विवाह जीवन को स्थिरता और आपसी संरक्षण भी देता है।
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इधर जया प्रसाद का कहना था कि पाश्चात्य संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के कारण विधवा एवं विधुरों को लेकर सामाजिक विकृतियां पैदा होने के भय को टालने का उपाय पुनर्विवाह ही है। अतः इनकी गृहस्थी दोबारा बसा दी जानी चाहिए। नीतू दत्ता के अनुसार समाज की सोच अब बदलने लगी है। विधवा विवाह के गिने चुने उदाहरण आजकल देखने को मिल जाते हैं। लेकिन इसे अभी और गति देने की जरूरत है। ताकि प्रभावित महिलाओं के जीवन में बदलाव आए।
आईएम कुदेशिया का कहना था कि केवल विधवा का ही क्यों तलाकशुदा का भी विवाह कराया जाना चाहिए। विवाह में अत्यधिक विलंब भी समाज में बड़ी समस्या बनता है। यू कानूनगो ने विधवा/विधुर पुनर्विवाह का समर्थन करते हुए कहा इस प्रक्रिया में कभी कभी संपत्ति के मामले बाधक बनते हैं।
वहीं गोपाल श्रीवास्तव का विचार था कि किसी भी विधवा स्त्री को अपने जीवन में खुशियां ढूंढने का पूरा अधिकार है। पति के जाने के बाद अकेलापन उसका पूरा जीवन खोखला कर देता है। ऐसे में अगर कोई जरूरतमंद साथी मिल जाता है तो निश्चित रूप से उसे पुनर्विवाह कर लेना चाहिए। यह बात स्त्री-पुरुष दोनों पर लागू होती है। लेकिन इससे जिनके स्वार्थ प्रभावित होते हैं वो तो विरोध करेंगे ही।
बहस में व्यक्त विचारों से यह तो स्पष्ट है ही कि लोग सामाजिक भय को दरकिनार करते हुए विधवा या विधुर पुनर्विवाह के पक्षधर होते जा रहे हैं। लेकिन ऐसे परिवार जहां विधुर या विधवा है, वे सामने आने में अभी भी हिचकिचाते हैं। केवल रूपम कुमारी ने यह बताया कि उन्होंनेे स्वयं अपनी ननद का 44 वें वर्ष में दूसरा विवाह कराया और एक अन्य युवा ने यह घोषणा ही कर दी कि यदि उपयुक्त प्रस्ताव आता है तो वह विधवा अथवा तलाकशुदा के साथ विवाह करने को तैयार है।
निश्चित ही ऐसे प्रयासों और घोषणाओं से समाज में चेतना संचार होता है। सामाजिक न्याय के मुद्दों पर लोगों और खासकर महिलाओं में हिचकिचाहट अथवा संकोच दूर होना आवश्यक है। नौजवानों ही नहीं समाज के अग्रणियों और वरिष्ठों को इस दृष्टि से आगे आना चाहिए, तभी तस्वीर बदलेगी।
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