दिल्ली विधानसभा चुनाव की रूपरेखा
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रायशुमारी: एक सुअवसर
फिलहाल, चर्चा करें कि दिल्ली के इस चुनाव में पार्टी घोषणापत्र बनाने में एक बार फिर से जनता की राय मांगी गई। हमें इस रायशुमारी को एक सुअवसर मानना चाहिए; पार्टी घोषणापत्र से लोक घोषणापत्र की ओर बढ़ने की एक छोटी सी खिड़की मान स्वागत् करना चाहिए। इसमें खुद पहल कर पार्टियों और अपने विधानसभा क्षेत्र के उम्मीदवार तक अपनी राय पहुंचानी चाहिए थी।
नीतिगत् हो राज्यस्तरीय घोषणापत्र
मेरी राय यह है कि विधानसभा का चुनाव है; अतः विधायी कार्य संबंधी राज्य के स्तर पर 'दिल्ली नीति घोषणापत्र' बनना चाहिए था। 70 विधानसभाओं की विकास संबंधी इलाकाई ज़रूरतों और परिस्थितियां विविध हैं। जाहिर है कि प्रत्येक विधानसभा का विकास संबंधी रोड मैप भी अलग-अलग ही होना चाहिए। अतः अब उम्मीदवारों को चाहिए कि वे मोहल्ला निवासी समितियों का आह्वान करें; अपने प्रचार का पहला सप्ताह विधानसभा स्तरीय घोषणापत्र बनवाने और उसके प्रति अपना संकल्प बताने में लगाएं।
व्यवहार मांगे ढांचागत् प्रावधान
इन घोषणापत्रों को ज़मीन पर उतारने के लिए नीतिगत् आवश्यकता होगी कि दिल्ली नियोजन क्रियान्वयन एवम् निगरानी समिति का गठन हो। इसके तहत् केन्द्र, राज्य, स्थानीय नगर व गांव अर्थात् चार स्तरीय उपसमितियां हों। चार स्तरीय समितियों में आपसी तालमेल व पारदर्शिता की सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था बने। चुनाव बाद के पांच साल के दौरान विकास संबंधी घोषणापत्र को पूरा करने में लोग सहयोगी भी बने और विधायक द्वारा असहयोग करने पर बाध्य करने वाले भी; इसके लिए जन-निगरानी प्रणाली विकसित की जाए।
लोक-प्रतिनिधियों के बजट से क्रियान्वित होने वाले कार्यों का लोक अंकेक्षण यानी 'पब्लिक-ऑडिट' अनिवार्य हो। ऑडिट सिर्फ वित्तीय नहीं, कैग के नए विविध सूचकांकों के आधार पर हो। ऐसे प्रावधानों को विधिसम्मत् बनाने के लिए पार्टियां, इन्हे विधान का हिस्सा बनाने की घोषणा करें। लाभ यह होगा कि पांच साल पूरे होने पर लोक-अंकेक्षण समूह की रिपोर्ट खुद-ब-खुद इस बात का आइना होगी कि निवर्तमान प्रत्याशी उसमें अपना चेहरा देख सके; जान सके कि वह अगली बार चुनाव लड़ने लायक है या नहीं। इस आधार पर पर्टियां अपना उम्मीदवार तय कर सकेंगी और लोग भी कि उस प्रतिनिधि को अगली बार चुना जाण् या दरकिनार कर दिया जाए। पांच सालों का लेखा-जोखा, अगले पंचवर्षीय कार्यों का नियोजन व तद्नुसार लोक-घोषणापत्र निर्माण में भी बराबर का मददगार सिद्ध होगा।
भाजपा कांग्रेस और आप के समर्थक
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दिल्ली देहात को दें पंचायतीराज
इसी दिशा में एक अन्य महत्वपूर्ण नीतिगत् तथ्य यह है कि भारत के सभी राज्यों में गांवों में संवैधानिक स्तर पर गठित ग्राम सभा व ग्राम पंचायतें हैं; विधानसभा के साथ केन्द्र शसित क्षेत्र वाली दिल्ली की तर्ज में नवगठित राज्य जम्मू-कश्मीर में भी। कई राज्यों में न्याय पंचायतें भी हैं। दिल्ली के गांवों के पास क्या है? नए राजस्व रिकॉर्ड के मुताबिक, दिल्ली में 357 गांव हैं। क्या स्वराज का सपना दिखाने वालों को दिल्ली में ग्राम स्वराज का सर्वश्रेष्ठ ढांचा बनाने की पहल नहीं करनी चाहिए ? उन्हे चाहिए कि दिल्ली पंचायतीराज अधिनियम बनाने को पार्टी घोषणापत्र में शामिल कर इस सपने की नींव रखें।
दलीय राजनीति से मुक्त हों 'सेल्फ गवर्नमेन्ट'
गांव-नगर के स्तर पर तीसरे स्तर की सरकारों का संवैधानिक प्रावधान है। संविधान ने इन्हे 'सेल्फ गवर्नमेन्ट' यानी 'अपनी सरकार' कहा है। ये 'अपनी सरकारें' गांव-गली दलीय राजनीति का अड्डे न बनने पाएं; इसके लिए पंचायत ही नहीं, नगर निगम समेत सभी स्थानीय स्वशासन इकाइयों को दलीय राजनीति के लिए प्रतिबंधित कर देना चाहिए। सुनिश्चित करना चाहिए कि पंचायतों में ग्रामसभा और नगर-निगमों में वॉर्ड की कॉलोनियों की निवासी समितियों द्वारा सामूहिक रूप से तय अधिकतम तीन उम्मीदवारों में से ही चुनाव का प्रावधान हो।
