कोरोना पर हर रोज चौंकाने वाले आंकड़े भले ही दुनियाभर की सरकारों के लिए चिन्ता का बड़ा कारण हों लेकिन यह भी सच है कि आज दुनिया में कहीं हो न हो लेकिन भारत में इंसान जितना बेफिक्र दिख रहा है, उतना लॉकडाउन के दौर में तो कतई नहीं था।
क्या यह कोई मनोवैज्ञानिक स्थिति है या फिर कहीं न कहीं सच को स्वीकारती सच्चाई, जिसे लेकर लोग इतने असंवेदनशील और सहज हो गए हैं कि जो हो रहा है वो भी मंजूर और जो होने की चर्चा है वह भी मंजूर। यकीनन यह मानसिक स्थिति कोरोना संक्रमण से भी कई गुना खतरनाक है क्योंकि लगता नहीं कि करुणा मर चुकी है?
लोग कोरोना के भयावह मंजर को देखने के डर को बुझे मन से ही सही मान तो नहीं चुके? ऐसे में कोरोना से बड़ी जंग मानसिक स्थिति को मजबूत कर जीतनी होगी। आज जब कोरोना हर रोज अपने उफान यानी पीक पर पहुंच रहा है और लोग हैं कि बेफिक्र होते जा रहे हैं? यह स्थिति बेहद चिन्ताजनक है।
सोचना और समझना होगा कि लोग अपने स्वास्थ्य को लेकर एकाएक क्यों इतने गैर जिम्मेदार हो गए हैं? कोरोना की जंग में खुद को बेहद मजबूत रख कर ही लड़ाई जीती जा सकेगी. अभी तो लड़ाई शुरू हुई है जो कठिन जरूर है लेकिन जीती जाने वाली भी है। ऐसे में बस जरूरत है तो इतनी कि मजबूत इच्छा शक्ति से कोरोना को चुनौती दें न कि स्वीकारें। तो फिर बेफिक्री कैसी?
इसको लेकर निश्चित रूप से देश व राज्य सरकारें अपनी-अपनी तरफ से जरूर फिक्रमन्द होंगी और लोगों के मन में अनायास घर कर गए एक धीमें अवसाद की चिन्ता भी होगी।
कोरोना को लेकर बड़ी सच्चाई जो जगजाहिर है कि वुुहान की औलाद की पूरी तासीर किसी को नहीं पता थी न है। लाइलाज यह वायरस कई नए रंग, रूप दिख डराता ही जा रहा है। दवा या वैक्सीन न होने से बचाव का प्रकृतिक तरीका ‘लॉकडाउन’ ही काफी कारगर, स्वीकार्य और तात्कालिक आसान उपाय बना।
सच है कि कब तक पूरा देश तालाबन्दी में रहता, इसलिए अनलॉक-1 की घोषणा हुई। इसके बाद जो तस्वीरें सामने आईं जो बेहद निराशजनक रहीं। मुक्ति का जश्न मनना शुरू हो गया और कोरोना के आगे समर्पण! संक्रमण के उफान के बावजूद बचाव के उपायों की जबरदस्त अनदेखी हुई। नतीजा कोरोना की रफ्तार बढ़ी कि भारत दुनिया का तीसरा संक्रमित देश बना दूसरा बनने की होड़ में है।
रोजाना 40 से 45 हजार मामलों के बावजूद डर न होना चिन्ताजनक है। बाजारों, सार्वजनिक स्थानों में भीड़ खुद से मास्क न पहनने पर उतारू लोग, बेहद हैरानी भरा है। बढ़ते संक्रमण और मौत के आंकड़ों बीच अजीब सी सार्वजनिक सामाजिक, मानसिक स्थिति दिखी जो गंभीर हताशा या महामारी की स्वीकार्यता का इशारा तो नहीं? यदि ऐसा है तो कोरोना से पहले लोगों को इससे उबारना होगा।