राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले का हालिया बयान कि आपातकाल के दौरान संविधान में जोड़ा गया समाजवाद और धरमनिर्पेक्षता शब्द को हटाए जाने पर विचार करना चाहिए, एक नए विवाद को जन्म दे गया। ठीक वैसे ही जैसे बिहार विधानसभा चुनाव के पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत का यह कहना कि आरक्षण की व्यवस्था पर पुनर्विचार करना चाहिए। इन दोनों बयानों को नए राजनीतिक संदर्भ में संघ परिवार की संविधान बदलने की मंशा से जोड़ा जाना लगभग तय है।
कृष्ण कथा को लेकर भी जिस तरह की जातीय लामबंदी दिख रहीं है, वह भी एक नए तरह के राजनीतिक- सामाजिक ध्रुवीकरण का संकेत है। खासकर ऐसे समय में जब अस्मिता का सवाल अपने परवान पर चढ़ा है। आमजन अपना इतिहास पढ़ने -समझने को लेकर उत्सुक दिख रहा है ऐसे बयान न सिर्फ उनके संवैधानिक हक़ छीन जाने का भय पैदा करते हैं , बल्कि उन्हें अपने इतिहास के साथ अपमान भी नज़र आता है।
समाजवाद और पूंजीवाद के सन्दर्भ में हरिजन पत्रिका में एक लेख में महात्मा गांधी लिखते है कि -पूंजीवाद और समाजवाद शब्दों के अस्तित्व में आने के पहले ईशावास्योपनिषद में पूंजी और संसाधनों पर एकाधिकार से त्याग का सन्देश दिया गया। कहा यह भी गया है कि - प्राकृतिक संसाधन हमारी पुश्तैनी संपत्ति नहीं, आने वाली पीढ़ी की अमानत है। इसलिए उनका त्यागपूर्वक उपभोग करें। आसक्ति और लालच पूर्वक नहीं।समाजवाद के मूल में है किसी भी तरह के लोभ का त्याग।
लोभ से छुटकारे का तरीका भारतीय दर्शन में अस्तेय और अपरिग्रह का पालन करना बताया गया है। अन्य किसी भी सामाजिक- सांस्कृतिक संगठन की तुलना में भारत की प्राचीन सभ्यता -संस्कृति पर बहस चलाने के लिए विख्यात- कुख्यात रहें संघ परिवार के लिए ईश्वास्योपनिषद से क्या कोई संदेश मिलता है?
किफायतसारी, सादगी और सदाचार हमारे जीवन मूल्य हैं। श्रेष्ठ समाजवादी विचारकों के लिए भी समाजवाद केवल रोजी-रोटी से जुड़ा मामला नहीं है। रोजालक्समबर्ग के शब्दों में कहें तो " समाजवाद रोटी -मक्खन का सवाल नहीं है, बल्कि एक सांस्कृतिक आंदोलन है, जो संसार में एक महती विचारधारा को प्रवाहित करता है।" मानवता समाजवाद का आधार है।
संवैधानिक अधिकारों में फेरबदल और विवाद
भारत के दलित-पिछड़े समाज को अब न सिर्फ रोटी की बल्कि शौर्य, आत्मविश्वास स्वतन्त्रता और आत्मसम्मान की पहले के किसी भी समय के मुकाबले ज्यादा जरूरत अब महसूस होने लगी है, इसलिए संवैधानिक अधिकारों की किसी फेरबदल की कोई कोशिश यहां तक की उस विषय पर किसी भी तरह के पुनर्विचार की चर्चा भी; उन्हें अपने इतिहास का अपमान नजर आने लगता है।
इस संदर्भ में कार्ल मार्क्स का यह कहना सर्वथा उचित प्रतीत होता है कि "समाजवाद मनुष्य को विवशता के क्षेत्र से हटाकर स्वाधीनता के राज्य में ले जाना चाहता है, इसलिए समाजवाद का आदर्श हर व्यक्ति से उसकी योग्यता के अनुसार काम लेकर उसके आवश्यकतानुसार वस्तुओं का प्रबन्ध करना है।"
रही बात धर्मनिरपेक्षता की तो महात्मा गांधी भी उसे सर्वधर्म सद्भाव के अर्थ में ही ग्रहण करते थे। संघ परिवार का राजनीतिक संगठन भाजपा भी कम से कम अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवानी के समय तक इसे इसी रूप में ग्रहण किया जाता रहा है। ये वे लोग हैं , जिन्होंने आपातकाल का दंश झेला है।
जनता पार्टी की सरकार में शामिल होने के बावजूद तब कभी इन शब्दों को अस्पृश्य नहीं माना गया। आपातकाल के पचास साल पूरा होने पर इन दोनों शब्दों को संविधान से निकालने की चर्चा करना संघ के मंशा पर सवाल तो खड़ा करता है। इस लिए जरूरी है कि समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता को सही तरीके से समझा जाए।