चार चुनौतियां : समाधान ज़रूरी
शुद्ध हवा, स्वच्छ पानी-पर्याप्त पानी, स्थानीय कचरा प्रबंधन और सर्व सुलभ पार्किंग-दिल्ली की चार बड़ी चुनौतियां हैं। दिल्ली के चारदीवारी वाले हर संस्थान, हर कार्यालयी-व्यावसायिक परिसर, हर हाउसिंग सोसाइटी परिसर को उसके परिसर के भीतर ही इन चारों की स्वावलम्बी व्यवस्था के लिए बाध्य व प्रोत्साहित...दोनो करने की नीतिगत् घोषणा करनी चाहिए। ऐसे परिसरों का सीवेज निष्पादन भी परिसर के भीतर संभव है और यमुना प्रदूषण मुक्ति के लिए ज़रूरी भी।
स्वावलम्बी जल प्रबंधन और धूल-धुआं प्रबंधन करना ही चाहिए। वाटर रिजर्व, ग्रीन रिजर्व व वेस्ट रिजर्व एरिया नीति इसमें मदद कर सकती है। जैम फ्री ट्रैफिक और भाडे़ की मनमानी से मुक्त ऑटो चालक भी दिल्ली की आवश्यकता है। फैक्टरी-दफ्तरों-बाज़ारों के समय में अनुकूल बदलाव तथा ऐसी नियुक्ति नीति, जिसमें लोगों को अपने आवास से कम से कम दूरी तक सफर करना पडे़; पर्यावरण बेहतरी के लिए ज़रूरी है। ऊपर मकान-नीचे दुकान तर्ज पर स्थानीय कारीगर परिसर, रेहड़ी-पटरी की जगह सुव्यवस्थित बहुमंजिली फल-सब्जी-फुटकर कॉम्पलेक्स इसमें योगदान ही करेंगे।
बच्चों का विकास उनकी प्रतिभा के आधार पर हो।
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नंबर दौड़ की जगह, प्रतिभा विकास
ज़रूरत है कि नंबर दौड़ में लगाने की बजाय, स्कूली शिक्षा को प्रत्येक विद्यार्थी में पहले से मौजूद प्रतिभा के विकास पर केन्द्रित किया जाए। उनमें उनके आसपास के परिसरों के प्रति सकारात्मक सरोकार व संवेदना विकसित की जाए। जिस 'एजुकेयरे' शब्द से 'एजुकेशन' विकसित हुआ है, उसका यही मतलब है। अतः आठवीं कक्षा के बाद प्रतिभानुसार अवसर देने के लिए मात्र खेल नहीं, नृत्य-संगीत-शिल्प आदि विषयक श्रेष्ठ विशेषज्ञ स्कूलों की स्थापना की जाए।
कैरियर भटकाव की जगह, सुनिश्चितता
उच्च शिक्षा और फिर कोचिंग के लम्बे दुष्चक्र में फंस चुकी नई पीढ़ी को बचाने के लिए एनडीए, रेलवे अप्रेन्टिस की तर्ज पर पहल ज़रूरी है। कम से कम दिल्ली सरकार की हर छोटी-बड़ी नौकरी के लिए तो 10वीं-12वीं की न्यूनतम शैक्षिक योग्यता तथा चयन पश्चात् पद की ज़रूरत के अनुसार एक से तीन साल का शिक्षण-प्रशिक्षण का प्रावधान किया जा सकता है। पढ़ाई, दवाई, सुरक्षा, यातायात, संचार, जलापूर्ति जैसे बुनियादी सेवा क्षेत्रों में ठेकेदारी व निजीकरण को हतोत्साहित करके दिल्ली सुरक्षित रोज़गार का रास्ता प्रशस्त कर सकती है।
विस्थापन रोक में सहयोग ज़रूरी
दूसरे राज्यों से दिल्ली आ रही आबादी को उनके प्रदेश में रोकने के लिए दिल्ली सरकार को चाहिए कि वह उन राज्यों के शिक्षा और रोज़गार के ढांचे को स्वावलम्बी बनाने में सहयोग करे। इसके लिए वह दिल्ली में मौजूद ज्ञान, कौशल व मानव संसाधन का उपयोग करे। इससे भी अंततः रोज़गार, दिल्लीवासियों का ही बढ़ेगा।
राय कई, ईमानदारी प्रमुख
स्वास्थ्य बीमा की आड़ में उपजी लूट की जगह, 50 वर्ष से अधिक उम्र के हर दिल्लीवासी के इलाज का ज़िम्मा। अधिकतम संभव लागत पर सुनिश्चित मुनाफा दर के आधार पर वस्तुओं की अधिकतम फुटकर बिक्री दर का निर्धारण। सुरक्षा में तकनीक का सदुपयोग। जनसंवाद के लिए दिल्ली सरकार का अपना टेलीविज़न चैनल। विधानसभा, नगर निगम-नगर पालिका कार्यवाहियों का सीधा प्रसारण। राय कई हो सकती हैं। मूल आवश्यकता पार्टी, उम्मीदवार व नागरिक...तीनो द्वारा अपनी-अपनी जवाबदारी ईमानदारी से निभाने का मन बनाने की है। यदि हम यह कर पाएं, तो तय मानिए कि तंत्र पर लोक की हकदारी एक दिन खुद-ब-खुद आ जाएगी। धीरे-धीरे हम सही मायने में लोकतंत्र भी हो जाएंगे।
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