हिमालय के सर्वोच्च तीर्थस्थलों में शामिल बदरीनाथ धाम को भव्य और आधुनिक स्वरूप देने की महत्वाकांक्षी योजना के बीच एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने इस पवित्र नगरी की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस तीर्थस्थल पर सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च करके सड़कें, पुल, पार्किंग स्थल, यात्री सुविधाएं और अलकनंदा के किनारे नए निर्माण विकसित किए जा रहे हैं, उसके ऊपर ऊंचे पर्वतों से लटकते हिमनद भविष्य में विनाशकारी हिमस्खलन का कारण बन सकते हैं।
भारतीय विज्ञान संस्थान, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन से जुड़े वैज्ञानिकों के अध्ययन के अनुसार, अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में हिमनद टूटने से बदरीनाथ की लगभग 398 इमारतें, दो पुल, एक हेलीपैड, पार्किंग क्षेत्र और 2.66 किलोमीटर सड़क प्रभावित हो सकती है। हालांकि वैज्ञानिकों ने किसी आसन्न आपदा की भविष्यवाणी नहीं की है।
अध्ययन की वास्तविक चेतावनी यह है कि प्राकृतिक आपदाओं की आशंका वाले क्षेत्र में बढ़ते निर्माण और मानवीय गतिविधियां संभावित नुकसान को कई गुना बढ़ा सकती हैं। इसलिए सवाल केवल बदरीनाथ के सौंदर्यीकरण का नहीं, बल्कि उसके दीर्घकालिक अस्तित्व और सुरक्षा का भी है।
कितने खतरनाक हैं लटकते हिमनद?
28 अक्टूबर 2026 को अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका लैंडस्लाइड्स में प्रकाशित बताए गए अध्ययन में वैज्ञानिकों ने बदरीनाथ के ऊपर लगभग 4,700 से 5,465 मीटर की ऊंचाई पर स्थित तीन लटकते हिमनदों का आकलन किया। खड़ी पर्वतीय ढलानों से जुड़े ऐसे हिमनद तापमान बढ़ने, बर्फ की आंतरिक संरचना बदलने अथवा आधार पर पकड़ कमजोर होने से टूट सकते हैं।
अध्ययन में दूसरे हिमनद की विनाशकारी क्षमता सर्वाधिक पाई गई। उसका अनुमानित हिम आयतन 53.2 लाख घनमीटर और औसत ढलान 34.57 अंश है। वैज्ञानिक अनुकरण में उससे उत्पन्न संभावित हिमस्खलन की अधिकतम गति 78.5 मीटर प्रति सेकंड, अर्थात लगभग 283 किलोमीटर प्रति घंटा, और प्रवाह की अधिकतम ऊंचाई 73.5 मीटर आंकी गई।
इतनी तीव्र गति से उतरती बर्फ और मलबे की धारा भवनों, सड़कों तथा पुलों को भारी नुकसान पहुंचा सकती है। ये आंकड़े संभावित परिस्थितियों पर आधारित हैं, किसी वास्तविक घटना के नहीं। अध्ययन में बदरीनाथ मंदिर के सीधे हिमस्खलन की चपेट में आने की संभावना नहीं दिखाई गई है, लेकिन मलबे, नदी में अवरोध और अन्य अप्रत्यक्ष प्रभावों का अलग आकलन आवश्यक है।
अलकनंदा घाटी में 219 लटकते हिमनद
इससे पहले अप्रैल 2026 में एनपीजे नेचुरल हैजर्ड्स में प्रकाशित अध्ययन में अलकनंदा जलग्रहण क्षेत्र में 219 लटकते हिमनद चिह्नित किए गए थे। इनका कुल क्षेत्रफल लगभग 71.7 वर्ग किलोमीटर और अनुमानित हिम आयतन 2.39 घन किलोमीटर बताया गया। इनमें लगभग 0.74 घन किलोमीटर लटकती हिमराशि का अनुमान था।
उस अध्ययन में बदरीनाथ, माणा, हनुमानचट्टी और घांघरिया जैसे स्थानों तक संभावित हिमस्खलन पहुंचने की आशंका व्यक्त की गई थी। कुछ परिदृश्यों में बदरीनाथ के निकट प्रवाह की ऊंचाई 51 मीटर और बदरीनाथ-माणा सड़क के पास 48 मीटर आंकी गई। दोनों अध्ययन हिमनदों से उत्पन्न खतरे और बढ़ते निर्माणों के संयुक्त जोखिम की ओर संकेत करते हैं।
हिमनदीय मलबे पर बसी तीर्थनगरी
समुद्र तल से लगभग 3,415 मीटर की ऊंचाई पर स्थित बदरीनाथ एक प्राचीन हिमनदीय घाटी में बसा है। हिमनद अपने पीछे चट्टानों, पत्थरों और मिट्टी के असंगठित जमाव छोड़ते हैं, जिन्हें हिमोढ़ कहा जाता है। ऐसे निक्षेपों की स्थिरता ठोस चट्टानों जैसी नहीं होती। भूवैज्ञानिक प्रोफेसर एस.पी. सती और प्रोफेसर महेंद्र प्रताप सिंह बिष्ट पहले भी बदरीनाथ की भूगर्भीय संवेदनशीलता के प्रति आगाह कर चुके हैं।
उन्होंने हिमनदीय मलबे में व्यापक खुदाई, भारी निर्माण और पर्वतीय ढलानों से छेड़छाड़ के संभावित दुष्परिणामों की ओर ध्यान दिलाया था। हिमनद टूटने और हिमोढ़ों की अस्थिरता अलग प्राकृतिक प्रक्रियाएं हैं, लेकिन किसी बड़ी आपदा में दोनों के प्रभाव मिलकर नुकसान बढ़ा सकते हैं। हिमस्खलन का मलबा अलकनंदा का प्रवाह अवरुद्ध करे तो जलभराव और अचानक बाढ़ जैसी द्वितीयक परिस्थितियां भी उत्पन्न हो सकती हैं।
क्या मास्टर प्लान में खतरे की अनदेखी हुई?
