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आज की जरूरत: 'अपने आसपास बने रहिए, अपने आसपास बने रहेंगे'

सार

बाजार की रणनीतियां अब क्रूर हो गई हैं और हमने अपना आसपास बदल लिया।  हमें फर्क नहीं पड़ता कि हम कितने पेड़ों के बीच हैं। हमारी प्राथमिकताएं इतनी तेजी से बदली हैं कि पड़ोसी के घर के सुख-दुख अब हमारे हिस्से नहीं आते। 
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प्रकृति और मानवों के बीच समय के साथ बढ़ती जा रही है दूरी। - फोटो : iStock
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विस्तार
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धर्म और संस्कृति का वह रूप बहुत ही अद्भुत होता है जिसमें संतुलन, संयम, सहभागिता, सरोकारी जीवन का आनंद मिलता रहे।  प्रकृति ने मानवों को कई महत्वपूर्ण खूबियों के साथ-साथ एक समृद्ध जैव तंत्र से उपकृत किया है। हमारी जरूरत का हर पेड़ है, पशु है। वे सभी हमारी जरूरत के लिए हैं अर्थात हमारे सहयोगी हैं,  हम इनसे जितना संवेदनशील व्यवहार करेंगे उतना ही हमें स्वस्थ और बेहतर जीवन मिल सकेगा। 

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हम सभी को धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से कुछ इस तरह पोषित-पल्लवित किया जाता है जिससे कि हम सभी का संरक्षण करते हुए जीवन का आनंद महसूस कर सकें।
 

पहली रोटी गाय की, आखिरी रोटी स्वान की, गरीब के हिस्से का खाना, थाली में से 3 कौर पक्षियों के, पक्षियों को दाना डालो तो पूर्वजों को लगता है,चीटियों को आटा, मछलियों को भोजन, ये सब किसी न किसी परम्परा से जोड़े गए हैं। पीपल, बरगद, आंवला, केला, इस तरह हर वृक्ष की किसी न किसी रूप से पूजा अर्थात अंततः इस सबका उद्देश्य प्रकृति और पर्यावरण का संरक्षण ही तो रहा है।


हम नदियों को पूज्य मानते हैं, तालाब और घूरे तक को पूज्य माना है, यह सब हमारे तंत्र की जैविकता को आसानी से समृद्ध बनाए रखता है। 

ये सब हमारे जीवन का अंग बने रहे और इतनी सरलता सहजता से बने हुए रहे कि हमें पता ही नहीं चलता था कि हम दैनिक जीवन में सहजता से कितने बड़े काम कर रहे थे। ये सब हमारा आसपास था, हम ध्यान देते थे तो सब हो रहा था, जब दो सांड लड़ रहे होते थे तो हम उनपर पानी डालकर अलग कर देते थे, जब बहुत सारे स्वान किसी एक पर हमला करते तो हम उन्हें भगाते, जब किसी पेड़ के पत्ते सूखते तो हम चिंतित होते थे, हम अपने आसपास थे, एकदम सही समझ रहे हैं हम अपने खुद के आसपास थे।

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समय के साथ बदल गया हमारा आसपास

बाजार की रणनीतियां क्रूर होती गईं और हमने अपना आसपास बदल लिया। हमें अब चारों ओर से डामर या सीमेंट से घिरा पेड़ नहीं दिखाई देता है, हमारा ध्यान अब  समाप्त होते चिड़ियों के सुंदर कलरव की ओर नहीं जाता है। हमें फर्क नहीं पड़ता हम कितने पेड़ों के बीच हैं। हम अब भूखे कुत्तों को मरने दे रहे हैं, हमें देश में गायों में तेजी से फैल रही बीमारी लिम्फी से कोई मतलब नहीं है, हमारी प्राथमिकताएं इतनी तेजी से बदली हैं कि पड़ोसी के घर के सुख-दुख अब हमारे हिस्से नहीं आते। 

आप जानते हैं इस सबसे क्या हो रहा है??  हमारे जीवन से जैविकता, आनंद, और उत्साह कम हो गया है...खत्म हो रहा है। 

अपने आसपास बने रहिए, अपने आसपास बने रहेंगे ।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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