कोरोना संकट के बीच हमारे समाज ने लंबा लॉकडाउन देखा है। महामारी के इस चुनौती के बीच हम सब घरों में रहने को मजबूर हुए हैं, लेकिन इस मजबूरी ने जहां जीवन जीने के तरीके बदले हैं वहीं पुराने संबंधों के प्रति एक ऊर्जा को दोबारा पैदा किया है।
ऐसा नहीं है कि मनोरंजन करना सही नहीं है, लेकिन अपने मनोविनोद के लिए जिस तरह की गतिविधियां हम कर रहे हैं वह व्यक्तिगत व सामाजिक पतन का कारण बन रही हैं। लेकिन एक अच्छी बात है कि हम पुन: दुष्प्रवृत्तियों से अच्छी प्रवृत्तियों की तरफ कदम बढ़ाने लगे हैं। भले ही, मौत का डर ही सही लोगों का जीवन के प्रति नजरिया बदला है।
अब तक हम प्रकृति का दोहन कर भौतिकतावादी जीवन को ईंधन दे रहे थे लेकिन उस पर थोड़ा अंकुश लग गया है। यह भविष्य के लिए शुभ संकेत की तरह है। अब हम भारत के योगमयी जीवन, सादा जीवन उच्च विचार वाली परंपरा, दया, प्रेम की तरफ बढ़ रहे हैं। प्राकृतिक संतुलन किस तरह बना रह सकता है उसे अच्छी तरह समझ गए हैं।
इस लॉकडाउन ने हमें परिवार और सेहत की अहमियम सिखाई है। भले ही तालाबंदी से आर्थिक और सामाजिक नुकसान हुआ है पर भारतीय संस्कृति की पहचान- योगमयी जीवन की तरफ लौटना हमारे जीवन को आगे आने वाले दिनों में खुशहाल तथा संतुलित बना देगा। राम और कृष्ण की धरती पुन: गौरवान्वित होकर जयघोष करने लगेगी।
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