। ट्रेंड बिल्लियों की ड्यूटी रात में लगाई जाए। यदि चूहा दिखाई दे तो वह उसे दौड़ाए और दबोच ले। न दिखाई दे तो सो जाए। दोनों ही काम रेलवे की परंपरा के अनुकूल रहेंगे।”
यदि दिखाई दे तो...। यह ‘यदि’ हमारी व्यवस्था का बहुत उपयोगी शब्द है। मल्टीविटामिन गोली की तरह इसका इस्तेमाल कोई भी कहीं भी कर सकता है। चूहा बिल्लियों द्वारा दबोचा गया तो यह रेलवे की अपार सफलता मानी जा सकती है और अगर चूहा गच्चा दे गया तो यह उसकी चालाकी। दोनों ही परिस्थितियों में रेलवे अपनी जगह सुरक्षित। यहां यात्री की स्थिति थोड़ी कठिन है। उसे अस्पताल जाना है, इंजेक्शन लगवाना है और अपनी नाक लेकर घर लौटना है।
ऐसे मामलों में व्यवस्था में शिकायत दर्ज होगी- “यात्री को चूहे ने काटा।” यह नहीं लिखा जाएगा कि चूहे ने नाक काटी।
रेल व्यवस्था में आदमी पहले यात्री होता है और फिर शिकायतकर्ता। नाक इन दोनों के बीच कहीं नहीं आती। लेकिन इस डिजीटल युग में भी हमारे समाज में नाक निजी संपत्ति कम और सामाजिक संपत्ति ज्यादा है। आदमी अपनी नाक की चिंता करता है और समाज उसकी नाक काटने में लगा रहता है। शादी में, नौकरी में, राजनीति में और रिश्तेदारी में, हर जगह नाक पर संकट है।
अब रेल में भी नाक को सुरक्षित रखना बड़ी बात हो गई है। और चूहा इस संकट में सबसे बड़ी चुनौती है। उसने 78 साल के एक यात्री की नाक पर हमला करके बता दिया कि भारतीय रेल में सुरक्षा की कोई श्रेणी नहीं होती।
सोते समय नाक सुरक्षित रखें!
अब रेलवे चाहे तो इस घटना से बहुत कुछ सीख सकता है। फर्स्ट एसी के टिकट के साथ एक नाक-रक्षक दिया जा सकता है। बर्थ के बगल में जहां नंबर लिखा रहता है, वहां पर एक छोटा-सा बोर्ड लगाया जा सकता है- ‘यात्री कृपया सोते समय नाक सुरक्षित रखें।’ इस पूरे मामले में गुजरी गुरु की एक और सलाह सामने आई है।
वह कहते हैं, “अगर रेलवे को बिल्ली वाला मामला न जमे तो वह चूहे को भी टिकट देना शुरू कर दे। कम से कम पता तो रहे कि वह किस कोच में यात्रा कर रहा है।” चूहे, बिल्ली और रेलवे के इस त्रिकोण खेल में गुजरी गुरु को मजा आने लगा है, लेकिन वे लोग इसे बेहद गंभीर मामला मान रहे हैं, जिन्हें हाल ही में ट्रेन से यात्रा करनी है। 'चूहे सामान काट रहे हैं' की शिकायत अब विकास करके 'चूहे यात्री की नाक पर दांत गड़ा रहे हैं' पर शिफ्ट हो गई है।
शिकायत की संख्या अगर बढ़ी तो हो सकता है, इस पर रेलवे अपना ऐतिहासिक स्पष्टीकरण जारी कर दे- “यात्री की नाक की सुरक्षा हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है, बशर्ते यात्री अपनी नाक सीमा में रखे!”
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