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समाज और संस्कृति: दिखावे का ज्ञान या जीवंत आचरण? जानें क्यों टूट रही है भारतीय संस्कारों की कड़ी

सार

आधुनिकता और पाश्चात्य प्रभाव से भारतीय परिवारों में पारंपरिक संस्कारों का पतन हो रहा है। मौखिक उपदेशों के बजाय माता-पिता को स्वयं आचरण, त्याग, अनुशासन और आध्यात्मिक जीवन का जीवंत उदाहरण बनकर नई पीढ़ी में संस्कार रोपने होंगे।
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चरण स्पर्श, पैर छूना - फोटो : adobe stock
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विस्तार
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Erosion of Indian Cultural Values: पिछले कुछ दिनों से भारतीय हिन्दू समाज में अपने संस्कारों से विमुखता चर्चा का प्रमुख विषय रहा है। कुछ उदाहरण आपके समक्ष प्रस्तुत करता हूं। मेरे निकट के एक प्रेमी हैं, जो जीवनयापन में इतने पाश्चात्य हो चुके हैं कि उन्हें स्वयं संस्कारों के विषय में नहीं पता। यदि पत्नी पूजा-पाठ कर ले तो ठीक, वरना स्वयं कभी नहीं करते। उन्हें भगवद्गीता और भागवत पुराण में अन्तर तक नहीं पता, पर भारतीय संस्कार के पतन में ज्ञान रखते हैं। चूंकि, घर का माहौल पूरा पाश्चात्य है तो बच्चे एक कदम आगे हैं। उनका खाना-पीना, रहना, उठना, व्यवहार, पूर्णतः भारतीयता के विपरीत है। जीवन का लक्ष्य और जीवन का ढंग, दोनों बेपटरी हैं। यही बच्चे आगे माता-पिता बनेंगे। हम समझ सकते हैं कि क्या हाल होगा? विडंबना देखिए, यदि घर में पूजा होती है तो कुर्सी पर बैठकर हवन होता है, क्योंकि सुखासन में बैठ पाना मुश्किल है। घर में सब बैठकर भजन-कीर्तन करें, यह तो कल्पना से परे है।
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अभी हाल में एक संबंधी के यहां विवाह उपरान्त नई बहू का आगमन हुआ। प्रेम विवाह है। दोनों परिवार एक-दूसरे को अच्छे से जानते थे, पर न तो नई वधू में संस्कार हैं और न ही मर्यादा। सेवाभाव तो कोसों दूर है। भोजन पकाना, परोसना, खिलाना एक बोझ लगता है। नाम के लिए एक नौकरी का बहाना है। सास व्यस्तता के साथ पूरे घर का ध्यान रखती है। प्रेम, सेवा जैसे भाव एकदम शून्य हैं। अहंकार की प्रमुखता है। यहां भी परिवार में हिन्दू संस्कारों के लिए न समय है, न ही मंशा, पर वाद-विवाद में पूरा ज्ञान है कि क्या गलत हो रहा है और समाज व सरकार को क्या करना चाहिए? ऐसे लोगों के लिए सिर्फ मंदिरों में जाना, त्यौहार मनाना ही एक तरह से परिसीमा हो गई है। 

पुरुषार्थ, त्याग और भावी पीढ़ी में सात्विकता के बीज
आज हिन्दू पुरुष को संस्कार के प्रति सजग होना पड़ेगा। इसके वहन के लिए समय, पुरुषार्थ और त्याग करना होगा। दायित्व के साथ आने वाली पीढ़ी में संस्कार के बीज स्थापित करने होंगे। अच्छा खाना, सोचना और सात्विक नियम वाला जीवन जीने की प्राथमिकता देनी होगी। धन की अंधी दौड़ से स्वयं को संयमित करना होगा। नश्वर से अनश्वर की यात्रा जीवन जी के एक उदाहरण की तरह दिखानी होगी। 
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संस्कार की अनेकों परिभाषाएं हैं, पर एक सरल परिभाषा है कि संस्कार वह है, जो आप करते हैं। जब आप पूरी तरह स्वतंत्र हैं और आपके ऊपर कोई दबाव नहीं है। संस्कार एक पौधे की तरह पनपता है, जिसके बीज माता-पिता द्वारा रोपित किए जाते हैं। फिर धीरे-धीरे स्वयं के अनुशासन, बड़ों द्वारा मार्गदर्शन व जीवंत उदाहरण और ईश्वर कृपा से यह बीज एक मजबूत वृक्ष बनकर मनःस्थिति पर छा जाता है।

बुजुर्गों के आचरण का महत्व
पहले घर के बड़े-बुजुर्ग स्वयं के अनुशासन और उदाहरण से बच्चों में प्रेरणा उत्पन्न कर उन्हें जीवन की सही दिशा का ज्ञान कराते थे। पाश्चात्य संस्कृति और आधुनिक जीवन व सुख-सुविधाओं से यह कड़ी टूटती जा रही है। माता-पिता व बुजुर्ग बच्चों को समझाते तो हैं, पर स्वयं आचरण में नहीं लाते। बच्चे देखकर सीखते हैं और सिर्फ कोरा ज्ञान उन्हें थोथा लगता है, जिससे उनके मन में बड़ों और संस्कारों के प्रति दुर्भाव पैदा होता है। 


एकाकी परिवार व्यवस्था और अत्यधिक मोह का दुष्परिणाम
पहले बड़े परिवारों में अगर कोई संस्कार परिवार के विपरीत व्यवहार करता था तो वह अन्य सदस्यों से कट जाता था। परंतु, अब लघु और एकाकी परिवार व्यवस्था में माता-पिता पर भी कोई अंकुश नहीं है। वे मनमाना आचरण करते हैं और फिर अगली पीढ़ी वही देखकर सीखती है। एक और कारण, आज के दौर में बच्चों के प्रति अत्यधिक मोह है, जो माता-पिता को थोड़ी कड़ाई बरतने से रोकता है। उनकी गलतियों पर पर्दा डालता है। जीवन के सारे सुख उन्हें उपलब्ध कराता है, पर चरित्र निर्माण के लिए कड़ा अनुशासन बेफालतू मालूम पड़ता है।

हमारे ऋषियों-मनीषियों और पूर्वजों ने अपने जीवन व अनेकों शास्त्रों से ये बताया कि जीवन कैसे शांति और स्वस्थता से जिया जा सकता है? मनुष्य जीवन में असीम संभावनाएं छुपी हैं, जो स्वयं हो जानी जा सकती हैं, परंतु पीढ़ी दर पीढ़ी हम उस रास्ते से भटकते हुए आधुनिक युग की नई जीवन शैली और नई परिभाषाएं अपना कर स्वयं को सफल मानने लगे हैं। 

आर्थिक प्रगति के साथ भीतर प्रज्वलित रहे भारतीयता का दीप
आप आर्थिक रूप से सफल होइए, आधुनिक जीवनशैली के साथ चलिए, पर भीतर एक भारतीयता, तप, त्याग, शांति, समभाव और आध्यात्मिकता का दीप सदैव जलाकर रखिए। इस दीप की ज्योति पीढ़ी दर पीढ़ी अखण्डता से प्रज्वलित रखिए। साथ ही, जब तक हम परिवार, जो कि समाज की सबसे एकल इकाई है, जिसे जोड़कर उसकी संरचना होती है, में संस्कारों को जीएंगे नहीं, तब तक पतन होता रहेगा।

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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