नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो की रिपोर्ट में यह साफ है कि हर साल देश में 50,000 से अधिक पोक्सो केस दर्ज होते हैं।
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मूक-बधिर बच्चों के लिए पच्चीस साल से काम कर रही मोनिका पुरोहित बताती हैं-
यदि इन बच्चों से उनकी साइन लैंग्वेज में बात की जाए तो कई उलझे केस सुलझ जाते हैं। ऐसे ही एक केस का जिक्र करते हुए मोनिका बताती हैं कि कुछ साल पहले खजराना पुलिस ने उन्हें बुलाया। एक मूक-बधिर बच्ची के साथ यौन शोषण हुआ था। वह बच्ची छह माह की गर्भवती थी। छह माह या उससे पहले लंबे समय तक उसके साथ यौन शोषण होता रहा लेकिन परिजन और आस-पास के लोग अनिभिज्ञ रहे। फिर मोनिका पुरोहित की काउंसलिंग के बाद बच्ची ने न सिर्फ अपने दुष्कर्म के बारे में बताया बल्कि उसे गिरफ्तार भी करवाया। कुछ समय पहले आरोपी जानू पिता महबूब को अदालत ने अपराधी माना और पॉक्सो एक्ट के तहत उसे दस वर्ष कारावास की सजा सुनाई।
आंकड़े क्या कहते हैं-
नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो की रिपोर्ट में यह साफ है कि हर साल देश में 50,000 से अधिक पोक्सो केस दर्ज होते हैं। हालांकि इनमें से कितने मूक-बधिर या अन्य दिव्यांग है, इसकी कोई स्पष्ट गणना या विवेचना नहीं है। यह डाटा गैप अपने आप में चिंता का विषय है। कई स्वतंत्र रिपोर्ट्स बताती हैं कि यौन शोषण या यौन हिंसा से पीड़ित हर दस बच्चों में से एक दिव्यांग है जो कभी ना कभी यौन शोषण का शिकार हुआ है लेकिन अधिकांश मामलों में एफआईआर दर्ज नहीं हो पाती है।
बच्चे सबके सांझा होते हैं। फिर यदि वे किसी खास शारीरिक कमी से जूझ रहे हैं तो समाज की जिम्मेदारी उनके प्रति कई गुना बढ़ जाती है। यदि पहले से ही तकलीफ झेल रहे इन बच्चों के साथ यौन शोषण जैसा अपराध होता है तो यह सिर्फ कानूनी विफलता ही नहीं बल्कि हमारी नैतिक और मानवीय हार भी है। पॉक्सो एक्ट ने एक बुनियादी ढांचा दिया है लेकिन इस ढांचे को इंसानी समझ, संसाधनों और संवेदनशीलता से भरने की आवश्यकता है। अन्यथा यह मौन चीखें सभ्य समाज के मुंह पर थप्पड़ की तरह महसूस होती रहेंगीं।
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