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बुन्देलखण्ड के दशरथ मांझी की कहानी, पानी के लिए रच दिया अनूठा इतिहास

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85 साल के कृष्णा कोल बुंदेलखंड के दशरथ मांझी कहे जाते हैं। - फोटो : Social Media
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कहते हैं कुछ कर गुजरने का जुनून पहाड़ में भी छेद करके पानी निकाल सकता है। ऐसा ही कुछ हुआ है बुन्देलखण्ड के चित्रकूट जिले के एक छोटे से गांव बडहर के पुरवा में। जहां 85 वर्ष के एक बुजुर्ग ने अपनी मेहनत और जिद से गांव में पेयजल संकट की समस्या को दूर कर दिया। 

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जी हां हम बात कर रहे हैं कृष्णा कोल की। कभी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के संपर्क में आए कृष्णा में गांधी से मुलाकात के बाद किसी भी समस्या से हार मानने की जगह उसका हल निकालने की प्रेरणा जागी। उनके भीतर बहुत कुछ बदल गया। उनकी यही प्रेरणा उनके जीवन में घटित घटना की बानगी भी है।

दरअसल, बुंदेलखंड के पाठा के पठारी भाग में कृष्णा कोल ने रात दिन एक करके 50-60 फीट गहरे कुंए को खोदकर गांव की प्यास मिटा दी। 

एक समय था जब कृष्णा कोल ने जिस वक्त कुंए की खुदाई शुरू की थी उस वक्त दशकों पहले पेयजल का जबरदस्त संकट था। लेकिन इन्होंने हार नहीं मानी और अपने जुनून से धरती के अंदर से भी पानी निकाल लिया। फिलहाल इस व्यक्ति ने सूखे बुन्देलखण्ड में एक मिसाल कायम की है और उस सिस्टम को भी जोरदार तमाचा मारा है जो यहां तक कभी पहुंचा ही नहीं।
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बता दें कि कृष्णा कोल का गांव चारों तरफ से जंगल से घिरा हुआ है। ऐसे में यहां रहने के निर्णय लेना भी दशकों पहले कृष्णा कोल का ही था। आज देखते ही देखते चौथी पीढ़ी सामने खड़ी है लेकिन स्थिति वैसी है। गांव में शिक्षा एवं स्वास्थ्य के लिए तो कभी कुछ हुआ ही नहीं।
 

कृष्णा के गांव में अब भी प्राथमिक सुविधाओं की कमी है। - फोटो : Social Media
गांव आज भी बदहाल स्थिति में 
मानिकपुर ब्लॉक में पड़ने वाला गढ़चपा ग्राम पंचायत के अंतर्गत आता है बड़हर गांव। सरकारी सिस्टम और सियासत की अनदेखी का जीता जागता उदाहरण है ये गांव। मौजूदा समय मे इस गांव में 35 आदिवासी परिवार रहते हैं लेकिन सम्पर्क मार्ग न होने के कारण न तो इनके पास शिक्षा व्यवस्था पहुंच सकी और न ही स्वास्थ्य सुविधाएं और न ही अन्य किसी तरह की सुविधाएं।

सरकारी सिस्टम औए सियासत की अनदेखी के चलते गांव वाले आज भी मूलभूत सुविधाओं से बहुत दूर हैं। सबसे ज्यादा आश्चर्य की बात ये है कि इस गांव में कभी भी कोई अधिकारी नहीं गया।

महात्मा गांधी से मिली प्रेरणा 
कृष्णा कोल ने बताया कि उन्हें अच्छे से याद है जब वो 15 साल के थे और स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया करते थे। इसी के चलते उनकी भेंट महात्मा गांधी से भी हुई थी। महात्मा गांधी से भेंट के बाद उनमें बहुत बदलाव आया। गांव आकर उन्होंने इसी जंगल मे घर परिवार बसाया और धीरे-धीरे यहां और भी परिवारों की संख्या बढ़ती गई।

वे कहते हैं- शुरुआत में पेयजल संकट के कारण कई वर्षों तक यहां गांव वालों को इधर-उधर भटकना पड़ता था। लेकिन उन्होंने ने ठाना की वो इस समस्या का हल निकालेंगे। फिर क्या था उन्होंने उठाया हथौड़ा-फावड़ा उठाया और लग गए कुएं की खुदाई में। शुरुआत में उन्हें बहुत मुश्किलें हुई, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्हें रिश्तेदारो ने भी मदद की और कड़ी मेहनत के बाद आखिर कुएं की खुदाई का काम पूरा हुआ, पानी निकला।
 
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बुन्देलखण्ड का समूचा क्षेत्र पेयजल संकट से हमेशा जूझता रहा है। - फोटो : Social Media
पेयजल समस्या समाप्त करके पेश की मिसाल 
बुन्देलखण्ड के दशरथ मांझी कृष्णा कोल ने अपनी मेहनत और जिद से ये निश्चित कर दिया कि अगर आप किसी भी कार्य के लिए ठान लें तो आप निश्चित रूप से उसे साकार कर सकते हैं। बुन्देलखण्ड का समूचा क्षेत्र पेयजल संकट से हमेशा जूझता रहा है। ऐसे में कृष्णा कोल का भागीरथ प्रयास मिसाल पेश करने वाला है।

उन्होंने कुंआ खोदकर न सिर्फ अपने गांव में पेयजल की समस्या दूर की बल्कि आसपास के क्षेत्र में एक नया उदाहरण स्थापित किया जिसने बदलाव की नींव रखी। फिलहाल गांव में प्रधान ने बोर करवाकर पेयजल की समस्या को काफी हद तक कम दिया है लेकिन कृष्णा कोल के भागीरथ प्रयास को कभी भुलाया नहीं जा सकता।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।


 
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