भारत में भ्रष्टाचार का रोग बढ़ता ही जा रहा है। हमारे जीवन का कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं बचा, जहां भ्रष्टाचार के असुर ने अपने पंजे न गड़ाए हों। भारत नैतिक मूल्यों और आदर्शों का कब्रिस्तान बन गया है। देश की सबसे छोटी इकाई पंचायत से लेकर शीर्ष स्तर के कार्यालयों और क्लर्क से लेकर बड़े अफसर तक, बिना घूस के आज सरकारी फाइल आगे ही नहीं सरकती।
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के ताजा सर्वे के मुताबिक भ्रष्टाचार के मामले में 180 देशों की सूची में भारत इस साल 79वें पायदान पर है। हालांकि भारत की रैंकिंग पिछले साल के मुकाबले तीन पायदान सुधरी है। यानी पिछले साल देश 81वें क्रम पर था।
इस साल रिश्वत देने वालों की संख्या 51 प्रतिशत है, जबकि पिछले साल यह संख्या 56 प्रतिशत थी। रिपोर्ट के अनुसार पासपोर्ट और रेल टिकट जैसी सुविधाओं को केंद्रीकृत और कम्प्यूटराइज्ड करने से भ्रष्टाचार में कमी आई है।
हालांकि, सरकारी दफ्तर रिश्वतखोरी का बड़ा अड्डा बने हुए हैं। इनमें भी सबसे ज्यादा रिश्वतखोरी राज्य सरकारों के ऑफिसों में होती है। गौरतलब है कि सर्वे में 1.90 लाख लोगों को शामिल किया गया। इसमें 64 प्रतिशत पुरुष और 36 प्रतिशत महिलाएं शामिल हुईं। सर्वे में 48 प्रतिशत लोगों ने माना कि राज्य सरकार या स्थानीय स्तर पर सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार रोकने के लिए कोई कारगर कदम नहीं उठाए हैं।
लोगों ने 2017 में हुई नोटबंदी की वजह से भी भ्रष्टाचार में गिरावट को कारण माना है। तब कुछ समय तक लोगों के पास देने के लिए नकद उपलब्ध नहीं था। ऐसे लोग जो यह मानते हैं कि रिश्वत के बिना काम नहीं हो सकता, उनकी संख्या पिछले साल के मुकाबले 36 प्रतिशत से बढ़कर 38 प्रतिशत हो गई। जो रिश्वत को महज एक सुविधा शुल्क समझते हैं उनकी संख्या में भी बढ़ोतरी हुई है।
2018 में 22 प्रतिशत के मुकाबले ऐसे मानने वाले लोगों की संख्या 26 प्रतिशत हो गई है। जहां तक बात रिश्वत लेने वाले दफ्तरों की है, तो प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन और जमीन से जुड़े मामलों में सबसे अधिक रिश्वत दी गई। 26 प्रतिशत लोगों ने इस विभाग में रिश्वत दी जबकि 19 प्रतिशत ने पुलिस विभाग में रिश्वत दी।
आज के समय में ईमानदारी तो महज कागज का एक टुकड़ा बनकर रह गई है। हर क्षेत्र में जब तक जेब से हरे-हरे नोटों की उष्णता नहीं दिखाई जाए, तब तक हर काम कछुआ चाल से ही चलता है। न जाने कब पूरा होगा? राम भरोसे ! लेकिन जैसे ही नोटों की गर्मी पैदा होती है, काम में तेजी आने लग जाती है।
इस गर्मी के प्रकोप से बड़े-बड़ों का ईमान पिघलने लगता है। बच्चों का शिक्षण संस्थान में दाखिला करवाना हो, या किसी को सरकारी अस्पताल में भर्ती कराना हो, बिना मुट्ठी गरम किए होता नहीं है।
भ्रष्टाचार की दीमकें हमारी सारी व्यवस्था को खोखला कर रही हैं। कभी सोने की चिड़िया कहा जाने वाला भारत आज भ्रष्टाचार के कीचड़ में धंस चुका है। हमारे नैतिक मूल्य और आदर्श सब स्वाहा हो चुके हैं। बढ़ता हुआ भ्रष्टाचार आचरण दोष का ही परिणाम है।
आजकल अखबारों, टीवी और रेडियो में एक ही खबर सुनने-देखने को मिल रही है, वह है भ्रष्टाचार की। हर दिन भ्रष्टाचार के काले करनामे उजागर हो रहे हैं। देश में भ्रष्टाचार को मिटाकर सभी नागरिकों को रोटी, कपड़ा और मकान जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करना सरकार का काम ही नहीं, बल्कि राजनीतिक धर्म भी होता है। लेकिन आजादी से लेकर अब तक देश की सरकारें भ्रष्टाचार को मिटाने में विफल रही हैं।