स्वीडन में कोरोना वायरस से अब तक 110 लोगों की जान जा चुकी है।
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कितना फ़र्क़ है सोच में
स्वीडिश प्रधानमंत्री स्टीफ़न लोफवेन ने कुछ दिनों पहले जब राष्ट्र को संबोधित किया तो अपने पांंच मिनट के संबोधन में लोगों को अपनी ज़िम्मेदारी ईमानदारी से निभाने और जागरूक रहने की अपील की। ख़ुद से लोगों को आइसोलेट होने का अनुरोध किया। साथ ही यह भी आगाह किया कि अगर बचाव के तरीक़ों का पालन नहीं किया गया तो परिणाम गंभीर हो सकते हैं। उन्होंने देशवासियों को बलिदान के लिए तैयार रहने की बात तक कह डाली। यह बलिदान अपने स्वास्थ्य, अपने क़रीबियों को खोने या नौकरी खोने का हो सकता है।
सरकार इससे निपटने के सभी ज़रूरी प्रयास कर रही है, लेकिन आने वाला समय गंभीर है। उनके इन शब्दों से मामले की गंभीरता समझ आती है लेकिन उन्होंने आम जनता पर कोई भी पाबंदी नहीं लगाई। बेशक 80 साल से अधिक उम्र के बुजुर्गों से ख़ासतौर पर सोशल डिस्टेन्सिंग की गुहार लगाई गई थी। लेकिन छोटे बच्चों के स्कूल जाने, पार्क में खेलने से कोई मनाही नहीं की गई। ना ही किसी ग़ैर ज़रूरी जगहों पर पाबंदी लगाई गई।
यहांं भी कोरोनावायरस संक्रमण से बचाव के उपाय के तौर पर सोशल डिस्टेन्सिंग और साबुन से हाथ धोने, सेनेटाइजर के अधिकाधिक उपयोग पर बल दिया जा रहा है। बुजुर्गों से सोशल डिस्टेंसिंग और बेवजह बाहर नहीं निकलने की बातें भी बड़े ही नरम अंदाज में हो रही है। लेकिन जब आप सड़क पर निकलेंगे तो बुजुर्गों की संख्या बड़ी तादाद में दिख जाएगी। ख़ैर इसके कुछ सामाजिक कारण भी हैं।
लेकिन जब स्पेन, इटली, फ़्रांस, डेनमार्क , फ़िनलैंड , जर्मनी समेत सभी देश लॉकडाउन का विकल्प आज़मा रहे हैं तो स्वीडन में महज़ 50 लोगों के एक साथ इकट्ठे होने पर पाबंदी लगाई गई है। यानी अगर आप चाहें तो एक साथ 49 लोग इकट्ठे हो सकते हैं। यह पाबंदी भी तीन दिन पहले ही लगी है। इससे पहले 500 लोगों के एकत्रित होने पर रोक थी।
यहांं कि पब्लिक हेल्थ एजेंसी की अपनी दलीलें हैं। उसका मानना है कि लॉकडाउन समस्या का हल नहीं है। लोगों का जागरूक रहना ज़रूरी है। अगर कोई स्वस्थ है तो उसे डर कर घर में बैठने की ज़रूरत नहीं, वह एहतियात बरतते हुए अपने बाहरी काम निपटा सकता है। ऐसे में जबकि आजतक इस संक्रमण से निपटने के लिए कोई कारगर वैक्सीन नहीं निकल पाई है आख़िर कबतक लोग घर में बैठे रहेंगे। क्या यह टिकाऊ हल है। रही बात हाथों की सफ़ाई की तो यह डेढ़ सौ सालों से लोगों को पता है कि किसी वायरस से बचने के लिए स्वच्छता, हाथों का साफ़ होना कितना ज़रूरी है। यह मूल ज्ञान सदियों से लोगों को दिया जा रहा है। जिसे फिर से याद कराने की ज़रूरत है।
वहीं दूसरे देशों में लॉकडाउन, कर्फ़्यू जैसे कड़े कदम उठाने की बात से असहमति जताते हुए यहांं कि एजेंसी कहती है कि हमारा यह रवैया दर्शाता है कि स्वीडिश हेल्थ एजेंसी अपने निर्णय लेने में कितनी स्वतंत्र है। ऐसे में जबकि दूसरे देशों की सरकारें इस बरे में निर्णय ले रही है, हमने अपने यहाँ सरकार का बोझ बढ़ाया नहीं है। सरकार अपना काम कर रही है और हम अपना।हम स्थिति की लगातार समीक्षा कर रहे हैं और ज़रूरत के मुताबिक़ सभी ज़रूरी कदम उठाये जाएँगे।
आपको बता दूँ कि इतने हताहत भरे माहौल में भी यहाँ के स्थानीय लोगों को सरकार और स्वास्थ्य व्यवस्था पर गहरा विश्वास क़ायम है। उन्हें अपने फ़िटनेस और जागरूकता पर भी इन्हें कोई संदेह नहीं है। तभी तो आम जनता को मिली इतनी आज़ादी के बाद भी यहाँ के आँकड़े दूसरे पड़ोसी देशों की तुलना में फिलहा ज़्यादा ख़राब नहीं है।
कोरोना से यूरोप में सबसे ज्यादा इटली, स्पेन में तबाही हुई हैत्र
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आपको यह यह जानकर हैरानी होगी कि नौंवी कक्षा तक के बच्चों के स्कूल अभी भी खुले हैं। पांंच साल से कम उम्र के बच्चों के लिए प्रीस्कूल को बाधित नहीं किया गया है। यह ज़रूर कहा गया कि जिन बच्चों में फ़्लू या सर्दी जुकाम के कोई भी लक्षण हैं उन्हें स्कूल नहीं आने दिया जाए। हाल में ही कुछ प्रीस्कूल ने यह ज़रूर कहा कि उनके यहांं स्टाफ़ की कमी है , इसलिए जिनके अभिभावक बेरोज़गार या फिर पैरेंटल लीव पर हैं उनके बच्चों को फिलहाल नहीं भेजा जाए।
नॉर्वे समेत कई देशों ने स्वीडन में बच्चों के रोज़ाना बाहर निकलने और स्कूल बंद नहीं करने की कड़ी आलोचना की है। उनका कहना है कि बेशक बच्चों की रोगप्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है और स्वीडन के ट्रेंड के मुताबिक़ यहांं कोरोनावायरस की चपेट में आने वाले अधिकांश बुजुर्ग ही हैं, लेकिन बच्चे वायरस के संवाहक बन सकते हैं। अगर उनतक वायरस पहुंंचता है तो यह परिवार के दूसरे सदस्यों तक भी बड़ी आसानी से पहुंंचेगा। यह ख़तरनाक साबित हो सकता है। लेकिन स्वीडन ने ऐसी बातों को अनसुना करते हुए अपनी बातं पर क़ायम है।
वहीं रेस्तरांं, बार, पब भी खुले हैं। हांं यहांं सेल्फ़ सर्विस को अब बंद कर दिया गया है। अब सभी को अपने ऑर्डर टेबल पर मिलते हैं। बेशक कर्मचारियों को दफ़्तरों में आने से रियायत मिली हुई है। वे वर्क फ़्रॉम होम पर हैं।
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