कृष्णा के गांव में अब भी प्राथमिक सुविधाओं की कमी है।
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गांव आज भी बदहाल स्थिति में
मानिकपुर ब्लॉक में पड़ने वाला गढ़चपा ग्राम पंचायत के अंतर्गत आता है बड़हर गांव। सरकारी सिस्टम और सियासत की अनदेखी का जीता जागता उदाहरण है ये गांव। मौजूदा समय मे इस गांव में 35 आदिवासी परिवार रहते हैं लेकिन सम्पर्क मार्ग न होने के कारण न तो इनके पास शिक्षा व्यवस्था पहुंच सकी और न ही स्वास्थ्य सुविधाएं और न ही अन्य किसी तरह की सुविधाएं।
सरकारी सिस्टम औए सियासत की अनदेखी के चलते गांव वाले आज भी मूलभूत सुविधाओं से बहुत दूर हैं। सबसे ज्यादा आश्चर्य की बात ये है कि इस गांव में कभी भी कोई अधिकारी नहीं गया।
महात्मा गांधी से मिली प्रेरणा
कृष्णा कोल ने बताया कि उन्हें अच्छे से याद है जब वो 15 साल के थे और स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया करते थे। इसी के चलते उनकी भेंट महात्मा गांधी से भी हुई थी। महात्मा गांधी से भेंट के बाद उनमें बहुत बदलाव आया। गांव आकर उन्होंने इसी जंगल मे घर परिवार बसाया और धीरे-धीरे यहां और भी परिवारों की संख्या बढ़ती गई।
वे कहते हैं- शुरुआत में पेयजल संकट के कारण कई वर्षों तक यहां गांव वालों को इधर-उधर भटकना पड़ता था। लेकिन उन्होंने ने ठाना की वो इस समस्या का हल निकालेंगे। फिर क्या था उन्होंने उठाया हथौड़ा-फावड़ा उठाया और लग गए कुएं की खुदाई में। शुरुआत में उन्हें बहुत मुश्किलें हुई, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्हें रिश्तेदारो ने भी मदद की और कड़ी मेहनत के बाद आखिर कुएं की खुदाई का काम पूरा हुआ, पानी निकला।
बुन्देलखण्ड का समूचा क्षेत्र पेयजल संकट से हमेशा जूझता रहा है।
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पेयजल समस्या समाप्त करके पेश की मिसाल
बुन्देलखण्ड के दशरथ मांझी कृष्णा कोल ने अपनी मेहनत और जिद से ये निश्चित कर दिया कि अगर आप किसी भी कार्य के लिए ठान लें तो आप निश्चित रूप से उसे साकार कर सकते हैं। बुन्देलखण्ड का समूचा क्षेत्र पेयजल संकट से हमेशा जूझता रहा है। ऐसे में कृष्णा कोल का भागीरथ प्रयास मिसाल पेश करने वाला है।
उन्होंने कुंआ खोदकर न सिर्फ अपने गांव में पेयजल की समस्या दूर की बल्कि आसपास के क्षेत्र में एक नया उदाहरण स्थापित किया जिसने बदलाव की नींव रखी। फिलहाल गांव में प्रधान ने बोर करवाकर पेयजल की समस्या को काफी हद तक कम दिया है लेकिन कृष्णा कोल के भागीरथ प्रयास को कभी भुलाया नहीं जा सकता।
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