आख़िरी दौर में आक्रामक नकारात्मक अभियान ने पार्टी के परंपरागत वोटों में भी सेंध लगा दी।
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पार्टी के लिए पांच-छह फ़ीसदी मत बढ़ाने की चुनौती थी। इसके लिए उसने सारे घोड़े खोल दिए। सांप्रदायिक विभाजन की चालें चली गईं। पाकिस्तान का क़ीमा-भुरता बना दिया गया। खुल्लमखुल्ला बलात्कार और मारकाट के हिंसक और घिनौने बयान दिए गए। हनुमानजी को शतरंजी बिसात का मोहरा बना दिया गया। किसी भी ज़िम्मेदार लोकतंत्र (स्वस्थ्य तो अब रहा नहीं ) में कोई सियासी दल इससे नीचे क्या गिरता?
देश की राजधानी में संभव है कुछ लोग पढ़े लिखे न हों और भावुक होकर वोट का निर्णय करते हों लेकिन अधिकतर तोअपने मत का इस्तेमाल विवेक से ही करते हैं। आख़िरी दौर में आक्रामक नकारात्मक अभियान ने पार्टी के परंपरागत वोटों में भी सेंध लगा दी।
मुद्दों को लेकर भी बीजेपी अनेक चुनावों से भ्रम में है। वह प्रादेशिक चुनाव में भी राज्य के हितों पर बात नहीं करती। राष्ट्रीय मसले इन निर्वाचनों में काम नहीं आते। यह उसे समझना होगा। एक के बाद एक प्रदेशों में लगातार हार का यह बड़ा कारण है। दूसरी वजह पार्टी नेताओं का अहंकार और बड़बोलापन है। बेशर्म बयानों ने बीजेपी नेताओं के अपने घरों में ही उनका मख़ौल बना दिया था।
तीसरा पार्टी में दिल्ली का कोई दमदार चेहरा नहीं होना था। इस बार अरुण जेटली और सुषमा स्वराज भी नहीं थे। इस ऐतिहासिक शहर की अस्मिता के लिए कौन बात करता? हर्षवर्धन और किरण बेदी को मुख्यमंत्री के तौर पर पिछले दो चुनावों में मतदाता नक़ार चुके हैं। बाहरी प्रदेशों से आए नेता संसद के चुनाव में तो यहां चल जाते हैं,लेकिन दिल्ली प्रदेश में उन पर यक़ीन कम होता है।
पार्टी की दूसरी पंक्ति के नेताओं को मोदी-शाह के बिना चुनाव लड़ना और जीतना सीखना होगा। सिर्फ़ दो चेहरों पर निर्भरता विश्व के सबसे बड़े दल के लिए सेहतमंद नहीं है। बेचारे नए नवेले राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के लिए तो यह चुनाव सिर मुंडाते ही ओले पड़े जैसे हैं।
मुद्दों को लेकर भी बीजेपी अनेक चुनावों से भ्रम में है। वह प्रादेशिक चुनाव में भी राज्य के हितों पर बात नहीं करती।
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आम आदमी पार्टी ने सरकार बनाने की हैट्रिक लगाईं है। अरविन्द केजरीवाल ने शुरू के ढाई साल तक जिस मसखरे-अंदाज़ में दिल्ली -दरबार संचालित किया,उसने इस जुगनू जैसे दल के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए थे। मगर पिछले दो साल में केजरीवाल ने अपने आप को जिस तरह बदला,वह क़ाबिले तारीफ़ है।
दरअसल, उन्होंने सकारात्मक राजनीति की। इसका फ़ायदा उन्हें मिला। उम्मीद की जानी चाहिए कि अरविन्द की परिपक्वता उन्हें भविष्य में प्रतिपक्ष के चेहरे का संकट दूर करने में सहायता करेगी। उनके दल की जीत का यह अर्थ नहीं है कि वे अपने पंख अब राष्ट्रीय स्तर पर फैला सकते हैं। उस नज़रिए से उन्हें संगठन और अपने आप में बहुत सुधार की ज़रूरत है।
कांग्रेस इससे बेहतर कुछ नहीं कर सकती थी। पार्टी ने देख लिया था कि जिस तरह उत्तरप्रदेश में उसका जनाधार समाजवादी और बहुजन समाज पार्टी ने चुरा लिया था, वही काम केजरीवाल ने दिल्ली में किया था। शीला दीक्षित जैसा सितारा चेहरा भी अब कांग्रेस के पास नही रहा। दुर्बल होती एक वयोवृद्ध राष्ट्रीय पार्टी के लिए बीजेपी को सत्ता से बाहर रखना ज़रूरी था तो उसे मुल्क़ की राजधानी का चुनाव इस मज़ाकिया अंदाज़ में ही लड़ना था।
देखा जाए तो अगर उसने पूरी ताक़त से यह लड़ाई लड़ी होती तो अपना और आम आदमी पार्टी दोनों का नुक़सान कर बैठती। बीजेपी इसका लाभ उठाती, इसलिए कांग्रेस को अब अगले पांच साल अपना दिल्ली का घर ठीक करने में लगाने चाहिए। इस पुराने दल की गतिविधियां देखकर कभी कभी लगता है कि यह रोडवेज की बस जैसी हो गई है , जिसमें हॉर्न के अलावा सब कुछ बजता है ।
बहरहाल ! दिल्ली चुनाव अपने कलंकित अभियान के कारण भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में लंबे समय तक याद रहेंगे।
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