आज जो साहित्य लिखा-रचा जा रहा है, उनमें से ज्यादातर सोशल मीडिया के प्रचार, लाइक्स, कमेंट्स, भव्य विमोचन और तमाम पुस्तक मेलों से लेकर लिटरेचर फेस्टिवल को ध्यान में रखकर लिखा जा रहा है। इस सत्य को प्रकाशक भी स्वीकारते हैं और लेखक भी। दरअसल पिछले कुछ सालों में बाजार के दबाव में साहित्य का जो उत्सवी चेहरा, भव्यता और लेखकों के स्टारडम वाली ईमेज देखने को मिली है, पश्चिमी देशों के प्रकाशकों की तरह यहां भी कुछ पुस्तकों को ‘बेस्ट सेलर’ बनाने की जो होड़ दिखती है, उससे साफ है कि साहित्य में जबरदस्त ग्लैमर की घुसपैठ हो चुकी है।
कुछ मायने में इसे अच्छा भी मान सकते हैं कि चलिए, इसी बहाने साहित्य, साहित्यकारों, लेखकों को जितना निरीह माना जाता था, बाज़ार ने उन्हें भी ब्रांड बनाना शुरू कर दिया है।
जो हमारे कालजयी लेखक हुआ करते थे, बेशक देश, काल, समाज को देखते हुए उनका लेखन आज की पीढ़ी को या कहें कि आज के दौर के रचनाकारों को भी उतना न भाए, लेकिन अब चूंकि बाजार ने उन्हें भी एक बड़ा ब्रांड बनाकर बेचना शुरू कर दिया है, तो इसे उनके लिए भी स्वर्णिम काल ही मान लिया जाए।
दरअसल आज पढ़ने से ज्यादा जरूरी है इस ब्रांड के बारे में बात करना और उनकी चंद किताबें अपने ड्राइंग रूम में रखना।
बहरहाल इस चर्चा का मकसद नकारात्मक न माना जाए, बल्कि साहित्य के इस स्वर्णिम काल को सकारात्मक तौर पर देखा जाए। हमारे कवि मित्र और कुछ अन्य साथी पत्रकार, लेखक और मौजूदा साहित्यिक, सांस्कृतिक परिदृष्य पर चिंता जताने वाले रचनाकर्मी इस बाजारवाद और चमक दमक को लेकर सवाल उठाते हैं और कहते हैं कि आज जिस तरह देशभर में 300 से ज्यादा लिटरेचर फेस्टिवल या पुस्तक मेले हो रहे हैं, साहित्य उत्सव के मेले लग रहे हैं, वहां लेखक और साहित्यकार कहां खड़ा है?
साहित्य उत्सवों के मंच पर आने की भूख
अपनी लिखी पुस्तकों को छपवाने से लेकर उसका भव्य विमोचन कराने, समीक्षाएं लिखवाने, तमाम वीडियो प्लेटफॉर्म पर चर्चा करवाने, साहित्य उत्सवों के मंच पर आने की इसी भूख को प्रकाशकों के बाजार भाव ने बखूबी समझा है।
अब पूरे साल देश में कहीं न कहीं ऐसे आयोजन होते रहते हैं। कोरोना काल के बाद अचानक ऐसे साहित्यिक सांस्कृतिक आयोजनों की बाढ़ आ गई है, बड़ी संख्या में लोग उमड़ रहे हैं, हर आयोजन में कोई न कोई सेलिब्रिटी लाने की कोशिश होती है। आयोजकों के लिए ज्यादा से ज्यादा प्रायोजक जुटाकर लाभ और शोहरत कमाना उनके व्यवसाय का एक हिस्सा भी है। इसे आप ‘सोशल रेस्पॉंस्बिलिटी’ भी कह सकते हैं और बड़ी कंपनियों के ‘सीएसआर फंड’ को खर्च करने का एक माध्यम भी।
इसका गणित बहुत बारीकी से काम करता है। साहित्य के इन ‘मेगा इवेंट्स’ के लिए नामी गिरामी इवेंट मैनेजमेंट कंपनी आ चुकी हैं। आप अपना आइडिया दीजिए, मोटी धनराशि खर्च कीजिए और फिर देखिए इसकी भव्यता। साहित्यकार, लेखक भी खुश और नई पीढ़ी को मुफ्त में कुछ सेलिब्रिटी को देखने सुनने का सुनहरा मौका भी। छोटे बड़े प्रकाशकों के स्टॉल भी और इसी बहाने कुछ पुस्तकों की बिक्री भी।
ऐसे ही एक बड़े साहित्यिक उत्सव में आए एक वरिष्ठ लेखक कहते हैं -
मैं तो ये देखने आया हूं कि कैसे साहित्य का चेहरा आज बदला है। पहले लेखक एक ‘बेचारा’ था, अपनी रॉयल्टी के लिए परेशान रहता था, प्रकाशकों और लेखकों के बीच एक शीतयुद्ध छिड़ा रहता था, उसकी छवि दीन हीन होती थी, लेकिन तब वह जो लिखता था वह जीवन की सच्चाइयों को करीब से देखकर लिखता था, मानवीय संवेदना को महसूस करके लिखता था, सत्ता और बाजार के चक्रव्यूह में नहीं फंसा था। भाषा और शब्दों को लेकर उसकी अपनी चिंताएं थीं, बहस होती थीं, वैचारिक टकराव को संजीदा तरीके से सामने लाने का भी एक तरीका था।
त्रिलोचन, नागार्जुन, शमशेर, मुक्तिबोध, निराला, प्रेमचंद, महादेवी वर्मा से लेकर महाश्वेता देवी तक में एक आत्मसम्मान, अक्खड़पन और आम आदमी के बीच से साहित्य को रचने का जज्बा था और दृष्टि तो थी ही, लेकिन अब वो एक पूरी पीढ़ी चली गई। सोशल मीडिया ने घर-घर में लेखक और कवि पैदा कर दिए, आज की राजनीतिक व्यवस्था ने अपनी वंदना करने वाले रचनाकारों को गढ़ने की प्रक्रिया तेज कर दी।