बदरीनाथ मास्टर प्लान के अंतर्गत लगभग 440 करोड़ रुपये के कार्यों में संपर्क सड़कें, यात्री सुविधा भवन, आगमन परिसर, पार्किंग, नदी तट विकास और नए पुल शामिल हैं। मार्च 2026 तक अनेक कार्य पूरे हो चुके थे, जबकि कुछ निर्माण जारी थे। नया वैज्ञानिक अध्ययन यह साबित नहीं करता कि मास्टर प्लान से हिमनद अस्थिर हुए हैं। लेकिन संभावित हिमस्खलन मार्गों में निर्माण होने से जोखिमग्रस्त परिसंपत्तियों और प्रभावित होने वाले लोगों की संख्या बढ़ सकती है।
किसी प्रमुख पुल अथवा संपर्क सड़क के क्षतिग्रस्त होने पर हजारों यात्रियों की सुरक्षित निकासी भी बाधित हो सकती है। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जुलाई 2020 में तत्कालीन पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने भी हिमनदों के खतरे का विशेष अध्ययन कराने की आवश्यकता जताई थी।
प्रोफेसर महेंद्र प्रताप सिंह बिष्ट के शैक्षणिक विवरण में बदरीनाथ के हिम और मलबा हिमस्खलन संबंधी पूर्व तकनीकी अध्ययन का भी उल्लेख है।ऐसे में सवाल उठता है कि छह वर्ष पहले व्यक्त चिंताओं पर क्या कार्रवाई हुई? क्या मास्टर प्लान तैयार करते समय हिमस्खलन के संभावित मार्गों का वैज्ञानिक मानचित्रण किया गया? क्या निर्माण स्थलों का चयन इन खतरों को ध्यान में रखकर हुआ?
बढ़ते तीर्थयात्रियों के सामने गंभीर चुनौती
वर्ष 2025 में लगभग 17 लाख तीर्थयात्री बदरीनाथ पहुंचे थे। सीमित पर्वतीय क्षेत्र में इतनी बड़ी संख्या में लोगों की सुरक्षा स्वयं एक चुनौती है। अप्रैल 2026 के अध्ययन में वर्ष 2000 से 2030 के बीच संभावित हिमस्खलन प्रभावित क्षेत्रों में निर्मित क्षेत्रफल 8,025 वर्गमीटर से बढ़कर 1,51,800 वर्गमीटर होने का अनुमान है।
इसी प्रकार संभावित रूप से प्रभावित आबादी 380 से बढ़कर 8,540 तक पहुंचने का आकलन है। ये व्यापक अध्ययन क्षेत्र के अनुमान हैं, किसी निश्चित आपदा में जनहानि की भविष्यवाणी नहीं। अब सरकार को तीनों चिह्नित हिमनदों की विस्तृत जांच, संभावित हिमस्खलन मार्गों का मानचित्रण और मास्टर प्लान के निर्माणों की सुरक्षा समीक्षा करानी चाहिए। जोखिमग्रस्त क्षेत्रों में नए निर्माणों पर पुनर्विचार, उपग्रह आधारित निगरानी, चेतावनी प्रणाली और सुरक्षित निकासी व्यवस्था आवश्यक हैं।
लेकिन चेतावनी प्रणाली ही पर्याप्त नहीं होगी। कुछ हिमस्खलन इतनी तेजी से घटित होते हैं कि सुरक्षित निकलने का समय ही नहीं मिलता। इसलिए जोखिम वाले स्थानों पर निर्माण से बचना सबसे प्रभावी सुरक्षा उपाय है। बदरीनाथ करोड़ों लोगों की आस्था और हिमालय की सांस्कृतिक विरासत का केंद्र है।
उसका विकास आवश्यक है, लेकिन विकास की सफलता विशाल भवनों और चौड़ी सड़कों से नहीं, बल्कि तीर्थनगरी की सुरक्षा से मापी जानी चाहिए। हिमालय में किसी तीर्थ को भव्य बनाना इंजीनियरिंग की उपलब्धि हो सकती है, लेकिन उसे प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित रखना उससे बड़ी वैज्ञानिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी है।
अब सरकार को तय करना है कि वह नवीनतम वैज्ञानिक चेतावनी को केवल एक शोधपत्र मानती है या बदरीनाथ मास्टर प्लान की व्यापक सुरक्षा समीक्षा का आधार बनाती है।
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